लोकसभा में सरकार ने ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ पेश कर दिया गया है। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने ये बिल पेश किया है। बिल पेश होने के बाद अब लोकसभा में बहस हो रही है। कांग्रेस ने इस बिल को संघीय ढांचे पर चोट बताया है। समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने भी इस बिल को लेकर विरोध जताया है।
संसद के शीतकालीन सत्र का मंगलवार (17 दिसंबर) को 17वां दिन है। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा के पटल पर एक देश, एक चुनाव के लिए 129वां संविधान संशोधन बिल पेश किया। एक देश, एक चुनाव बिल पेश होने के बाद सांसदों को इस पर बोलने का समय दिया गया। कई पार्टियों की आपत्ति के बाद बिल को दोबारा पेश करने को लेकर वोटिंग हुई। पक्ष में 269 और विपक्ष में 198 वोट पड़ने के बाद बिल पेश किया गया।
अमित शाह ने सदन में कहा कि बिल जब कैबिनेट में आया था, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि इसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजना चाहिए। कानून मंत्री ऐसा प्रस्ताव कर सकते हैं।
विरोध के विरोध में सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने कहा कि वन नेशन, वन इलेक्शन बिल, बीजेपी की देश में तानाशाही लाने की कोशिश है।
मेघवाल ने केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े 3 कानूनों में संशोधन का बिल भी पेश किया। इसमें द गवर्नमेंट ऑफ यूनियन टेरिटरीज एक्ट- 1963, द गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली- 1991 और द जम्मू एंड कश्मीर रीऑर्गनाइजेशन एक्ट- 2019 शामिल हैं। इसके जरिए जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के लिए भी संशोधन किया जा सकता है।
बिल पेश होने से पहले केंद्रीय कानून और न्याय मंत्रालय ने कहा कि आजादी के बाद से चुनाव आयोग लोकसभा और विधानसभाओं के 400 से ज्यादा चुनाव करा चुका है। अब हम एक देश, एक चुनाव का कॉन्सेप्ट लाने जा रहे हैं। एक हाईलेवल कमेटी इसका रोडमैप बना चुकी है। इससे प्रशासनिक क्षमता बढ़ेगी, चुनाव संबंधी खर्च में कमी आएगी और नीतिगत निरंतरता को बढ़ावा मिलेगा।
वहीं, राज्यसभा में संविधान पर विशेष चर्चा दूसरे दिन भी जारी रहेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शाम को चर्चा पर जवाब दे सकते हैं। इससे पहले PM ने 14 दिसंबर को लोकसभा में संविधान पर विशेष चर्चा में भाग लिया था। चर्चा के दौरान उन्होंने कांग्रेस को संविधान का शिकार करने वाली पार्टी बताया था।
जयराम रमेश का बीजेपी पर हमला
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने एएनआई से बात करते हुए कहा, “एक राष्ट्र, एक चुनाव विधेयक केवल पहला मील का पत्थर है, असली उद्देश्य एक नया संविधान लाना है. संविधान में संशोधन करना एक बात है, लेकिन एक नया संविधान लाना आरएसएस और पीएम मोदी का असली उद्देश्य है.”
सपा और कांग्रेस सांसद ने किया बिल का विरोध
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने इस बिल का विरोध किया है। सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने कहा कि ये बिल संविधान की मूल भावना पर चोट पहुंचाता है। संघीय ढाचे को खत्म करने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि एक राष्ट्र, एक चुनाव विधेयक संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत पर हमला है।
लोकसभा में दो बिल पेश होंगे
सरकार लोकसभा में एक देश-एक चुनाव से जुड़े 2 बिल पेश करेगी। दोनों बिल को 12 दिसंबर को केंद्रीय कैबिनेट से मंजूरी मिल चुकी है। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल पहले एक देश, एक चुनाव बिल पेश करेंगे।
दूसरा बिल केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े 3 कानूनों में संशोधन का है। इस बिल में द गवर्नमेंट ऑफ यूनियन टेरिटरीज एक्ट- 1963, द गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली- 1991 और द जम्मू एंड कश्मीर रीऑर्गनाइजेशन एक्ट- 2019 शामिल हैं। इसके जरिए जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के लिए भी संशोधन किया जा सकता है।
वन नेशन, वन इलेक्शन पर कोविंद कमेटी की पूरी रिपोर्ट: फायदे और नुकसान की कहानी
भारत एक लोकतांत्रिक देश है. आजादी के बाद से भारत में 400 से ज्यादा चुनाव हो चुके हैं जिनमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव शामिल हैं. हालांकि भारत में चुनाव अच्छी तरह से होते हैं, लेकिन क्या चुनाव की प्रक्रिया को और बेहतर बनाया जा सकता है?
