सोचिए, एक अंतरिक्ष यात्री इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) से बाहर स्पेसवॉक पर है और अचानक उसका कनेक्शन टूट जाता है. अब वह स्टेशन से दूर तैर रहा है और वापस नहीं आ पा रहा है. ऐसे में पृथ्वी से एक बचाव यान लॉन्च किया जाएगा जिसमें स्पेडेक्स तकनीक होगी. यह बचाव यान अंतरिक्ष यात्री के पास जाएगा और स्पेडेक्स तकनीक के जरिए उसके स्पेससूट या किसी नजदीकी सैटेलाइट से जुड़ जाएगा. ऐसे बचाव यान अंतरिक्ष यात्री को पृथ्वी पर सुरक्षित वापस ले आता है.
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने सोमवार को ऐसा ही अंतरिक्ष में दो सैटेलाइट्स को जोड़ने का एक अनोखा मिशन सफलतापूर्वक लॉन्च किया है. इस मिशन का नाम है ‘स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट’ (SpaDeX). श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से PSLV C60 रॉकेट ने रात 10 बजे उड़ान भरी. इस रॉकेट में दो छोटे उपग्रहों (SDX01 और SDX02) के साथ 24 अन्य पेलोड भी थे. फिर करीब 15 मिनट बाद ये दोनों उपग्रह पृथ्वी से 475 किमी ऊपर एक कक्षा में स्थापित हो गए.
स्पेडेक्स मिशन की खासियत को समझने के लिए एबीपी न्यूज ने इसरो के पूर्व वैज्ञानिक डॉ चंद्र मोहन नौटियाल से बात की. सीएम नौटियाल ने बताया कि ये एक बहुत बेसिक लेवल का एक्सपेरिमेंट है. इस एक्सपेरिमेंट का नतीजा 7 जनवरी को पता चलेगा, जब दोनों सैटेलाइट एकदूसरे से जोड़ दिए जाएंगे.
उन्होंने आगे बताया, इनमें एक सैटेलाइट चीजर (पीछा करने वाला) है और दूसरा रिसीवर (रिसीव करने वाला) है. धीरे-धीरे ये दोनों सैटेलाइट एकदूसरे के करीब आएंगे और कुछ समय बाद चेजर आगे वाले सैटेलाइट को पकड़ लेगा. ऐसा करने वाला भारत चौथा देश होगा. इससे पहले अब तक रूस, अमेरिका और चीन ने ही ऐसा किया है.
स्पेडेक्स मिशन से क्या फायदा होगा?
पूर्व वैज्ञानिक डॉ चंद्र मोहन नौटियाल ने स्पेस में फंसी भारतीय मूल की अमेरिकी एस्ट्रोनॉट सुनीता विलियम्स का उदाहरण देकर समझाया. उन्होंने कहा, अब अगर सुनीता विलियम्स को वहां से निकालना है तो कोई ऐसा सैटेलाइट ही भेजा जा सकता है, जो अंतरिक्ष यान से जुड़ (डॉक) सके. जब दोनों का डॉक होगा, तभी स्पेस में इंसान या चीजों को एकदूसरे में ट्रांसफर किया जा सकता है. स्पेडेक्स मिशन इस तरह डॉकिंग की हमारी बेसिक कैपेबिलिटीज को टेस्ट करने का तरीका है. इन दोनों सैटेलाइट्स के जुड़ने से मैटेरियल का एक्सचेंज भी हो सकता है.
डॉ सीएम नौटियाल ने आगे बताया, अगर हमारा ये छोटा मिशन सफल हो जाता है तो इसरो की बड़ी उपलब्धि होगी. क्योंकि आगे जब भी किसी अंतरिक्ष में किसी एस्ट्रॉनोट को भेजा जाएगा, तो बाद में उनको वापस लाने के लिए किसी सैटेलाइट को डॉक करना होगा, वहां पर हमारा ये वाला अनुभव (स्पेडेक्स मिशन) काम आएगा. ये एक दूरदर्शी योजना है. हम अपनी डॉकिंग या अंतरिक्ष में जुड़ने की क्षमता को स्थापित कर रहे हैं. ये तकनीक आगे बहुत से मिशन में काम आएगी. मंगल मिशन, मून मिशन पर अगर हम किसी एस्ट्रॉनोट को भेजते हैं तो ये डॉकिंग की तकनीक काम आ सकती है.
