साल 1975 में भारतीय राजनीति में उथल-पुथल का दौर था और व्यापार सरकारी शिकंजे से मुक्त होने के लिए छटपटा रहा था. दरअसल, भारत में वह दौर कल्याणकारी और समाजवादी राजव्यवस्था का था. मुनाफा कमाना किसी पाप से कम नहीं था, लेकिन यह आदर्शवाद भ्रष्ट सरकारी तंत्र में बदल चुका था. एक मोटरसाइकिल खरीदने के लिए भी अधिकारियों से इजाजत लेना जरूरी था.
उसी दौर में टाटा समूह में एक 30 वर्षीय युवक को कुछ प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी दी गई. नाम था रतन नोवल टाटा. रतन टाटा पहली बार किसी प्रोजेक्ट में स्वतंत्र रूप से इन-चार्ज बने थे. उन्हें नेशनल रेडियो और इलेक्ट्रॉनिक्स यानी नेल्को का डायरेक्ट-इन-चार्ज बनाया गया. शुरुआती चार सालों की सफलता के बाद कंपनी मजदूरों की समस्या और आर्थिक मंदी के कारण घाटे में चली गई. साल 1977 में टाटा की चार मशहूर कपड़ा मिलों में भी तालाबंदी की नौबत आ गई.
रतन टाटा के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती थी. आधुनिक भारत के निर्माण में टाटा के योगदान की कहानी यहीं से शुरू होती है. साल 2011-12 में टाटा समूह का राजस्व 46 गुना बढ़ गया और मुनाफा 51 गुना. रतन टाटा के कार्यकाल का यह सुनहरा दौर था, जब समूह की पूंजीगत बाजार में कीमत 33 गुना तक बढ़ चुकी थी. साल 2024 में टाटा ग्रुप का राजस्व 165 अरब रुपये तक पहुंच गया है और मूल्य 30 लाख करोड़ है. वित्तीय वर्ष 2023 में टाटा ग्रुप से 1,028,000 कर्मचारी जुड़े हैं. टाटा ग्रुप की 35 कंपनियां इस समय रजिस्टर हैं.
टाटा समूह को सिर्फ व्यापार के नजरिए से देखना गलत होगा. दुनिया भर में मशहूर पत्रिका द इकोनॉमिस्ट ने लिखा है, “आप एक घर में रह सकते हैं, कार चला सकते हैं, फोन कॉल कर सकते हैं, स्वादिष्ट खाना खा सकते हैं, बीमा ले सकते हैं, घड़ी पहन सकते हैं, जूते पहनकर टहल सकते हैं, एसी में रह सकते हैं और होटल जा सकते हैं; ये सब कुछ टाटा कंपनियों की देन है.”
70 के दशक से भारत की अर्थव्यवस्था आगे बढ़ती है और 1991 में आर्थिक मंदी से निपटने के लिए भारत के दरवाजे विदेशी कंपनियों के लिए खोल दिए जाते हैं. विदेशी कंपनियों को टक्कर देने के लिए टाटा समूह भी पूरी तरह से तैयार था और कमान रतन टाटा के हाथ में थी. ग्रुप के पास अब सीमेंट, टेक्सटाइल्स, कॉस्मेटिक्स, सॉफ्टवेयर, टेलीकम्युनिकेशन, वित्त और रिटेल सेक्टर में काम करने वाली कंपनियां थीं. रतन टाटा ने इन कंपनियों पर ग्रुप के बैनर तले काम करने की जगह अपने स्तर से बढ़ाने का मौका दिया और अपनी हिस्सेदारी भी कम की.
आर्थिक जगत में ग्लोबलाइजेशन यानी वैश्वीकरण मॉडल की शुरुआत हुई थी. टाटा समूह ने कई कंपनियों का अधिग्रहण किया और अपने कारोबार को 100 देशों तक फैला दिया. रतन टाटा ने जब समूह की कमान संभाली थी तो ग्रुप का वैश्विक राजस्व 10 प्रतिशत था और जब वे रिटायर हुए तो यह बढ़कर 67 प्रतिशत तक पहुंच गया था; इसके साथ ही पूरी दुनिया में इसका कारोबार 100 देशों तक पहुंच चुका था.
