बिहार का शोक कोसी – हर साल तबाही, वोटबैंक और लूट की कहानी

बिहार का शोक कोसी नदी जब शांत रहती है, तो फसल लहलहाते हैं. तटबंध के अंदर रहने वाली महिलाएं लालपान की बेगम बन जाती हैं. लेकिन, जब यही कोसी अपना कोष खोलती है, तो सिर्फ और सिर्फ तबाही मचाती है. जिंदगियां डूबती हैं, घर डूबते हैं, सामान डूबते हैं. डूब जाते हैं अरमान भी. लालपान […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
रविवार, 29 सितंबर 2024, 10:45 AM 9 मिनट read
लाइव टेक्स्ट हाइलाइटिंग के साथ सुनें
शेयर करें:
WhatsAppFacebookXTelegram
बिहार का शोक कोसी – हर साल तबाही, वोटबैंक और लूट की कहानी
Photo: UB India News Archive

बिहार का शोक कोसी नदी जब शांत रहती है, तो फसल लहलहाते हैं. तटबंध के अंदर रहने वाली महिलाएं लालपान की बेगम बन जाती हैं. लेकिन, जब यही कोसी अपना कोष खोलती है, तो सिर्फ और सिर्फ तबाही मचाती है. जिंदगियां डूबती हैं, घर डूबते हैं, सामान डूबते हैं. डूब जाते हैं अरमान भी. लालपान की बेगम की साड़ी की खूंट (गेठरी) में रुपए नहीं, बचते हैं तो सिर्फ अथाह दर्द. जिसकी कहानी पुश्त दर पुश्त बच्चे अपनी दादी-नानी से सुनते रहते हैं.

तो दूसरी ओर, जब पानी निकल जाता है तो खेतों में जमा बालू देख किसानों के चेहरे ऐसे मुरझाते हैं, जैसे किसी ने छुईमुई की पत्तियों को छू दिया हो. हो भी क्यों नहीं. दिखने में प्राकृतिक आपदा लगने वाली बाढ़, सरकारों के प्रति नाराजगी में बदल जाती है. सवाल खड़ा होता है कि आखिर इस कोसी बराज और बांध से किस-किस को फायदा पहुंचा, पहुंच रहा है और पहुंचते रहेगा.

बांध टूटता है तो क्या होता है?
सहरसा के हेमपुर गांव की रहने वाली लालदाय देवी बताती हैं कि 1984 में जब हमारे ससुराल में बांध टूटा था, तो उस समय वह अपने ननिहाल बाराही गांव में सात दिन के नवजात बेटे को लेकर थी. अहले सुबह ही पता चल गया कि उनके ससुराल में बांध टूट गया है. ससुराल का सारा सामान बह गया था. एक मवेशी को उनके पति ने किसी तरह बहने से बचाया था. पूरा गांव विस्थापित हो गया. महिलाएं और बच्चों को लोगों ने रिश्तेदारों के घर किसी तरह से पहुंचा दिया. पानी के साथ आए बालू के ढेर के नीचे बचे-खुचे सामान को लोग निकालते और आंसू बहाते थे. बाढ़ थमने के बाद गांव के लोगों ने खेतों में दोबारा घर बनाया. इस तबाही में किसी का कुछ नहीं बचा था.

बाढ़ से तबाह और बालू में धंसे कुछेक पक्का घर की निशानी अब भी तबाही के मंजर की गवाही दे रही है. आज जब बिहार में जमीन का सर्वे चल रहा है, तो हजारों लोग ऐसे हैं, जिनके पास जमीन के कागजात नहीं हैं. साल दर साल आने वाले बाढ़ में सब के सब बहकर कहां चले गए, यह कोई नहीं जानता है. खेती तो कर सकते हैं, पर जमीन को बेच नहीं सकते हैं. पिछली बार 18 अगस्त 2008 को भारत की सीमा से 8 किमी नेपाल के कुसहा में जब तटबंध टूटा था तो सुपौल, अररिया, पूर्णिया, मधेपुरा और सहरसा जिलों के 50 लाख लोग प्रभावित हुए थे.