“इसके अलावा अगर हमारा कोई सैटेलाइट अंतरिक्ष में खराब हो जाता है, उसमें ऐसी कोई मूल्यवान चीज है जिसे हम अंतरिक्ष में नहीं छोड़ सकते हैं तो डॉकिंग की मदद से उसे वहां से निकाला जा सकता है. कोई एस्ट्रॉनोट अंतरिक्ष में कहीं फंस गया है तो उसे वहां से निकाला जा सकता है.”
अंतरिक्ष मामलों के जानकार डॉ चंद्र मोहन नौटियाल ने बताया कि स्पेस में बड़ी संख्या में कूड़ा इकट्टा हो रहा है, ये एक बड़ी समस्या है. पता नहीं कितने सैटेलाइट्स पृथ्वी के चारों ओर घूम रहे हैं. इनका हमारे किसी भी स्पेस यान से टकराने की आकंक्षा बनी रहती है. इससे अरबों करोड़ों का नुकसान हो सकता है. ऐसे में डॉकिंग की मदद से उन बेकार सैटेलाइट्स को पकड़कर नीचे लाने का काम किया जा सकता है.
अंतरिक्ष में कैसे होगा दो सैटेलाइट्स का मिलन?
220 किलो वजन वाले दो छोटे उपग्रह पृथ्वी से 475 किमी ऊपर एक कक्षा में घूम रहे हैं. PSLV रॉकेट इन दोनों उपग्रहों को इस तरह से छोड़ेगा कि उनके बीच थोड़ा सा फासला और स्पीड का अंतर होगा. इस स्पीड के अंतर की वजह से एक दिन के अंदर दोनों उपग्रहों के बीच 10-20 किमी की दूरी हो जाएगी. फिर, एक उपग्रह अपने इंजन का इस्तेमाल करके अपनी स्पीड कम करेगा ताकि दोनों उपग्रहों के बीच की दूरी कम हो सके.
जब दोनों उपग्रहों के बीच की दूरी लगभग 20 किमी होगी और उनकी स्पीड समान होगी, तो यह ‘दूर से मिलन’ की स्थिति होगी. इसके बाद एक उपग्रह अपनी स्पीड को थोड़ा बढ़ाकर दूसरे उपग्रह के पास जाएगा और फिर स्पीड कम करके उसके और करीब आएगा. यह प्रक्रिया कई बार दोहराई जाएगी, जिससे दोनों उपग्रहों के बीच की दूरी धीरे-धीरे कम होती जाएगी (5 किमी, 1.5 किमी, 500 मीटर, 225 मीटर, 15 मीटर, और अंत में 3 मीटर).
अंत में, दोनों उपग्रह आपस में जुड़ जाएंगे. जुड़ने के बाद एक उपग्रह से दूसरे उपग्रह को बिजली भेजी जाएगी. कुछ समय बाद दोनों उपग्रह एक-दूसरे से अलग हो जाएंगे और अपना-अपना काम शुरू कर देंगे. यह मिशन लगभग दो साल तक चलेगा.
यह ऐसा है जैसे दो दोस्त पहले दूर से एक-दूसरे को देखते हैं, फिर धीरे-धीरे करीब आते हैं, हाथ मिलाते हैं, कुछ देर बात करते हैं और फिर अपने-अपने रास्ते चल देते हैं. स्पेडेक्स मिशन में भी कुछ ऐसा ही होता है, जहां दोनों उपग्रह अंतरिक्ष में एक-दूसरे से मिलते हैं, जुड़ते हैं और फिर अलग हो जाते हैं.
मिशन में इस्तेमाल की गई सभी तकनीकें कहां विकसित हुई?
स्पेडेक्स मिशन में इस्तेमाल की गई सभी तकनीकें भारत में ही विकसित की गई हैं, जो इस मिशन को और भी खास बनाती हैं. स्पेडेक्स मिशन में इस्तेमाल किए गए उपग्रह काफी छोटे हैं. इस मिशन की सफलता भविष्य के चंद्र मिशन, जैसे कि चंद्रयान-4 के लिए बहुत अहम है, जहां पृथ्वी से GNSS का सहारा नहीं मिलेगा.

