मेडिकल कॉलेज ऐसे शिक्षण संस्थान होते हैं जहां डॉक्टर बनने की पढ़ाई होती है. यहां छात्रों को मरीजों का इलाज करने, दवाइयां देने और सर्जरी जैसी चीजें सिखाई जाती हैं. यहां छात्र अस्पतालों में जाकर असली मरीजों का इलाज करना सीखते हैं. इससे उन्हें वास्तविक अनुभव मिलता है. मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद छात्रों को MBBS, MD, MS जैसी डिग्रियां मिलती हैं.
मेडिकल कॉलेज किसी भी देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ होते हैं. ये नए डॉक्टर, नर्स और मेडिकल स्पेशलिस्ट तैयार करने के साथ-साथ रिसर्च और नई दवाओं पर भी काम करते हैं. इससे नई दवाएं बनती हैं और बीमारियों के इलाज के नए तरीके निकलते हैं.
अगर मेडिकल कॉलेज ज्यादा होंगे, तो ज्यादा डॉक्टर मिलेंगे, इलाज सस्ता होगा और लोगों को अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं मिलेंगी. इसलिए सरकार को लगातार नए मेडिकल कॉलेज खोलने पर ध्यान देना चाहिए, ताकि हर नागरिक को बेहतर इलाज मिल सके.
हाल ही में संसद में सरकार से सवाल पूछा गया कि आज देशभर में नए मेडिकल कॉलेज का क्या हाल है? मतलब, उनका काम कहां तक पहुंचा है? क्या सरकार देश में नए अस्पताल या मेडिकल कॉलेज खोलने की सोच रही है?
पहले जानिए- डॉक्टर बनने के लिए सबसे जरूरी क्या?
भारत में डॉक्टर बनने के लिए सबसे पहले MBBS की डिग्री लेनी होती है. ये डिग्री ‘इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट 1956’ के तहत दी जाना शुरू हुई थी और अब ‘नेशनल मेडिकल कमीशन एक्ट 2019’ के तहत दी जाती है. नेशनल मेडिकल कमीशन ने 2019 में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) की जगह ली थी. सरकार ऐसे मान्यता प्राप्त मेडिकल कॉलेजों की लिस्ट हमेशा अपडेट करती रहती है.
MBBS की डिग्री मिलने के बाद डॉक्टरों को राज्य की मेडिकल काउंसिल में अपना नाम दर्ज कराना होता है. इसके बाद ही वो मरीजों का इलाज कर सकते हैं. भारत में कई लोग बिना MBBS की डिग्री लिए डॉक्टर की तरह इलाज करते हैं. इन्हें ‘क्वैक’ (Quacks) कहा जाता है. ये लोग असली डॉक्टर नहीं होते.
नेशनल मेडिकल कमीशन एक्ट 2019 में झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ सख्त सजा का प्रावधान किया है. इस कानून के तहत झोलाछाप डॉक्टरों को 1 साल तक की जेल हो सकती है. उन पर 5 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है.
कैसे किया जा रहा है मेडिकल कॉलेजों का निर्माण?
सरकार का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय एक योजना चलाता है, जिसका नाम है ‘जिला/रेफरल अस्पतालों से जुड़े नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना’. इस योजना का उद्देश्य उन इलाकों में मेडिकल कॉलेज खोलना है जहाँ पहले से कोई सरकारी या प्राइवेट मेडिकल कॉलेज नहीं है. खासकर उन इलाकों में जहां स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है.
इस योजना में केंद्र सरकार और राज्य सरकारें मिलकर पैसे खर्च करती हैं. उत्तर-पूर्वी और स्पेशल कैटेगरी वाले राज्यों में केंद्र सरकार 90% और राज्य सरकार 10% पैसा देती है. बाकी राज्यों में केंद्र सरकार 60% और राज्य सरकार 40% पैसा देती है.
संसद में पूछे गए सवाल के जवाब में बताया, केंद्र प्रायोजित योजना (CSS) के तहत, सरकार ने कुल 157 सरकारी मेडिकल कॉलेजों को मंजूरी दी है. इनमें से 131 कॉलेज काम करना शुरू कर चुके हैं. यानी, 26 सरकारी मेडिकल कॉलेज खुलना अभी बाकी है. नियमों के अनुसार, मेडिकल कॉलेजों की प्लानिंग, निर्माण और शुरुआत राज्य सरकारें करती हैं. मतलब, केंद्र पैसे देती है लेकिन कॉलेज बनाने का काम राज्यों का है.
