क्या लोकसभा में ही कमजोर साबित हुई मोदी सरकार?

17 दिसंबर को लोकसभा में गरमागरम बहस के बाद 129वां संविधान (संशोधन) विधेयक 2024 पेश किया गया. यह बिल लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की बात करता है. संसद में इस बिल पर काफी बहस हुई, लेकिन आखिरकार इसे जांच के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेज दिया गया. […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 19 दिसंबर 2024, 05:46 AM 8 मिनट read
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क्या लोकसभा में ही कमजोर साबित हुई मोदी सरकार?
Photo: UB India News Archive

17 दिसंबर को लोकसभा में गरमागरम बहस के बाद 129वां संविधान (संशोधन) विधेयक 2024 पेश किया गया. यह बिल लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की बात करता है. संसद में इस बिल पर काफी बहस हुई, लेकिन आखिरकार इसे जांच के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेज दिया गया.

लोकसभा में इस बिल के पक्ष में 269 वोट पड़े, जबकि 198 सांसदों ने इसका विरोध किया. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने एक देश एक चुनाव के लिए 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति गठित कर दी है.

समिति की अध्यक्षता बीजेपी के वरिष्ठ सांसद पीपी चौधरी करेंगे. ये समिति अपनी रिपोर्ट लोकसभा के अगले सत्र में सौंपेगी. इस समिति में प्रियंका गांधी, अनुराग ठाकुर समेत लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्यों को जगह दी गई है.

लोकसभा में कैसे पेश हुआ बिल
केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने मंगलवार दोपहर 12:10 बजे लोकसभा में ‘एक देश, एक चुनाव’ बिल पेश किया. विपक्ष ने इसका विरोध करते हुए हंगामा किया. स्पीकर ओम बिरला ने पहले इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग कराई. इसमें 369 सदस्यों ने वोट डाला. बिल के पक्ष में 220 और विपक्ष में 149 वोट पड़े. इसपर विपक्ष ने आपत्ति जताई.

तब गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि अगर ऑब्जेक्शन है तो पर्ची से वोट करा लीजिए. स्पीकर ने भी ऐसा ही कहा. इस बार पहले से ज्यादा सांसदों ने बिल के पक्ष में वोट डाला. पक्ष में कुल 269 और विपक्ष में 198 मत पड़े. इसके बाद दोपहर 1:15 बजे कानून मंत्री ने दोबारा बिल पेश किया.

लोकसभा में ही कमजोर साबित हुई मोदी सरकार?
लोकसभा में कई विपक्षी सांसदों ने बिल पेश करने का विरोध किया और इसके लिए नोटिस भी दिया. लोकसभा के नियमों के अनुसार, कोई भी सदस्य बिल पेश करने से पहले इसका विरोध करने का नोटिस दे सकता है. विपक्ष के कड़े विरोध और मतदान के बावजूद सरकार ने ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ बिल लोकसभा में पेश कर दिया.

जब ‘एक देश, एक चुनाव’ वाला बिल लोकसभा में पेश किया गया, तो विपक्षी सांसदों ने दावा किया कि सरकार को बिल पेश करने के लिए दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला. उनका कहना था कि यह सरकार की हार है, क्योंकि विपक्ष ने भारी विरोध किया और संख्या में भी कमजोरी दिखाई दी.

लेकिन असल में लोकसभा के नियमों के अनुसार, संविधान संशोधन विधेयक को पेश करने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत नहीं होती है. सिर्फ आधे से ज्यादा सांसदों की मौजूदगी और उनमें से दो-तिहाई का समर्थन ही काफी होता है. इसलिए, तकनीकी रूप से सरकार ने आवश्यक बहुमत हासिल किया था और बिल को पेश करने में कोई गलती नहीं की.