बिहार सरकार, विश्व बैंक, जीएफडीआरआर की रिपोर्ट की मानें तो अकेले बिहार में 412 पंचायतों के 993 गांव इसकी चपेट में आए. इस त्रासदी में 2,36,632 घर ध्वस्त हुए. 1100 पुल और क्लवर्ट टूटे. 1800 किमी रोड क्षतिग्रस्त हुए. 38000 एकड़ धान, 15500 एकड़ मक्के और 6950 एकड़ की अन्य फसलें बर्बाद हुई. 10,000 दुधारू पशु, 3000 अन्य पशु व 2500 छोटे जानवरों की मौत हुई. 362 लोगों की जान गई और 3500 लोग लापता दर्ज किए गए. यह तो सरकारी आंकड़े हैं, असल क्षति इन आकड़ों से कई गुना ज्यादा था.

बाढ़ न आए तो कोसी के किसान रहेंगे धनवान
कोसी क्षेत्र के किसान बड़े मेहनती होते हैं. मौसम आधारित खेती करते हैं. नदी और पंपसेट ही सिंचाई का साधन होता है. पर, हर साल आने वाला बाढ़ कमर नहीं, उन्हें ही तोड़ देता है. पानी सूखने के बाद जमा दिखने वाले रेत खेतों की फसल उपजाने की तोकत को तोड़ कर रख देती है. बाढ़ आया तो पानी से, नहीं आया तो तपती सफेद रेत से तबाही. किसान आखिर करें तो क्या करें? पढ़ाई बीच में ही छोड़ बच्चों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ जाता है. अच्छे घरों में शादी तक नहीं हो पाती है. जिंदगी बस कटते जाती है. पूर्वी और पश्चिमी तटबंध के अंदर जन्म से लेकर मरने तक कैद जिंदगी भगवान से बस यही प्रार्थना करती हैं कि ‘अगले जनम मोहे इस इलाके में न जन्म दिहो.’

9 साल में बनकर तैयार हुआ था बराज और तटबंध
कोसी नदी पहले 200 किमी में धारा परिवर्तित करते हुए घूम-घूम कर बहती रहती थी. आजादी के बाद 1955 में सरकार ने इस नदी को तटबंधों में बांधने की शुरुआत की. नेपाल के भीम नगर में बराज, दोनों किनारे तटबंध बने और नहर निकाली गई.

पूरब में बीरपुर से कोपरिया तक लगभग 125 किमी और पश्चिम में भारदह से घोषेपुर तक लगभग 126 किमी का तटबंध 1963-64 में बनकर तैयार हो गया. इन तटबंधों के बीच की चौड़ाई कहीं 20 किमी तो कहीं-कहीं कुछ कम हो गई. तटबंध बनने के साथ ही इसके अंदर बसे लोगों की समस्याएं शुरू हुई. इन दोनों तटबंधों के बीच रहने वाले लोगों को हर साल बाढ़, कटाव और विस्थापन झेलने की नियति बन गयी.

यूं समझिए बाढ़ का गणित
कोसी क्षेत्र में काम करने वाले महेंद्र यादव कहते हैं कि कोसी के बाढ़ को आप चार तरह से समझ सकते हैं. पहला, तटबंध के बीच के इलाके में हर साल पूरे मानसून सीजन में भयानक बाढ़ आना तय है. दूसरा, तटबंध के बाहर सटे इलाकों में वर्षा का पानी और अन्य जल श्रोतों का पानी तटबंध के भीतर की जमीन ऊंची हो जाने से आने वाले सीपेज के पानी से जल जमाव रहता है. तीसरे तरह की बाढ़ तटबंध के बाहर सुरक्षित इलाकों में वर्षा व अन्य नदियों के उफान से आती है और चौथी बात कोसी तटबंध के टूटने के कारण सुरक्षित इलाकों में तबाही बनकर कहर बरपाती है. 2008 की कुसहा त्रासदी वैसी ही बाढ़ थी, जो कोसी तटबंध के आठवीं बार टूटने के कारण आई थी.