इसरो ने स्पेडेक्स मिशन के लिए सभी जरूरी चीजें खुद बनाई हैं. यह मिशन इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें छोटे उपग्रहों का इस्तेमाल किया गया है, जिससे मिलन और जुड़ाव का काम और भी मुश्किल हो जाता है. इस मिशन से भारत को भविष्य में चांद पर जाने और वहां अपना अंतरिक्ष स्टेशन बनाने में मदद मिलेगी.
स्पेडेक्स मिशन की क्या-क्या खासियत हैं?
इसरो का स्पेडेक्स मिशन सिर्फ दो उपग्रहों को जोड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है जो इसे और भी खास बनाती हैं. स्पेडेक्स उपग्रहों में सौर पैनल लगे हैं जो 528 वॉट तक बिजली पैदा करते हैं. बिजली आदान-प्रदान की तकनीक भी है जिससे एक उपग्रह दूसरे उपग्रह को बिजली दे सकता है.
स्पेडेक्स मिशन में कई तरह के सेंसर, कैमरे और कम्युनिकेशन सिस्टम लगे हैं जो इसे अंतरिक्ष में देखने, सुनने और बात करने की क्षमता देते हैं. स्पेडेक्स का दिमाग एक शक्तिशाली कंप्यूटर है जो इस पूरे मिशन को कंट्रोल करता है.

स्पेडेक्स मिशन: अंतरिक्ष में मिलन का ‘दिमाग’ कैसे काम करेगा
इसरो के स्पेडेक्स मिशन में दो उपग्रहों को अंतरिक्ष में मिलवाने और जोड़ने के लिए खास ‘दिमाग’ का इस्तेमाल किया गया है. यह ‘दिमाग’ कंप्यूटर प्रोग्राम और एल्गोरिदम का एक सेट है जो उपग्रहों को सही रास्ते पर चलाने और उनकी स्पीड को कंट्रोल करने में मदद करता है. यह एल्गोरिदम उपग्रहों को धीरे-धीरे करीब लाते हैं और उन्हें सही स्थिति में रखते हैं. अंत में, जब उपग्रह एक-दूसरे के बहुत करीब होते हैं, तो यह एल्गोरिदम उन्हें धीरे से जोड़ने में मदद करते हैं.
इसरो ने अपनी वेबसाइट पर बताया है कि इन एल्गोरिदम को कंप्यूटर प्रोग्राम में बदला गया और उनकी जांच कई तरह से की गई है. कंप्यूटर सिमुलेशन, हार्डवेयर सिमुलेशन और रोबोटिक सिमुलेशन का इस्तेमाल करके यह सुनिश्चित किया गया कि यह प्रोग्राम सही से काम करेंगे.
दोनों उपग्रहों के जुड़ाव और अलग होने के बाद क्या होगा?
इसरो के स्पेडेक्स मिशन का असली मकसद तो जुड़ाव और अलग होने के बाद शुरू होगा, जब दोनों उपग्रह अपने-अपने कामों को अंजाम देंगे. पहले उपग्रह (SDX01) में एक हाई-रेज़ोल्यूशन कैमरा (HRC) लगा है जो पृथ्वी की तस्वीरें लेगा. साथ ही अंतरिक्ष में मौजूद रेडिएशन की मात्रा को मापेंगे.
दूसरे उपग्रह (SDX02) में दो खास इक्विपमेंट लगे हैं. मिनिएचर मल्टी-स्पेक्ट्रल पेलोड (MMX) इक्विपमेंट पृथ्वी की अलग-अलग रंगों में तस्वीरें लेगा, जिससे प्राकृतिक संसाधनों की निगरानी और वनस्पति अध्ययन में मदद मिलेगी. वहीं रेडिएशन मॉनिटर (RadMon) इक्विपमेंट अंतरिक्ष में मौजूद रेडिएशन की मात्रा को मापेगा. यह जानकारी भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों खासकर मानवयुक्त अभियान के लिए बहुत अहम होगी.