भारत में शुरुआत में सभी चुनाव एक साथ होते थे. लेकिन धीरे-धीरे यह सिस्टम खत्म हो गया. इस मुद्दे पर भारत सरकार ने ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ के मुद्दे पर अध्ययन करने के लिए एक समिति बनाई थी. इस समिति के अध्यक्ष भारत के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद हैं.
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इसी साल सितंबर में इस रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया था और अब ‘एक देश, एक चुनाव’ लागू करने के लिए विधेयकों की मंजूरी भी दे दी है.
वन नेशन वन इलेक्शन: समिति ने कैसे किया काम?
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के मुद्दे पर अध्ययन करने के लिए समिति में कई मशहूर और अनुभवी लोग शामिल थे जो कानून, राजनीति, प्रशासन, वित्त और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में माहिर थे. समिति ने कुल 191 दिन तक इस मुद्दे पर अध्ययन किया. समिति ने राजनीतिक दलों, कानून के विशेषज्ञों, चुनाव आयोग के अधिकारियों, आम नागरिकों, व्यापारिक संगठनों और अर्थशास्त्रियों से इस मुद्दे पर राय ली. सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों से भी बातचीत की.
समिति ने चुनाव आयोग से भी इस मुद्दे पर सलाह ली. साथ ही अखबार और सोशल मीडिया के जरिए आम लोगों से भी सुझाव मांगे गए. समिति का उद्देश्य यह जानना था कि क्या भारत में ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ लागू करना संभव है और अगर हां, तो इसके लिए क्या-क्या करना होगा.
समिति को ईमेल, वेबसाइट और डाक से कुल 21,558 प्रतिक्रियाएं मिलीं. इनमें से 80% लोग ‘एक देश, एक चुनाव’ के पक्ष में थे. ये प्रतिक्रियाएं देश के हर कोने से आईं. जैसे लक्षद्वीप, अंडमान और निकोबार, नगालैंड, दादरा और नगर हवेली. सबसे ज्यादा प्रतिक्रियाएं तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, पश्चिम बंगाल, गुजरात और उत्तर प्रदेश से आईं.
कितनी राजनीतिक पार्टियों ने दिया समर्थन
समिति को 47 राजनीतिक दलों से भी प्रतिक्रिया मिली. 15 राजनीतिक दलों को छोड़कर, बाकी 32 राजनीतिक दलों ने एक साथ चुनाव की व्यवस्था का पूरी तरह से समर्थन किया. हालांकि, एक साथ चुनाव का विरोध करने वाली पार्टियों का कहना था कि इसे अपनाने से संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन हो सकता है, यह लोकतंत्र और संघीयता के खिलाफ हो सकता है, क्षेत्रीय पार्टियों को हाशिए पर डाल सकता है, राष्ट्रीय पार्टियों का प्रभुत्व बढ़ा सकता है और इससे सरकार का राष्ट्रपति शासन की ओर झुकाव हो सकता है.
‘वन नेशन वन इलेक्शन’ पर विशेषज्ञों की राय
‘वन नेशन वन इलेक्शन’ पर बनी समिति ने इस मुद्दे पर कई विशेषज्ञों से राय ली, जिनमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त, राज्य चुनाव आयुक्त, बार काउंसिल ऑफ इंडिया के विशेषज्ञ शामिल थे.
ज्यादातर विशेषज्ञों ने ‘एक देश एक चुनाव’ का समर्थन किया. उन्होंने बताया कि 1960 के दशक से भारत में राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग करने के लिए अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल किया जाने लगा. इसके अलावा अस्थिर सरकारों, अविश्वास प्रस्ताव और ऐसी ही कई घटनाओं के कारण भी चुनाव समय से पहले होने लगे. इस वजह से लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग समय पर होने लगे.