गाद और सिल्ट से ऊंचा होते जा रहा है नदी का तल
महेंद्र कहते हैं कि प्रत्येक साल नदी के साथ गाद और सिल्ट से नदी का तल ऊंचा होते जा रहा है. बाहर की जमीन नीचे है. सुरक्षा बांध बनाकर, पुल की कम चौड़ाई और उसके लिए गाइड बांध बनाकर तटबंध की चौड़ाई को कम की गई है. इसके कारण बाढ़ की विभीषिक तटबंध के बीच पहले से भयावह हो गई है. कटाव भी बढ़ गया है. आज भी तटबंध के बीच के गांवों के भूगोल बदलते रहते हैं. अपने जीवन में अनेक लोग 10 से 20 बार तक नए-नए जगहों पर घर बनाए हैं. कुछ गांव तो दूसरे मौजा और दूसरे की जमीनों पर भी बसते हैं, फिर साल दो साल में उजड़ जाते हैं.

अबतक आठ बार टूट चुका है कोसी तटबंध
कोसी तटबंध अबतक आठ बार टूट चुका है. पिछली बार 2008 में नेपाल के कुसहा में बांध टूटा था. इससे पहले 1991 में भी नेपाल के जोगनिया में, 1987 में गण्डौल में, 1984 सहरसा जिले के नवहट्‌टा में, 1981 में बहुआरा में, 1971 में भटनियां में, 1968 में जमालपुर में और 1963 में डलवां में तटबंध टूटा था.

बाढ़ और बांध की मरम्मत के नाम पर होती है लूट
कोसी के बाढ़ को 90 के दशक से कवर करने वाले सहरसा के सीनियर पत्रकार नवीन निशांत कहते हैं कि बांध बनाने का उद्देश्य कोसी की धराओं को नियंत्रित करना था. लेकिन यह साल दर साल कमाई का जरिया बन गया. वे कहते हैं कि कोसी नदी में हर साल 6 इंच से लेकर एक फीट तक सिल्ट के रूप में रेत की परत चढ़ती जा रही है. पिछले 60 सालों में 15 से 20 फीट तक सिल्ट नदी में जमा हो गया है. सरकार ने कभी भी सिल्ट निकालने का काम नहीं किया. कारगर उपाय तो यह होता कि सिल्ट निकालकर नदी की गहराई बढ़ाई जाती. लेकिन, सरकार तटबंध को ऊंचा करते जा रही है.

अब स्थिति यह हो गई है कि बांध के बाहर सटे हुए पक्का मकान बांध से नीचे होते जा रहे हैं. कहीं बांध टूटा तो तबाही पहले से ज्यादा मचेगी. नवीन कहते हैं कि सभी लोग जानते हैं कि तटबंध के अंदर हर साल बाढ़ का आना तय है. फिर भी बांध के अंदर ज्यादा सड़कें पास कराई जाती है. फिर, बाढ़ में उन सड़कों को कागज पर बना और बहा दिया जाता है और इसके नाम पर करोड़ों रुपए का बंदरबांट कर लिया जाता है. जबकि इन इलाकों का विकास मास्टरप्लान बनाकर किया जाना चाहिए.  तटबंध के अंदर बसे 308 गांव के लोग राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियों के लिए वोट बैंक बने हुए हैं.

सीनियर जर्नलिस्ट नवीन निशांत कहते हैं, कोसी बराज की उम्र 30 साल आंकी गई थी. लेकिन इसे बने हुए ज्यादा साल हो गए हैं. इसे 9 लाख क्यूसेक पानी डिस्चार्ज के लिए डिजाइन किया गया था. लेकिन अब तो 6 लाख क्यूसेक से कम पानी डिस्चार्ज की स्थिति में बराज पर ओवर फ्लो हो जा रहा है. यह खतरे की घंटी है.

