विदेशी चंदे पर पहरा हो, लेकिन सरकारी शक्ति की सीमा कौन तय करेगा?

विदेशी चंदे का मामला भारत में हमेशा संवेदनशील रहा है। सरकार का तर्क है कि विदेशी धन भारत की राजनीति, सामाजिक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने का माध्यम नहीं बनना चाहिए। दूसरी तरफ हजारों सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक और जनकल्याणकारी संस्थाएं विदेशी सहयोग के जरिए वर्षों से काम कर रही हैं। इसीलिए जब विदेशी […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
रविवार, 9 अगस्त 2026, 01:49 PM 8 मिनट read
लाइव टेक्स्ट हाइलाइटिंग के साथ सुनें
शेयर करें:
WhatsAppFacebookXTelegram
विदेशी चंदे पर पहरा हो, लेकिन सरकारी शक्ति की सीमा कौन तय करेगा?
Photo: UB India News Archive

विदेशी चंदे का मामला भारत में हमेशा संवेदनशील रहा है। सरकार का तर्क है कि विदेशी धन भारत की राजनीति, सामाजिक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने का माध्यम नहीं बनना चाहिए। दूसरी तरफ हजारों सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक और जनकल्याणकारी संस्थाएं विदेशी सहयोग के जरिए वर्षों से काम कर रही हैं।

इसीलिए जब विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2026 संसद में आता है, तो बहस सिर्फ विदेशी चंदे की निगरानी तक सीमित नहीं रहती। सवाल यह भी उठता है कि विदेशी फंडिंग लेने वाली संस्थाओं पर सरकार का नियंत्रण कितना हो और उस नियंत्रण की सीमा कहां तक हो।

25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया यह विधेयक अभी लंबित है। सरकार इसे आगे बढ़ाने की तैयारी में है, जबकि विपक्ष और कुछ प्रभावित संगठनों ने इसके कई प्रावधानों पर सवाल उठाए हैं।

असली विवाद आखिर है क्या?

विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील हिस्सा उन संस्थाओं की संपत्तियों से जुड़ा है जिनका एफसीआरए पंजीकरण रद्द हो जाता है, संस्था खुद पंजीकरण वापस कर देती है या उसका नवीनीकरण नहीं हो पाता। प्रस्तावित व्यवस्था में ऐसी स्थिति में विदेशी योगदान से जुड़ी संपत्तियों और धन के प्रबंधन के लिए नामित प्राधिकारी की भूमिका तय की गई है।

यहीं से बहस शुरू होती है। मान लीजिए किसी संस्था ने विदेशी सहयोग से वर्षों में स्कूल, अस्पताल, छात्रावास या कोई सामाजिक सेवा केंद्र बनाया। बाद में उसका एफसीआरए पंजीकरण रद्द हो गया या नवीनीकरण नहीं हुआ। तब उस संपत्ति के भविष्य का फैसला किसके हाथ में होगा?

सरकार कहती है कि ऐसी संपत्तियों को अनिश्चितकाल तक ऐसी संस्था के नियंत्रण में नहीं छोड़ा जा सकता जिसका एफसीआरए दर्जा समाप्त हो चुका है। लेकिन आलोचकों का सवाल है कि क्या प्रशासनिक कार्रवाई के आधार पर किसी संस्था की वर्षों में बनाई गई संपत्ति पर सरकारी नियंत्रण स्थापित करना उचित प्रक्रिया के पर्याप्त सुरक्षा उपायों के साथ किया जाएगा?

क्या यह सीधे-सीधे संपत्ति जब्त करने का कानून है?

इस सवाल का जवाब थोड़ा जटिल है। विधेयक को केवल “संपत्ति जब्ती” के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी। प्रस्तावित व्यवस्था में संपत्ति के अस्थायी नियंत्रण और उसके बाद की प्रक्रिया का प्रावधान है। कुछ परिस्थितियों में यदि संस्था अपना पंजीकरण बहाल या नवीनीकृत करा लेती है, तो संपत्ति अथवा अप्रयुक्त धन की वापसी की व्यवस्था भी हो सकती है।

लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल फिर भी खड़ा होता है-जिस संस्था का प्रमाणपत्र रद्द हुआ है, उसे राहत पाने में कितना समय लगेगा और तब तक उसकी संपत्ति का क्या होगा? किसी संस्था के लिए यह महज कानूनी सवाल नहीं है। उसके पीछे कर्मचारी, लाभार्थी, अस्पताल में इलाज करा रहे मरीज, स्कूल में पढ़ रहे बच्चे और वर्षों से चल रहे सामाजिक कार्यक्रम भी हो सकते हैं।

