हाल ही वर्ल्ड बैंक की तरफ से एक ब्लॉग प्रकाशित किया गया था. जिसके अनुसार साल 2024 में भारत ने एक नया कीर्तिमान स्थापित करते हुए 129.1 बिलियन डॉलर की रेमिटेंस (मनी ट्रांसफर) प्राप्त किया है. यह रकम किसी भी देश के लिए एक साल में मिली सबसे बड़ी रकम है.
रेमिटेंस वह पैसा होता है, जो विदेशों में काम करने वाले लोग अपने घरवालों को आर्थिक मदद देने के लिए भेजते हैं. यह खासकर विकासशील देशों के लिए एक महत्वपूर्ण आय का स्रोत होता है और इन देशों की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाता है.
वर्ल्ड बैंक द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, भारत ने न केवल रेमिटेंस के मामले में रिकॉर्ड कायम किया, बल्कि वैश्विक रेमिटेंस का 14.3% हिस्सा भी अपने नाम किया, जो इस सदी में किसी भी देश का सबसे बड़ा योगदान है. भारत की रेमिटेंस में बढ़ोतरी का यह रिकॉर्ड नए आर्थिक दौर की शुरुआत का प्रतीक है, जहां भारतीय प्रवासी दुनिया भर में आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं.
ऐसे में इस रिपोर्ट में उस रिकॉर्ड की पूरी कहानी को समझते हैं, और देखते हैं कि यह भारत के लिए किस तरह की संभावनाओं और चुनौतियों को लेकर आया है.
सवाल – भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण है रेमिटेंस
जवाब- रेमिटेंस भारत के लिए बहुत अहम हैं. भारतीय प्रवासी, जो दुनिया के अलग अलग हिस्सों में काम कर रहे हैं, न केवल अपने परिवारों को आर्थिक मदद भेजते हैं, बल्कि भारत की कुल जीडीपी में भी इनका एक महत्वपूर्ण योगदान भी है. साल 2024 में भारत ने जो 120 बिलियन डॉलर प्राप्त किए, उनका एक बड़ा हिस्सा देश के गरीब और मंझले वर्ग के लिए जीवन की बुनियादी सुविधाओं का इंतजाम करने में मदद करता है.
इस रेमिटेंस का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में योगदान करता है. यह रकम न केवल उपभोक्ताओं की खरीदारी शक्ति को बढ़ाती है, बल्कि परिवारों की शिक्षा, स्वास्थ्य, और आवास जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में भी सहायक होती है. कई ग्रामीण और दूरदराज इलाकों में रेमिटेंस ने स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को सहारा दिया है, और इसके कारण कई छोटे और मंझले व्यापारों को फायदा हुआ है.
सवाल – कैसे और क्यों हो रही है रेमिटेंस में वृद्धि
जवाब- भारत ने 2024 में जो रेमिटेंस का रिकॉर्ड बनाया है, उसके पीछे कई कारण हैं. सबसे पहला कारण है कि दुनियाभर में पिछले कुछ सालों में भारतीय प्रवासियों की बढ़ती संख्या, यानी अब विदेशों में ज्यादा भारतीय काम कर रहे हैं. जब ज्यादा लोग विदेशों में काम करने जाते हैं, तो वे अपने परिवारों को ज्यादा पैसे भेजते हैं.
इसके अलावा भारत में युवाओं की संख्या भी बढ़ी है. दरअसल इस देश में फिलहाल युवाओं की संख्या ज्यादा है और वे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, जिसके बाद उन्हें विदेशों में बेहतर काम के मौके मिल रहे हैं.
वहीं कोरोना महामारी (COVID-19) के दौरान बहुत से देशों की आर्थिक स्थिति बिगड़ी थी. उस समय, विदेशों में काम करने वाले भारतीयों ने अपनी परिवारों की मदद करने के लिए रेमिटेंस भेजने की प्रक्रिया को और मजबूत कर दिया महामारी के बाद जब दुनिया भर में श्रमिकों की कमी हो गई, तो भारतीय प्रवासियों की मांग बढ़ी. इस वजह से भी भारत को भेजी जाने वाली रेमिटेंस की राशि में बढ़ोतरी हुई.
भारत और वैश्विक रेमिटेंस के आंकड़े
भारत में 2024 में 120 बिलियन डॉलर (120 अरब डॉलर) की रेमिटेंस प्राप्त करके एक नया रिकॉर्ड बनाया है. इसका मतलब है कि इस देश ने दुनिया में जितनी भी रेमिटेंस (मनी ट्रांसफर) आई, उसका 14.3% हिस्सा अपने नाम किया. यह आंकड़ा बहुत खास है, क्योंकि अब तक किसी भी देश का रेमिटेंस में हिस्सा इतना ज्यादा नहीं था. भारत के बाद मेक्सिको और चीन ने सबसे ज्यादा रेमिटेंस प्राप्त की, लेकिन इन दोनों देशों का हिस्सा भारत से बहुत कम था.