जानिए संविधान संशोधन बिल का नियम क्या कहता है?
एम.एन. कौल और एस.एल. शक्धर की किताब ‘प्रैक्टिस एंड प्रोसीजर ऑफ पार्लियामेंट’ के अनुसार, संविधान संशोधन बिल को पास करने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत सिर्फ आखिरी चरण में होती है. हालांकि, सावधानी के तौर पर सभी प्रभावी चरणों के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता नियमों में दी गई है. जैसे:

  • बिल पर विचार करने का प्रस्ताव
  • समिति की रिपोर्ट के बाद बिल पर विचार करने का प्रस्ताव
  • बिल के अनुच्छेदों और अनुसूचियों को पास करना
  • बिल को पास करने का प्रस्ताव

लेकिन, बिल पर जनता की राय जानने के लिए या बिल को किसी समिति को भेजने के लिए सिर्फ साधारण बहुमत की जरूरत होती है.

संविधान संशोधन बिल पर लोकसभा के नियम क्या कहते हैं?
लोकसभा के नियमों में संविधान संशोधन बिल को लेकर स्पष्ट बात कही गई है. नियम 157 के अनुसार, अगर बिल को लेकर कोई प्रस्ताव है, जैसे कि बिल पर विचार किया जाए या समिति की रिपोर्ट के बाद बिल पर विचार किया जाए या बिल को पास किया जाए, तो उस प्रस्ताव को पास मानने के लिए दो चीजें जरूरी हैं- लोकसभा के कुल सदस्यों के बहुमत का समर्थन होना चाहिए. साथ ही उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई से ज्यादा का समर्थन मिलना चाहिए.

संविधान संशोधन बिल: वोटिंग कैसे होती है?
लोकसभा के नियम 158 के अनुसार, जब किसी प्रस्ताव को पास करने के लिए ज्यादातर सांसदों का समर्थन और वोट देने वाले दो-तिहाई से ज्यादा सांसदों का समर्थन चाहिए होता है, तो वोटिंग ‘डिवीजन’ तरीके से की जाएगी. इस तरीके में सभी सांसदों को अपना वोट ‘हां’ या  ‘ना’ में देना होता है.

इस प्रक्रिया में सांसद अपनी सीट से उठकर ‘हां’ या ‘ना’ में अपना वोट देते हैं. अगर वोटिंग के बाद यह पता चलता है कि ज्यादातर सांसद और वोट देने वाले दो-तिहाई से ज्यादा सांसद प्रस्ताव के पक्ष में हैं, तो स्पीकर नतीजे बताते हुए कहेंगे कि प्रस्ताव पास हो गया है क्योंकि ज्यादातर सांसद और वोट देने वाले दो-तिहाई से ज्यादा सांसद इसके पक्ष में हैं.

संविधान में कौन से संशोधन प्रस्तावित किए गए?
कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा में दो बिल पेश किए. एक संविधान संशोधन बिल, जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की अवधि को एक जैसा बनाने के लिए है. दूसरा बिल केंद्र शासित प्रदेशों और राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक साथ चुनाव कराने के लिए आवश्यक कानूनों में बदलाव के लिए है.

‘संविधान (129वां संशोधन) विधेयक 2024’ बिल में संविधान के तीन अनुच्छेदों में बदलाव और एक नया अनुच्छेद 82A जोड़ने का प्रस्ताव है.  यह अनुच्छेद 82 के बाद आएगा, जो लोकसभा सीटों के बंटवारे से संबंधित है. यह नया अनुच्छेद 82A लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की बात करता है. इस अनुच्छेद के पहले हिस्से में कहा गया है कि राष्ट्रपति चुनाव के बाद लोकसभा की पहली बैठक वाले दिन एक नोटिफिकेशन जारी करके इस नियम को लागू कर सकते हैं. उस दिन को ‘नियत तारीख’ कहा जाएगा.