सरकार का पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं

इस बहस में सरकार की चिंता को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा। भारत में विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा और वित्तीय पारदर्शिता का सवाल है। विदेशी धन का इस्तेमाल यदि राजनीतिक गतिविधियों, धार्मिक ध्रुवीकरण, गैरकानूनी गतिविधियों या देश के हितों के विरुद्ध किया जाता है, तो सरकार के पास कार्रवाई का अधिकार होना ही चाहिए।

एफसीआरए का मूल उद्देश्य भी यही है कि विदेशी योगदान का इस्तेमाल पारदर्शी और कानून के अनुरूप हो। समस्या तब पैदा होती है जब नियमन और नियंत्रण के बीच की सीमा धुंधली होने लगे।

सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि कानून का इस्तेमाल केवल वास्तविक उल्लंघन के खिलाफ हो, न कि वैचारिक या प्रशासनिक असहमति रखने वाली संस्थाओं को दबाने के लिए।

एक दिलचस्प बदलाव: जेल की सजा कम होगी

विधेयक का एक ऐसा पहलू भी है जिसकी चर्चा अपेक्षाकृत कम हो रही है। प्रस्तावित संशोधन में एफसीआरए उल्लंघन के लिए अधिकतम कारावास की सजा को पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष करने का प्रस्ताव है। यानी विधेयक के सभी प्रावधानों को एकतरफा “कठोर” बताना भी सही तस्वीर नहीं होगी।

एक तरफ सरकार को संपत्तियों के संबंध में ज्यादा प्रशासनिक शक्ति देने का प्रस्ताव है, तो दूसरी तरफ कुछ उल्लंघनों में अधिकतम जेल की सजा कम करने की बात की गई है। इसलिए विधेयक का मूल्यांकन पूरे पैकेज के रूप में करना जरूरी है।

चर्च और सामाजिक संस्थाओं में चिंता क्यों?

विदेशी सहयोग लेने वाली संस्थाओं में धार्मिक और सामाजिक संगठन भी शामिल हैं। विशेष रूप से कुछ ईसाई संगठनों ने प्रस्तावित बदलावों को लेकर चिंता जताई है। मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद यह मुद्दा और चर्चा में आया। उन्हें कथित तौर पर आश्वासन दिया गया कि नया प्रावधान retrospective यानी पिछली तारीख से लागू नहीं होगा।

यह आश्वासन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि कानून को पिछली अवधि पर लागू किया जाता, तो पहले से मौजूद संस्थाओं और संपत्तियों पर इसके प्रभाव को लेकर कहीं ज्यादा गंभीर विवाद पैदा हो सकता था। फिर भी भविष्य को लेकर सवाल बाकी है।

यदि किसी संस्था का एफसीआरए प्रमाणपत्र किसी कारण से रद्द होता है तो क्या उसे पर्याप्त समय, सुनवाई और प्रभावी अपील का अधिकार मिलेगा? यही वह सवाल है जिसका स्पष्ट जवाब कानून में जितना मजबूत होगा, विवाद उतना कम होगा।

विपक्ष जीपीसी की मांग क्यों कर रहा है?

विपक्ष का सबसे बड़ा तर्क है कि इतना महत्वपूर्ण विधेयक जल्दबाजी में पारित नहीं किया जाना चाहिए। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की नेता सुप्रिया सुले ने विधेयक को वापस लेने या संयुक्त संसदीय समिति यानी जीपीसी के पास भेजने की मांग की है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने भी विधेयक पर पुनर्विचार की मांग की है।

JPC की मांग को केवल राजनीतिक विरोध के रूप में देखना भी सही नहीं होगा। जब किसी कानून का प्रभाव हजारों संस्थाओं, करोड़ों रुपये की विदेशी सहायता और उनसे बनी संपत्तियों पर पड़ सकता है, तो व्यापक संसदीय जांच और हितधारकों से बातचीत लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत ही करती है।

क्या सरकार विधेयक पास करा पाएगी?

सरकार इसे आगे बढ़ाने के मूड में दिखाई देती है। लोकसभा में सरकार के पास पर्याप्त राजनीतिक ताकत होने के कारण वहां विधेयक के आगे बढ़ने की संभावना ज्यादा है। असल राजनीतिक परीक्षा राज्यसभा में और उससे पहले विधेयक पर होने वाली बहस में होगी। सरकार के सामने दो रास्ते हैं पहला, मौजूदा स्वरूप में विधेयक को तेजी से पारित कराने की कोशिश करना। दूसरा, विपक्ष और प्रभावित संगठनों की आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए कुछ सुरक्षा प्रावधानों को और स्पष्ट करना।