विशेषज्ञों का मानना था कि ‘एक देश एक चुनाव’ लागू करने के लिए संविधान और कानूनों में बदलाव करना जरूरी है. लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा करना लोकतंत्र और संविधान के खिलाफ नहीं होगा. कुछ लोगों को डर था कि इससे क्षेत्रीय दलों को नुकसान होगा. लेकिन विशेषज्ञों ने कहा कि ऐसा नहीं होगा क्योंकि भारत के वोटर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों में फर्क समझते हैं. वो यह भी जानते हैं कि कौन सा दल किस स्तर पर काम करता है.
एक साथ चुनाव: क्या होंगे फायदे?
वन नेशन वन इलेक्शन पर बनी समिति ने राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों और अन्य लोगों से बात करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि एक साथ चुनाव होने से कई फायदे होंगे. समिति का मानना है कि एक साथ चुनाव होने से चुनाव की प्रक्रिया और सरकार के कामकाज में काफी बदलाव आएगा.
- चुनाव में बहुत पैसा खर्च होता है. एक साथ चुनाव होने से इस खर्च में कमी आएगी.
- एक साथ चुनाव होने से ज्यादा लोग वोट देने आएंगे.
- बार-बार चुनाव होने से सरकार का ध्यान विकास के कामों से हट जाता है. एक साथ चुनाव होने से सरकार बिना किसी रुकावट के काम कर पाएगी और देश का ज्यादा विकास होगा.
- बार-बार चुनाव होने से देश की आर्थिक तरक्की पर भी असर पड़ता है. एक साथ चुनाव होने से यह समस्या भी कम होगी.
- कंपनियों को भी इससे फायदा होगा क्योंकि उनके कर्मचारी बार-बार चुनाव में वोट देने नहीं जाएंगे और उत्पादन में कोई रुकावट नहीं आएगी.
- मजदूर खासकर प्रवासी मजदूरों को भी इससे फायदा होगा क्योंकि उन्हें बार-बार अपने गांव नहीं जाना पड़ेगा. उनकी मजदूरी में भी कोई कटौती नहीं होगी.
सबसे अहम कारण यह है कि बार-बार होने वाले चुनाव अनिश्चितता का माहौल पैदा करते हैं. यह अनिश्चितता हर चुनाव से महीनों पहले सरकारी तंत्र को धीमा कर देती है. राजनीतिक दलों को आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेने के लिए प्रेरित किया जाता है. जब बार-बार चुनाव होते हैं, तो अक्सर पांच साल का आधा समय चुनाव प्रचार में ही बीत जाता है.
समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अच्छी सरकार के लिए यह जरूरी है कि देश में स्थिरता हो. अगर स्थिरता होगी, तो सरकार अच्छे फैसले ले पाएगी और देश का तेजी से विकास होगा. लेकिन अगर अस्थिरता रहेगी, तो सरकार कोई भी फैसला लेने से डरेगी और देश का विकास रुकेगा.
एक साथ चुनाव कराने से क्या नुकसान होने की संभावना?
आम आदमी पार्टी ने 18 जनवरी 2024 को अपने पत्र के जरिए और 8 फरवरी 2024 को उच्चस्तरीय समिति के साथ व्यक्तिगत बातचीत में ‘एक देश, एक चुनाव’ के विचार का विरोध किया. पार्टी ने यह तर्क दिया कि एक साथ चुनाव की व्यवस्था लागू करने से लोकतंत्र, संविधान की मूल संरचना और देश की संघीय व्यवस्था कमजोर होगी. उनका कहना था कि यह प्रस्ताव ‘राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था को संस्थागत करेगा, जिसे अविश्वास प्रस्ताव से हटाया नहीं जा सकता.’
कांग्रेस पार्टी ने 17 जनवरी 2024 एक चिट्ठी लिखकर ‘एक देश, एक चुनाव’ का विरोध किया. उनका कहना था कि इससे संविधान की बुनियाद ही बदल जाएगी. यह संघीय ढांचे और संसदीय लोकतंत्र के खिलाफ होगा. उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव में बहुत ज्यादा खर्च होता है, यह बात गलत है और लोग लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए यह खर्च करने को तैयार हैं. उन्होंने यह भी कहा कि जहां संसदीय प्रणाली हो, वहां एक साथ चुनाव कराने का कोई तुक नहीं बनता. समिति ने पार्टी से आमने-सामने बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.