इस नए अनुच्छेद के दूसरे हिस्से में कहा गया है कि ‘नियत तारीख’ के बाद और लोकसभा का कार्यकाल पूरा होने से पहले चुनी गई सभी विधानसभाओं का कार्यकाल लोकसभा के कार्यकाल के साथ ही खत्म हो जाएगा. इसका मतलब है कि कुछ राज्यों की विधानसभाओं का 5 साल का कार्यकाल पहले ही खत्म हो जाएगा ताकि लोकसभा के साथ चुनाव कराए जा सकें.

वन नेशन, वन इलेक्शन बिल पर क्या लोकसभा में ही कमजोर साबित हुई मोदी सरकार?

अनुच्छेद 82A(3)कहता है कि चुनाव आयोग लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराएगा. वहीं अनुच्छेद 82A(4) ‘एक साथ चुनाव’ को परिभाषित करता है. इसका मतलब है लोकसभा और सभी विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराना.

इस नए अनुच्छेद के पांचवें हिस्से में चुनाव आयोग को यह छूट दी गई है कि वह चाहे तो किसी राज्य विधानसभा का चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ न कराए. अगर चुनाव आयोग को लगता है कि किसी राज्य विधानसभा का चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ नहीं कराया जा सकता, तो वह राष्ट्रपति को सिफारिश कर सकता है कि उस विधानसभा का चुनाव बाद में कराया जाए. इसके अगले हिस्से में अनुच्छेद 82A(6) में कहा गया है कि अगर विधानसभा चुनाव टाला जाता है तो उस विधानसभा का कार्यकाल भी लोकसभा के कार्यकाल के साथ ही खत्म होगा.

लोकसभा के कार्यकाल से जुड़े प्रस्तावित नियम
संविधान के अनुच्छेद 83, 172, और 327 में भी बदलाव करने का प्रस्ताव है. अनुच्छेद 83 लोकसभा और राज्यसभा के कार्यकाल से संबंधित है. इसमें पहले से दो हिस्से हैं, जो राज्यसभा और लोकसभा के कार्यकाल के बारे में बताते हैं. अब इसमें पांच नए हिस्से 83(3) से 83(7) जोड़े जा रहे हैं. 83(3) लोकसभा के ‘पूर्ण कार्यकाल’ को परिभाषित करेगा. इसका मतलब होगा कि लोकसभा की पहली बैठक से पांच साल तक का समय. नए हिस्सों में मध्यावधि चुनाव और लोकसभा के बचे हुए समय से संबंधित प्रावधान जोड़े जाएंगे.

अनुच्छेद 83(5) के अनुसार, अगर लोकसभा अपनी पांच साल की अवधि खत्म होने से पहले भंग हो जाती है, तो भंग हुई लोकसभा के बाद जो नई लोकसभा बनेगी वह सिर्फ उस बचे हुए समय के लिए ही कार्य करेगी, जो पिछली लोकसभा का बचा हुआ समय है. इस अनुच्छेद के अगले हिस्से में कहा गया है कि नई लोकसभा को पुराने सदन का ‘जारी हिस्सा’ नहीं माना जाएगा. यह एक नया सदन होगा. अनुच्छेद 83(7) कहता है कि ‘शेष अवधि’ के लिए लोकसभा के चुनाव को ‘मध्यवर्ती चुनाव’ कहा जाएगा और उसके बाद के चुनाव को आम चुनाव कहा जाएगा.

अनुच्छेद 327: यह अनुच्छेद चुनावों से जुड़े कई मामलों में संसद को कानून बनाने का अधिकार देता है, जैसे कि मतदाता सूची बनाना, चुनाव क्षेत्रों का निर्धारण आदि. इस अनुच्छेद में एक छोटा सा बदलाव किया जा रहा है. अब संसद को ‘एक साथ चुनाव’ कराने के लिए भी कानून बनाने का अधिकार होगा.

इसके अलावा केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2024 में भी कुछ बदलाव किए जाने का प्रस्ताव है. यह बिल केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं के कार्यकाल से जुड़े कानूनों में बदलाव करेगा, ताकि उन्हें भी लोकसभा के साथ ही चुनाव कराए जा सकें.

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