भारत का रेमिटेंस आंकड़ा 100 बिलियन डॉलर से भी ऊपर जा चुका है, जो पहले कभी नहीं हुआ था. इसके बावजूद, यह वृद्धि अचानक से नहीं हुई है. अगर हम पिछले कुछ सालों का ट्रेंड देखें, तो भारत ने लगातार रेमिटेंस में वृद्धि देखी है. खासकर 2020 के बाद, जब कोविड-19 महामारी के बाद बहुत से भारतीय प्रवासी अपने परिवारों की मदद के लिए ज्यादा पैसा भेजने लगे. इस दौरान रेमिटेंस में तेजी आई, और 2024 तक यह आंकड़ा ऐतिहासिक रूप से सबसे ज्यादा हो गया.
वर्ल्ड बैंक के अनुसार, भारत का रेमिटेंस में हिस्सा पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ा है. 2024 में भारत का हिस्सा मेक्सिको (7.5%) से दोगुना था. हालांकि, चीन का हिस्सा 2000 से लेकर 2010 तक लगातार बढ़ा था, लेकिन 2020 के बाद इसमें गिरावट आनी शुरू हो गई. 2024 में चीन का हिस्सा 5.3% तक गिरकर दो दशकों में सबसे कम हो गया. इसके पीछे चीन की बढ़ती आर्थिक समृद्धि और उम्रदराज़ आबादी जिम्मेदार मानी जा रही है.
रेमिटेंस का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर
इस सवाल के जवाब में पटना यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर सुनीता श्रीवास्तव ने एबीपी से बातचीत में बताया कि भारत की अर्थव्यवस्था में रेमिटेंस का योगदान बेहद महत्वपूर्ण है. साल 2024 में, रेमिटेंस भारत के जीडीपी का लगभग 3.3% बन गई, जो कि किसी भी अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्था की तुलना में कम था, लेकिन फिर भी यह एक बड़ा आंकड़ा है.
भारत की अर्थव्यवस्था के लिए रेमिटेंस एक प्रकार से स्थिर और दीर्घकालिक आय का स्रोत है, जो वैश्विक मंदी या अन्य संकटों के बावजूद लगातार आता है. इस प्रकार, रेमिटेंस का बढ़ता आंकड़ा भारत के लिए न केवल आर्थिक स्थिरता का प्रतीक है, बल्कि यह देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में भी एक अहम भूमिका निभा रहा है.
उन्होंने आगे कहा कि भारतीय रेमिटेंस का वैश्विक पैमाने पर बढ़ना अन्य देशों के लिए भी एक संकेत है. यह साबित करता है कि दुनिया भर में भारतीय श्रमिकों की मांग बढ़ी है और उनकी कड़ी मेहनत का फल मिल रहा है.
इसके अलावा, रेमिटेंस उन देशों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण साबित हो रहे हैं जो अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए बाहरी मदद पर निर्भर हैं. जैसे नेपाल, पाकिस्तान, बांगलादेश, और कई अफ्रीकी देशों में रेमिटेंस का जीडीपी में योगदान बहुत अधिक है. उदाहरण के लिए, नेपाल में रेमिटेंस ने 2024 में जीडीपी का 25% हिस्सा बना दिया, जो उस देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण सहारा है.
रेमिटेंस से जुड़ी चुनौतियां
हालांकि रेमिटेंस का भारत के लिए बहुत बड़ा लाभ है, लेकिन इसके साथ कुछ चुनौतियां भी हैं. भारत में रेमिटेंस के बड़े हिस्से का इस्तेमाल अनौपचारिक क्षेत्र में होता है, और यह बड़े पैमाने पर गरीब और मंझले वर्ग तक पहुंचता है. कभी-कभी यह रकम सही तरीके से उपयोग नहीं हो पाती है, और इसका पूरा लाभ परिवारों को नहीं मिल पाता.
इसके अलावा, रेमिटेंस के जरिए देश में डॉलर की आपूर्ति बढ़ने से भारतीय रुपया कमजोर हो सकता है. हालांकि, फिलहाल यह प्रभाव सीमित है, लेकिन अगर यह रुझान लगातार बढ़ता है, तो इसे ध्यान में रखना पड़ेगा.