कुल कितने निजी और सरकारी मेडिकल कॉलेज
इससे पहले फरवरी में सरकार ने संसद में बताया था कि 2014 में देश में 404 मेडिकल कॉलेज थे, जो अब बढ़कर 780 हो गए हैं. सिर्फ कॉलेज ही नहीं, MBBS की सीटों में भी बड़ा इजाफा हुआ है. 2014 में देश में MBBS की 54,348 सीटें थीं, जो अब बढ़कर 118,190 हो गई हैं. मतलब 63,842 सीटें बढ़ी हैं.
इसके अलावा, पुराने सरकारी मेडिकल कॉलेजों को भी बेहतर बनाने का काम किया है, ताकि MBBS और PG की सीटें बढ़ाई जा सकें. 83 कॉलेजों में 4977 MBBS सीटें बढ़ाने के लिए 5972.20 करोड़ रुपये दिए गए. 72 कॉलेजों में 4058 PG सीटें बढ़ाने के लिए 1498.43 करोड़ दिए. 65 कॉलेजों में 4000 PG सीटें बढ़ाने के लिए 4478.25 करोड़ दिए गए हैं. प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत, 75 सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सुपर स्पेशलिटी ब्लॉक बनाने की मंजूरी दी गई है. मतलब, यहां गंभीर बीमारियों का इलाज हो सकेगा.
सरकार ने बताया, 22 नए AIIMS बनाने का फैसला किया है. इनमें से 19 में तो पढ़ाई भी शुरू हो गई है. डॉक्टरों की कमी को दूर करने के लिए DNB की डिग्री वालों को भी पढ़ाने का मौका दिया है. मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाने वाले शिक्षकों, डीन, प्रिंसिपल और डायरेक्टर की उम्र 70 साल तक बढ़ा दी गई है.
कितने आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज खोले हैं?
संसद में सरकार ने बताया, लोगों की सेहत का ध्यान रखना राज्यों का काम है, इसलिए राज्यों में नए आयुष कॉलेज (जिसमें आयुर्वेद भी शामिल है) खोलने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है. केंद्र सरकार नेशनल आयुष मिशन (NAM) नाम की एक योजना चलाती है. इसके तहत उन राज्यों को पैसे दिए जाते हैं जहां सरकारी आयुष कॉलेज कम हैं. राज्य सरकारें NAM के नियमों के हिसाब से अपनी योजना बनाकर केंद्र सरकार को भेज सकती हैं और मदद ले सकती हैं.
लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा, पिछले तीन सालों में सरकार ने कुछ राज्यों में आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज खोले हैं, लेकिन गुजरात में कोई नया कॉलेज नहीं खुला है. अगर कोई राज्य सरकार चाहे, तो वो केंद्र सरकार से मदद लेकर अपने राज्य में आयुर्वेदिक कॉलेज खोल सकती है.
80% मेडिकल कॉलेज फेल?
संसद में नए मेडिकल कॉलेजों की वर्तमान स्थिति पर सरकार से सवाल पूछा गया था, लेकिन सरकार ने इस बारे में कोई जवाब नहीं दिया. हालांकि, नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) की एक जांच रिपोर्ट से पता चलता है कि इन कॉलेजों में कई तरह की गड़बड़ियां व्याप्त हैं.
देश के लगभग 80% मेडिकल कॉलेज मेडिकल शिक्षा के नियमों पर खरे नहीं उतरते. मतलब, जितने नियम मेडिकल कॉलेजों के लिए बनाए गए हैं, उनमें से ज्यादातर कॉलेज उन नियमों का पालन नहीं करते. NMC के अधिकारियों ने जब इन कॉलेजों की जांच की, तो उन्हें कई गड़बड़ियां मिलीं. जैसे: पढ़ाने वाले टीचर गायब रहते हैं, कॉलेजों में जरूरी सुविधाएं ठीक से नहीं हैं. वहीं छात्रों की शिकायतें रहती है कि उनके साथ रैगिंग होती है, हॉस्टल ठीक नहीं हैं और टीचरों का व्यवहार अच्छा नहीं है.
इन गड़बड़ियों के चलते NMC ने कॉलेजों पर 10 लाख से 50 लाख रुपये तक का जुर्माना भी लगाया और अगर कॉलेज अपनी हालत नहीं सुधारते हैं तो जुर्माना 1 करोड़ रुपये तक भी हो सकता है. NMC ने ये भी कहा है कि अगर कॉलेज सुधरते नहीं हैं, तो उनकी सीटें भी कम कर दी जाएंगी. NMC सिर्फ UG (MBBS) कॉलेजों की ही नहीं, बल्कि PG (MD/MS) कॉलेजों की भी जांच करता है. देश में लगभग 700 सरकारी और प्राइवेट मेडिकल कॉलेज हैं, जो MBBS, MD/MS और डिप्लोमा जैसे कोर्स कराते हैं.








