यूरोप की विमान निर्माता कंपनी एयरबस ने शुक्रवार को एक बयान जारी कर बताया कि वह अपने ए320 बेड़े के विमानों को वापस बुला रही है। दरअसल विमानों में सॉफ्टवेयर बदलाव के चलते कंपनी ने यह फैसला किया है। हालांकि कंपनी के इस फैसले का असर पूरी दुनिया पर होगा और हवाई यातायात बुरी तरह से प्रभावित हो सकता है।
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सोलर रेडिएशन तो हमेशा से पर्यावरण का हिस्सा रहा है, अब ऐसा क्या हुआ कि वह इतना खतरनाक हो गईं?सोलर रेडिएशन हमेशा से पर्यावरण का हिस्सा भी रहा है और एविएशन के लिए यह पुरानी और ज्ञात हकीकत है. एयरबस A320 का मौजूदा मामला एक स्पेसिफिक सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर की वल्नरेबिलिटी को लेकर है, जिसकी पहचान 30 अक्टूबर को हुई घटना के बाद की गई है, जो सोलर स्टॉर्म्स की वजह से ट्रिगर हुई है. आपको बता दें कि सूरज की एक्टिविटी 11 साल के सोलर साइकल के पीक पर है; नवंबर 2025 में X5.1 क्लास की शक्तिशाली सोलर फ्लेयर और उससे जुड़ी S2‑लेवल सोलर रेडिएशन स्टॉर्म, G4 लेवल की जियोमैग्नेटिक स्टॉर्म और ग्राउंड‑लेवल एनहांसमेंट जैसे इवेंट हाल में दर्ज किए गए, जिनसे हाई‑ ऐल्टिट्यूड और पोलर रूट्स पर रेडिएशन और रेडियो डिसरप्शन बढ़ा है.
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सूरज के रेडिएशन की वजह से एयरबस के A-320 प्लेन्स को ही खतरा क्यों है?एयरबस A320 फैमिली में समस्या एलीवेटर एंड एइलरॉन कंप्यूटर (ELAC) के कुछ पुराने वर्जन की वजह से है. दरअसल, एयरबस A-320 फैमिली के जिन एयरक्राफ्ट में L104 या इससे नीचे के सॉफ्टवेयर में है, उनमें इंटेंस सोलर रेडिएशन की वजह से डेटा करप्शन हो सकता है. यह करप्शन अनकमांडेड एलेवेटर मूवमेंट पैदा कर सकता है, जिसमें पिच डाउन की संभावना भी शामिल है. हालांकि इसे ऑटोपायलट से सुधारा जा सकता है, पर खराब परिस्थितियों में आपदा की स्थिति हो सकती है. जहां तक फ्लाइट सेफ्टी का सवाल है तो एयरबस A320 फैमिली और सूरज के रेडिएशन का मामला खासतौर पर कम्प्यूटर डेटा करप्शन से जुड़ा है. इससे प्लेन के स्ट्रक्चरल सेफ्टी को कोई खतरा नहीं है.
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क्या पहले भी सोलर रेडिएशन की वजह से फ्लाइट ऑपरेशन में किसी तरह की दिक्कत देखी गई है?कॉस्मिक और सोलर रेडिएशन से जुड़ी घटनाएं पहले भी दर्ज की गई हैं. 2008 में क्वांटस एयरलाइंस की फ्लाइट 72 के लिए एयरबस A330 को तैनात किया गया था. फ्लाइट के दौरान अचानक दो बार तेज पिच‑डाउन हुआ, जिसमें 100 से ज्यादा लोग घायल हुए. इस घटना की जांच में पाया गया कि एयर डेटा इनर्शियल रेफरेंस यूनिट में संभावित कॉस्मिक रे बिट फ्लिप की वजह से यह घटना हुई. बाद में फ्लाइट सेफ्टी को ध्यान में रखते हुए सॉफ्टवेयर और प्रोसीजर में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए थे. इसके बाद, Boeing 737 MAX के री‑सर्टिफिकेशन के समय भी रेगुलेटर्स ने कॉस्मिक रे बिट फ्लिप सिमुलेशन टेस्ट किए. जांच में पाया कि अगर मेमोरी बिट्स बदल जाएं तो पायलट सिमुलेटेड कंट्रोल खो सकते हैं.








