वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच सतर्क नीति निर्माण और सुधारों की निरंतरता से भारत की विकास रफ्तार बरकरार……………

पश्चिम एशिया की तनावपूर्ण स्थितियों, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास की अनिश्चितता के बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक की रिपोर्टों का यह कहना आश्वस्त करने वाला है कि वैश्विक संकटों के दौर में भी भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी मजबूती बनाए रखने में सक्षम है। दरअसल, आईएमएफ ने वित्त वर्ष 2027 के लिए भारत […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026, 08:20 AM 3 मिनट read
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वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच सतर्क नीति निर्माण और सुधारों की निरंतरता से भारत की विकास रफ्तार बरकरार……………
Photo: UB India News Archive

पश्चिम एशिया की तनावपूर्ण स्थितियों, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास की अनिश्चितता के बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक की रिपोर्टों का यह कहना आश्वस्त करने वाला है कि वैश्विक संकटों के दौर में भी भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी मजबूती बनाए रखने में सक्षम है। दरअसल, आईएमएफ ने वित्त वर्ष 2027 के लिए भारत के जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान को दस आधार अंक बढ़ाकर 6.5 फीसदी किया है, तो इसकी मूल वजह भारत पर अमेरिका द्वारा लगाए गए 50 फीसदी टैरिफ का घटकर दस फीसदी होना है।

आईएमएफ ने साफ कहा है कि अमेरिकी टैरिफ में कमी से होने वाला फायदा पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के विपरीत असर की भरपाई से अधिक होगा। अगर आईएमएफ वित्त वर्ष 2027 और 2028, दोनों में जीडीपी के 6.5 फीसदी की दर से बढ़ने का अनुमान लगा रहा है, तो इसकी मुख्य वजह यह है कि पिछले वर्ष भारत की वृद्धि दर पहले के अनुमानों से कहीं अधिक रही थी, जिससे नए वित्त वर्ष के लिए वृद्धि की शुरुआत का स्तर और भी ऊंचा हो गया। उल्लेखनीय है कि पिछले ही हफ्ते विश्व बैंक ने भी भारत के जीडीपी वृद्धि अनुमान को वित्त वर्ष 2027 के लिए 6.3 फीसदी से बढ़ाकर 6.6 फीसदी कर दिया है। दरअसल, भारत की विकास दर का एक बड़ा हिस्सा आंतरिक उपभोग और निवेश पर आधारित है, न कि केवल निर्यात पर।

ऐसे में, वैश्विक उथल-पुथल का असर भारत पर सीमित ही रहता है। इसके अतिरिक्त, पिछले कुछ वर्षों में सरकार द्वारा लाए गए संरचनात्मक सुधार, जैसे-जीएसटी का युक्तिकरण, डिजिटलीकरण और बुनियादी ढांचे में निवेश इत्यादि ने अर्थव्यवस्था को अधिक संगठित तथा पारदर्शी बनाया है। यही नहीं, भारत के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार भी है, जो बाहरी झटकों के समय एक सुरक्षा कवच का काम करता है। भारतीय रिजर्व बैंक की सतर्क मौद्रिक नीति ने भी महंगाई को अपेक्षाकृत नियंत्रित रखने में मदद की है। यह संतुलन ऐसे वक्त में और महत्वपूर्ण हो जाता है, जब वैश्विक बाजार अस्थिर हो। हालांकि, यह तस्वीर पूरी तरह से जोखिममुक्त नहीं है।

पश्चिम एशिया संकट के चलते अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो सरकार के लिए राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी एसएंडपी की चेतावनी अहम है कि युद्ध के असर से भारत पूरी तरह बच नहीं सकता। हालांकि, उसका यह कहना राहत भरा है कि भारत में इतना सामर्थ्य है कि वह वैश्विक दबावों से कुछ हद तक खुद को बचा सकता है। लिहाजा, भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच सतर्क नीति निर्माण और सुधारों की निरंतरता ही स्थायी सुरक्षा की गारंटी हो सकते हैं।

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