हालांकि, रतन टाटा के लिए ग्लोबलाइजेशन का मतलब दूसरे देशों में कंपनियां खोलकर मुनाफा कमाना नहीं था; भारत में आ रही कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धी बने रहना भी महत्वपूर्ण था. उनके कार्यकाल में लिए गए कई फैसले समूह पर भारी भी पड़े, जिनमें कई कंपनियों को खरीदना शामिल था. जगुआर और लैंड रोवर जैसी कंपनियों को खरीदना जहां बड़ी सफलता थी, वहीं बाद में वही घाटे का सौदा साबित हुआ.

टाटा समूह पर किताब “वे द टाटास: हाउ ए फैमिली बिल्ट ए बिजनेस एंड ए नेशन” के लेखक गिरीश कुबेर बताते हैं कि टाटा समूह ने बिजनेस को हमेशा सामाजिक जरूरतों के हिसाब से शुरू किया. कुबेर बताते हैं कि एक बार वे किताब के सिलसिले में रतन टाटा से बात करने गए तो उनका मन बहुत खिन्न था. पूछने पर बताया कि जमर्न शेफर्ड नस्ल का उनका कुत्ता ‘टिटो’ बीमार है. बातों ही बातों में पता लगा कि वे अगले दिन सिंगापुर जाने वाले हैं; वहां पर टाटा और विस्तारा के बीच एयरलाइंस बिजनेस की डील होने वाली थी. आप अंदाजा लगा सकते हैं कि एयरलाइंस शुरू करने का उनका सपना कई दशकों बाद पूरा होने वाला था, लेकिन उस समय भी वे कुत्ते को लेकर परेशान थे. बाद में उन्होंने जानवरों के लिए मुंबई में अंतरराष्ट्रीय स्तर का एक अस्पताल बनवाया; गिरीश बताते हैं कि ऐसा अस्पताल पूरे भारत में कहीं नहीं है.
एबीपी न्यूज से बातचीत में गिरीश कुबेर टाटा इंडिका कार को लेकर एक दिलचस्प किस्सा सुनाते हैं. वे बताते हैं कि भारत की कार मार्केट उस समय एम्बैसडर और प्रीमियर पद्मिनी कार का कब्जा था; ये उस समय तक अमीरों की कारें थीं. रतन टाटा उसी समय मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए कार बनाने की बात करते थे. साल 1998 में टाटा इंडिका के तौर पर कार लॉन्च की गई, जिसकी सफलता और असफलता की अपनी एक कहानी है.
गिरीश कुबेर बताते हैं कि एक बार मुंबई में रतन टाटा ने देखा कि एक स्कूटर पर चार लोग—पति-पत्नी, बेटी आगे और बेटा पीछे—बैठे थे. रतन को लगा कि एक कार भारत के लोअर मिडिल क्लास के लिए भी होनी चाहिए; इसी सोच से टाटा समूह ने नैनो कार लॉन्च कर दी.
टाटा ने तमाम ऐसे उत्पाद लॉन्च किए जो आम जनता की जरूरतों के हिसाब से बनाए गए थे. इसके लिए रतन टाटा ने समूह की कंपनियों को आपस में मिलकर काम करने के लिए प्रेरित किया था. टाटा केमिकल्स और टाटा इंडस्ट्री ने सस्ता वाटर प्यूरीफायर बनाया; ड्रग डिलिवरी रिसर्च के लिए टाटा केमिकल्स और टाटा एडिनस ने काम किया. साथ ही, उन्होंने टाटा टी, जिंजर बजट होटल, छोटे ट्रक और सुपर कंप्यूटर जैसे उत्पाद लॉन्च किए; इनमें से कई उत्पाद असफल भी हुए. इलेक्ट्रॉनिक कार बाजार में जहां कई कंपनियों की कारें आम लोगों की पहुंच से दूर थीं, वहीं टाटा मोटर्स ने इस सेगमेंट में सबसे सस्ती कारें पेश कीं.
रतन टाटा ने कई स्टार्टअप्स को भी आर्थिक मदद दी है. इनमें ओला से लेकर पेटीएम तक शामिल हैं. हालांकि इन कंपनियों की मदद में कितना पैसा दिया गया, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है.
रतन टाटा न केवल एक सफल उद्योगपति रहे बल्कि उन्होंने समाजिक जिम्मेदारियों को भी बखूबी निभाया है, जिससे उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रहेगी.