दूसरी ओर, दोनों तटबंध मिट्‌टी के बने हुए हैं. चौड़ीकारण और ऊंचीकरण में बालू का ही ज्यादातर इस्तेमाल हो रहा है. इस कारण बांध पर हमेशा खतरा मंडराते रहता है. समस-समय पर बांध टूटते रहता है. लोगों की सुरक्षा चाहिए, तो पक्का बांध बनाना होगा. नदी भी पूरब की ओर शिफ्ट हो रही है. ऐसे में पक्का बांध नहीं बनाया गया, तो भविष्य में सहरसा, सुपौल, मधेपुरा और खगड़िया में तबाही मचना तय है.

UB India News

UB India News

बिहार और देश-दुनिया की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक घटनाओं की निष्पक्ष व सटीक रिपोर्टिंग।

संबंधित खबरें (Related Stories)

9 Articles loaded
एक दशक में बदली भारत की उच्च शिक्षा की तस्वीर, विकास से समावेशिता तक नई राह
खास खबर

एक दशक में बदली भारत की उच्च शिक्षा की तस्वीर, विकास से समावेशिता तक नई राह

उच्च शिक्षा संस्थानों के विस्तार, विद्यार्थियों की बढ़ती भागीदारी और समान अवसरों की दिशा में भारत की लंबी छलांग

UB India News30 अग॰
भारत की डिजिटल फर्टिलाइज़र क्रांति: डेटा एनालिटिक्स से बदलेगा सब्सिडी प्रबंधन का ढांचा
खास खबर

भारत की डिजिटल फर्टिलाइज़र क्रांति: डेटा एनालिटिक्स से बदलेगा सब्सिडी प्रबंधन का ढांचा

खाद की खपत से लेकर जिला स्तर तक निगरानी; iFMS नेटवर्क से 14 करोड़+ आधार-लिंक्ड किसान और 2.5 लाख+ खुदरा विक्रेता जुड़े

UB India News30 अग॰
सोनिया गांधी की प्रस्तावित आत्मकथा पर विवाद क्यों !
खास खबर

सोनिया गांधी की प्रस्तावित आत्मकथा पर विवाद क्यों !

सोनिया गांधी की प्रस्तावित आत्मकथा को लेकर विवाद ने किताब, सत्ता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पुराने सवाल फिर खड़े कर दिए हैं। यह बहस सिर्फ संपादकीय बदलाव तक सीमित नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से असहज विचारों और लेखकों के साथ व्यवहार से भी जुड़ी है। आंबेडकर की Annihilation of Caste, पेरियार की सच्ची रामायण, सलमान रुश्दी की The Satanic Verses और पेरुमल मुरुगन की One Part Woman भारत में ‘किताबी विद्रोह’ की लंबी परंपरा के उदाहरण हैं। हालांकि हर संपादकीय हस्तक्षेप को सेंसरशिप नहीं कहा जा सकता। सोनिया की किताब ने फिर सवाल खड़ा किया है कि लोकतंत्र में असहमति को दबाया जाए या उसका जवाब विचार से दिया जाए।

UB India News Desk30 अग॰
समय रैना के कॉमेडी शो की कौन सी बात पर मचा बवाल?
खास खबर

समय रैना के कॉमेडी शो की कौन सी बात पर मचा बवाल?

समय रैना के शो इंडियाज गॉट लेटेंट में बिहार और कश्मीर को लेकर की गई टिप्पणी से विवाद बढ़ गया है। सोशल मीडिया पर यूजर्स और नेताओं ने संवेदनशील मुद्दे को मजाक में शामिल करने पर सवाल उठाए हैं।

UB India News Desk30 अग॰
क्या दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध से पहले वाले आर्थिक दौर में पहुंच चुकी है?
खास खबर

क्या दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध से पहले वाले आर्थिक दौर में पहुंच चुकी है?