बहुजन समाज पार्टी ने 14 दिसंबर 2023 को अपने लेटर में कहा, समिति को ‘एक देश, एक चुनाव’ लागू करने के लिए एक पूरी योजना बनानी चाहिए. हालांकि उन्होंने इस विचार का खुलेआम विरोध नहीं किया, लेकिन उन्होंने यह जरूर कहा कि भारत जैसे बड़े देश में इसे लागू करना मुश्किल हो सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि हमें पहले अपने मौजूदा चुनाव सिस्टम को और मजबूत और बेहतर बनाना चाहिए. उसके बाद ही कोई बड़ा बदलाव लाना चाहिए. असली समस्या यह है कि चुनाव निष्पक्ष और ईमानदार तरीके से होने चाहिए. सभी को कानून का पालन करना चाहिए.
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने 7 दिसंबर 2023 को अपने पत्र में एक साथ चुनाव के विचार को लागू करने के तरीके पर आपत्ति जताई. उन्होंने यह कहा कि समान चुनावों का विचार ‘मूल रूप से लोकतंत्र के खिलाफ है और यह संविधान में निर्धारित संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली की जड़ को कमजोर करता है.’

वन नेशन वन इलेक्शन को लेकर क्या हैं चिंताएं?
भारत जैसे बड़े और विविधता भरे देश में सभी चुनाव एक साथ कराना एक मुश्किल काम है. इसके लिए कई चीजों पर ध्यान देना जरूरी है. जैसे: क्या यह संविधान और कानून के मुताबिक होगा? क्या सरकार के पास इतने संसाधन हैं कि वो सभी चुनाव एक साथ करा सके? क्या सभी राजनीतिक दल इसके लिए तैयार हैं?
कुछ लोगों का मानना है कि एक देश एक चुनाव लागू करने से संविधान का उल्लंघन होगा. उनका तर्क है कि अगर किसी राज्य की विधानसभा को उसके 5 साल के कार्यकाल से पहले भंग कर दिया जाता है, तो यह उस राज्य की जनता की इच्छा के खिलाफ होगा. संविधान में यह लिखा है कि लोकसभा और विधानसभाओं का कार्यकाल 5 साल का होगा, जब तक कि उन्हें पहले भंग न कर दिया जाए. इसलिए, अगर चुनाव एक साथ कराने के लिए इनके कार्यकाल में बदलाव किया जाता है, तो यह संविधान का उल्लंघन होगा. अगर विधानसभाओं के कार्यकाल को बढ़ाया या घटाया जाता है, तो यह राज्यों के अधिकारों का हनन होगा. यह उन नागरिकों के अधिकारों का भी हनन होगा जिन्होंने अपने प्रतिनिधि चुने हैं.
जब भी चुनाव होते हैं, तो जनता यह चाहती है कि उसकी चुनी हुई सरकार 5 साल तक काम करे और देश को आगे बढ़ाए. लेकिन कई बार ऐसा नहीं हो पाता. कभी-कभी किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है और सरकार बनाने में मुश्किल होती है. कभी-कभी सरकार में शामिल दलों के बीच मतभेद हो जाते हैं और सरकार गिर जाती है. जब चुनी हुई सरकार 5 साल पूरे करने से पहले ही गिर जाती है, तो उस राज्य में फिर से चुनाव कराने पड़ते हैं. इससे लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग समय पर होने लगते हैं और एक साथ चुनाव का सिस्टम टूट जाता है.
एक साथ चुनाव से चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता कमजोर नहीं होगी?
समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कुछ लोग कहते हैं कि एक साथ चुनाव होने से चुनाव निष्पक्ष नहीं रहेंगे. लेकिन यह बात गलत है. आजकल हर चुनाव में चाहे वो छोटे से छोटा चुनाव ही क्यों न हो, पूरे देश का ध्यान जाता है. ऐसे में, अगर सभी चुनाव एक साथ होंगे, तो समय और पैसों की बचत होगी और चुनाव में शामिल लोग अपना काम अच्छे से कर पाएंगे. इससे चुनाव जीतने वाले लोगों को बिना किसी रुकावट के 5 साल तक देश के लिए काम करने का मौका मिलेगा. एक साथ चुनाव होने से चुनाव में पैसों का खेल भी कम होगा जो कि एक बड़ी समस्या है.