दूसरा रास्ता सरकार के लिए जरूरी नहीं कि राजनीतिक कमजोरी का संकेत हो। कई बार संवेदनशील कानूनों में व्यापक चर्चा कानून को अधिक टिकाऊ बनाती है। विदेशी चंदे पर निगरानी जरूरी, लेकिन प्रक्रिया भी निष्पक्ष हो। एफसीआरए के मामले में असली बहस “सरकार बनाम एनजीओ” नहीं होनी चाहिए। विदेशी धन का इस्तेमाल पारदर्शी होना चाहिए। देश की सुरक्षा और संप्रभुता से समझौता नहीं हो सकता। किसी संस्था को विदेशी फंडिंग मिलती है तो उसे यह बताना ही होगा कि पैसा कहां से आया और कहां खर्च हुआ।

लेकिन दूसरी तरफ सरकार की शक्ति भी कानून और न्यायपूर्ण प्रक्रिया से बंधी होनी चाहिए।
किसी संस्था का पंजीकरण रद्द करना एक प्रशासनिक फैसला हो सकता है, लेकिन उसके परिणाम कई वर्षों के सामाजिक काम पर पड़ सकते हैं। इसलिए कार्रवाई से पहले सुनवाई, स्पष्ट कारण, समयबद्ध अपील और स्वतंत्र समीक्षा जैसी व्यवस्थाएं जितनी मजबूत होंगी, कानून पर भरोसा उतना ही बढ़ेगा।

असली सवाल विदेशी चंदा नहीं, सरकारी शक्ति की सीमा है

एफसीआरए संशोधन विधेयक को केवल विदेशी चंदे पर नियंत्रण का कानून समझना शायद इस बहस को छोटा कर देना होगा। असल सवाल यह है कि विदेशी धन पर निगरानी रखते हुए नागरिक समाज की वैधानिक स्वायत्तता कैसे बचाई जाए।

सरकार के पास राष्ट्रीय हितों की रक्षा की जिम्मेदारी है। संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे विदेशी धन का इस्तेमाल घोषित उद्देश्यों और कानून के मुताबिक करें। लेकिन लोकतंत्र में इन दोनों के बीच एक तीसरी चीज सबसे महत्वपूर्ण है-निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया।

यदि विधेयक विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ाता है, अवैध गतिविधियों पर प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करता है और साथ ही निर्दोष संस्थाओं को मनमाने प्रशासनिक फैसलों से सुरक्षा देता है, तो यह कानून व्यवस्था को मजबूत कर सकता है।

लेकिन यदि सरकारी शक्ति इतनी बढ़ जाती है कि किसी संस्था का अस्तित्व और उसकी संपत्ति मुख्यतः प्रशासनिक विवेक पर निर्भर हो जाए, तो फिर सवाल केवल एफसीआरए का नहीं रहेगा। वह सवाल होगा-लोकतंत्र में सरकार की शक्ति की सीमा आखिर कहां तय होती है? और शायद यही इस विधेयक की सबसे बड़ी परीक्षा भी है।

Categories: सांसद
UB India News

UB India News

बिहार और देश-दुनिया की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक घटनाओं की निष्पक्ष व सटीक रिपोर्टिंग।

संबंधित खबरें (Related Stories)

9 Articles loaded
सांसदों की संख्या बढ़ाने से राजनीतिक कमी तो पूरी हो सकती है, किंतु विकास की कमी नहीं,………………..
सांसद

सांसदों की संख्या बढ़ाने से राजनीतिक कमी तो पूरी हो सकती है, किंतु विकास की कमी नहीं,………………..

संसद के मानसून सत्र में 19 बैठकों में 11 बिल पास किए गए। इनमें से दस बिलों पर लोकसभा में कुल मिलाकर 64 मिनट का समय लगा। नौ बिलों के मामले में, सिर्फ उन्हें पेश करने वाले मंत्री ने ही बात की और कोई बहस नहीं हुई। निचले सदन में पूरे सत्र के दौरान प्रश्नकाल […]

UB India News25 अग॰
15 सितंबर से पहले फिर संसद सत्र? महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पर सरकार की बड़ी तैयारी
सांसद

15 सितंबर से पहले फिर संसद सत्र? महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पर सरकार की बड़ी तैयारी

महिला आरक्षण और लोकसभा सीटों के परिसीमन का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आता दिख रहा है. सूत्रों के हवाले से खबर है कि केंद्र सरकार अगले दो से तीन सप्ताह के भीतर संसद का सत्र दोबारा बुलाने के विकल्प पर विचार कर रही है. चर्चा है कि 15 सितंबर के […]

UB India News24 अग॰
18 दिनों में सिर्फ 15 घंटे चली लोकसभा: एंटी-पेपर लीक से ‘केरलम’ तक, बिना बहस पास हुए कई बड़े बिल
सांसद

18 दिनों में सिर्फ 15 घंटे चली लोकसभा: एंटी-पेपर लीक से ‘केरलम’ तक, बिना बहस पास हुए कई बड़े बिल

संसद का मानसून सत्र खत्म होने के बाद केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की. उन्होंने कहा कि मानसून सत्र आज खत्म हो गया. रिजिजू ने बताया कि मानसून सत्र के दौरान राज्यसभा की कुल उत्पादकता 39 फीसदी रही. उन्होंने कहा कि राज्यसभा में विपक्षी दलों के सांसद हंगामा करते थे. कई […]

UB India News13 अग॰
संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित……………..
सांसद

संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित……………..

लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही गुरुवार को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई। इसके साथ ही संसद का मानसून सत्र खत्म हो गया। पूरे सत्र के दौरान बार-बार हंगामा हुआ। विपक्ष और सरकार के बीच तीखी बहस भी देखने को मिली। विरोध प्रदर्शनों के कारण दोनों सदनों की कार्यवाही कई बार रोकनी पड़ी। नीट […]

UB India News13 अग॰
खाली गया अमित शाह का तीन बजे वाला दांव, हंगामे की भेंट चढ़ सकता है मानसून सत्र
सांसद

खाली गया अमित शाह का तीन बजे वाला दांव, हंगामे की भेंट चढ़ सकता है मानसून सत्र

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार को संसद में चर्चा का आखिरी दांव चला। उन्होंने कहा, “हम रोज संसद आते हैं। अपना काम करते हैं। विपक्ष की मंशा ठीक नहीं। वह संसद को चलने नहीं देना चाहता। हम जानते हैं। इसलिए सदन में नहीं जाते।” शाह ने कहा कि आज शाम तीन बजे से […]

UB India News12 अग॰
विपक्ष चाहे बयान, सरकार चाहे चर्चा, इन दो शब्दों के बीच फंसकर रह गई है संसद, 19वें दिन भी ठप…….
सांसद

विपक्ष चाहे बयान, सरकार चाहे चर्चा, इन दो शब्दों के बीच फंसकर रह गई है संसद, 19वें दिन भी ठप…….

20 जुलाई को दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर हुए पुलिस एक्शन के बाद से ही इस मुद्दे पर विपक्ष गृह मंत्री अमित शाह को लगातार निशाना बनाता रहा है. विपक्ष के नेता राहुल गांधी इस मामले में कई बार गृह मंत्री अमित शाह से जवाब मांग चुके हैं. राहुल गांधी ने कई बार […]

UB India News12 अग॰
संसद के बाहर NDA और विपक्षी दलों के सांसदों ने एक-दूसरे के खिलाफ नारेबाजी ,सदन में हंगामा
सांसद

संसद के बाहर NDA और विपक्षी दलों के सांसदों ने एक-दूसरे के खिलाफ नारेबाजी ,सदन में हंगामा

संसद परिसर में NDA और कांग्रेस सांसदों ने मंगलवार को एक-दूसरे के खिलाफ प्रदर्शन किया। NDA सांसदों ने विपक्ष पर संसद में चर्चा से भागने का आरोप लगाया, जबकि कांग्रेस सांसदों ने गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ नारेबाजी की। इस दौरान दोनों पक्ष आमने-सामने भी आ गए। प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी […]

UB India News11 अग॰
लोकतंत्र में जीत केवल विधेयक पारित कराने में नहीं, बल्कि असहमति के बावजूद, सहमति का रास्ता खोजने में होती………..
सांसद

लोकतंत्र में जीत केवल विधेयक पारित कराने में नहीं, बल्कि असहमति के बावजूद, सहमति का रास्ता खोजने में होती………..

संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच है, जहां सरकार और विपक्ष के बीच मतभेदों का समाधान संवाद और सांविधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से होना चाहिए। लेकिन, मानसून सत्र में जिस तरह से लगातार गतिरोध बना हुआ है और संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बीच बातचीत के किसी ठोस नतीजे तक नहीं […]

UB India News10 अग॰
परिसीमन बिल पर बढ़ी हलचल , 15 अगस्त के बाद संसद का विशेष सत्र बुला सकती है सरकार …………..
सांसद

परिसीमन बिल पर बढ़ी हलचल , 15 अगस्त के बाद संसद का विशेष सत्र बुला सकती है सरकार …………..

केंद्र सरकार संसद में पिछले एक सप्ताह से ज्यादा वक्त से जारी हंगामे को खत्म करने की पहल में जुट गई है. संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने आज लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मुलाकात की और उनसे सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से संचालित करने में मदद मांगी. हालांकि, सूत्रों ने बताया […]

UB India News5 अग॰