आर्थिक संकट के समय, लोकतांत्रिक देश जोखिम लेने से बचते हैं, जबकि तानाशाह देश जोखिम उठाते हैं। इतिहास का यह पैटर्न याद रखने लायक है। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जैसे हालात थे, कुछ-कुछ वैसे ही हालात इस समय बन गए हैं। 1930 और 40 के दशक की तरह ही, टकराव के दायरे बढ़ गए हैं और आपस में मिल रहे हैं। तानाशाह शासकों का गुट पूरी तरह से सक्रिय सैन्य गठबंधन बन गया है। पश्चिम की हालत बहुत खराब है। अमेरिका सैन्य रूप से तैयार नहीं है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में तेजी से और अचानक गिरावट आने की चेतावनी वाले संकेत हर जगह दिख रहे हैं।

UB India News Desk30 अग॰
खेलो इंडिया डायलॉग: ‘जो खेलेगा वो खिलेगा’, युवा एथलीटों से बोले पीएम मोदी
खास खबर

खेलो इंडिया डायलॉग: ‘जो खेलेगा वो खिलेगा’, युवा एथलीटों से बोले पीएम मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘खेलो इंडिया डायलॉग – खेल की बात, प्रधानमंत्री मोदी के साथ’ के तहत गुरुवार को युवा एथलीटों को संबोधित किया। पीएम मोदी ने इस दौरान कहा कि जो खेलेगा वो खिलेगा। उन्होंने कार्यक्रम के दौरान कहा कि खिलाड़ियों के नाम से ही उनके राज्य और शहर की पहचान होती है। पीएम […]

UB India News27 अग॰
पंजाब विधानसभा चुनाव की सियासी तपिश के साथ फिर से अकाली दल और बीजेपी के गठबंधन की बात तेज…………
खास खबर

पंजाब विधानसभा चुनाव की सियासी तपिश के साथ फिर से अकाली दल और बीजेपी के गठबंधन की बात तेज…………

पंजाब में 25 सालों तक बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल मिलकर चुनाव लड़ते रहे हैं, लेकिन किसान आंदोलन के दौरान 2020 में यह ढाई दशक पुरानी दोस्ती टूट गई थी. अब 2027 के विधानसभा चुनाव की सियासी तपिश के साथ फिर से अकाली दल और बीजेपी के गठबंधन की बात तेज हो गई है. बीजेपी […]

UB India News27 अग॰
अजीत डोभाल का चीन दौरा क्यों अहम?
खास खबर

अजीत डोभाल का चीन दौरा क्यों अहम?

भारत और चीन के रिश्तों में पिछले कुछ वर्षों में काफी ज्यादा उतार-चढ़ाव आया है. एक ओर दोनों देश व्यापार, वैश्विक मंचों और बहुपक्षीय संगठनों में साथ दिखते हैं तो दूसरी ओर हिमालयी सीमा पर तनाव ने दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित किया है. ऐसे वक्त में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार यानी एनएसए अजीत डोभाल […]

UB India News27 अग॰
भारत में जापानी कंपनियों की संख्या 3 हजार तक पहुंच सकती ,67 अरब डॉलर निवेश टारगेट…………..
खास खबर

भारत में जापानी कंपनियों की संख्या 3 हजार तक पहुंच सकती ,67 अरब डॉलर निवेश टारगेट…………..

भारत में जापानी कंपनियों की संख्या आने वाले कुछ सालों में दोगुनी होकर करीब 3 हजार तक पहुंच सकती है. जापान दौरे पर पहुंचे वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि जापान की कई कंपनियां भारत में निवेश के लिए तैयार हैं. पीयूष गोयल ने ये भी कहा कि टेक्नोलॉजी की कमी […]

UB India News27 अग॰