ISRO ने किया डॉकिंग ट्रायल , पहुंचा लक्ष्य के बिल्कुल करीब…..

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट (SpaDeX) प्रोजेक्ट अपने लक्ष्य के बिल्कुल करीब पहुंचने के बाद भी मिशन को पूरा नहीं कर पाया। ISRO ने बताया कि दोनों सैटेलाइट्स की दूरी को 15 मीटर से 3 मीटर तक लाने की कोशिश सफल रही, जिसके बाद दोनों सैटेलाइट्स को एक दूसरे से दूर […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
रविवार, 12 जनवरी 2025, 06:19 AM 6 मिनट read
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ISRO ने  किया डॉकिंग ट्रायल , पहुंचा लक्ष्य के बिल्कुल करीब…..
Photo: UB India News Archive

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट (SpaDeX) प्रोजेक्ट अपने लक्ष्य के बिल्कुल करीब पहुंचने के बाद भी मिशन को पूरा नहीं कर पाया। ISRO ने बताया कि दोनों सैटेलाइट्स की दूरी को 15 मीटर से 3 मीटर तक लाने की कोशिश सफल रही, जिसके बाद दोनों सैटेलाइट्स को एक दूसरे से दूर कर दिया गया है। अब डाटा विश्लेषण के बाद डॉकिंग की कोशिश की जाएगी। आज ये तीसरी कोशिश थी। इससे पहले भी डॉकिंग प्रोसेस को दो बार टालना पड़ गया था।

ISRO ने बताया, डॉकिंग ट्रायल का डेटा एनालिसिस किया जा रहा है। इसके बाद आगे की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। दरअसल स्पेडेक्स मिशन की डॉकिग दो बार टल चुकी है। पहले 7 जनवरी फिर 9 जनवरी को डॉकिंग किया जाना था।

ISRO ने 30 दिसंबर को श्रीहरिकोटा से रात 10 बजे SpaDeX यानी स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट मिशन लॉन्च किया था। इसके तहत PSLV-C60 रॉकेट से दो स्पेसक्राफ्ट को पृथ्वी से 470 किमी ऊपर डिप्लॉय किए गए थे।

यदि मिशन आगे सफल रहता है तो रूस, अमेरिका और चीन के बाद भारत ऐसा करने वाला चौथा देश बन जाएगा। मिशन की कामयाबी पर ही भारत का चंद्रयान-4 मिशन निर्भर है, जिसमें चंद्रमा की मिट्टी के सैंपल पृथ्वी पर लाए जाएंगे। चंद्रयान-4 मिशन को 2028 में लॉन्च किया जा सकता है।

डॉकिंग की तीसरी कोशिश

अंतरिक्ष में दो सैटेलाइट्स को आपस में जोड़ने की जटिल प्रक्रिया को स्पेस डॉकिंग कहा जाता है। डॉकिंग की ये तीसरी कोशिश शनिवार आधी रात के बाद शुरू हुई, जिसके तहत स्लो ड्रिफ्ट तकनीक का इस्तेमाल करते हुए दोनों सैटेलाइट्स के बीच की दूरी महज 15 मीटर लाया गया। उस समय ISRO ने कहा कि दोनों सैटेलाइट्स एक दूसरे से मिलन को तैयार हैं। 9 जनवरी को किए गए प्रयास के तहत जब दोनों सैटेलाइट्स के बीच की दूरी 230 मीटर थी, तभी सैटेलाइट का ड्रिफ्ट यानी भटकाव उम्मीद से ज्यादा हो गया और मिशन को टालना पड़ गया था।

क्यों रोकी गई डॉकिंग प्रक्रिया?

आज तड़के जब दोनों सैटेलाइट्स की बीच की दूरी 15 मीटर रह गई, तब पूरा देश ये उम्मीद करने लगा कि इस बार डॉकिंग सफल रहेगी। कुछ देर तक इस पोजीशन पर सैटेलाइट्स को होल्ड किया गया। दोनों सैटेलाइट्स से एक दूसरे की तस्वीरें और वीडियो बनाया गया, जिसके बाद अगले पड़ाव की कोशिश शुरू हो गई। सैटेलाइट्स को 15 से 3 मीटर की दूरी पर लाया गया, तभी कुछ गड़बड़ी हुई और दोनों सैटेलाइट्स को एक दूसरे से सुरक्षित दूरी तक ले जाया गया।

पिछली कोशिश में ड्रिफ्ट यानी दोनों के बीच भटकाव ज्यादा हो गया था। दोनों सेटेलाइट को एक दूसरे से मिलाने के लिए दोनों का एक सीध में होना बेहद अहम है। दोनों की दिशा में थोड़ा सा भी भटकाव डॉकिंग को नाकाम कर सकता है। इस बार ड्रिफ्ट यानी भटकाव को जीरो डिग्री पर बनाए रखने में इसरो के वैज्ञानिक कामयाब रहे, लेकिन एक अहम सेंसर से सिग्नल मिलने में देरी हो गई। ISRO के सूत्रों ने बताया कि डॉकिंग के लिए जरूरी प्रोक्सिमिटी एंड डॉकिंग सेंसर के बर्ताव में गड़बड़ी देखी गई। सैटेलाइट्स की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ऑन बोर्ड सिस्टम्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि जरा सी गड़बड़ी होने पर भी सैटेलाइट्स का सेफ्टी मोड खुद ब खुद ऑन हो जाता है और सैटेलाइट्स एक दूसरे से सुरक्षित दूरी पर चले जाते हैं।

कब होगी डॉकिंग की कोशिश?

ISRO के सूत्रों के मुताबिक, आज कुछ ऐसा ही हुआ। अब प्रोक्सिमिटी एंड डॉकिंग सेंसर के बर्ताव में हुई गड़बड़ी का विस्तार से आकलन किया जा रहा है।  इस खामी को दूर करने के बाद ही अब डॉकिंग की अगली कोशिश की जाएगी। ISRO सूत्रों के मुताबिक, आज शाम को दोनों सैटेलाइट्स एक बार फिर इसरो के ग्राउंड स्टेशन के ऊपर से गुजरेंगे, तब डॉकिंग की एक कोशिश की जा सकती है, लेकिन अगर तब तक खामी का आकलन नहीं हो पाता है, तो फिर अगले अवसर का इंतजार करना पड़ेगा। ISRO सूत्रों के मुताबिक, दो दिनों के बाद इन दोनों सैटेलाइट्स की विजिबिलिटी भारत में मौजूद ग्राउंड्स स्टेशन से नहीं मिल पाएगी। ऐसे में हमें डॉकिंग के अगले अवसर के लिए मार्च महीने तक इंतजार करना पड़ सकता है।

SPADEX डॉकिंग ट्रायल की 2 तस्वीरें…

यह तस्वीर सैटेलाइट में लगे कैमरे से ली गई है। जब दोनों सैटेलाइट एक-दूसरे से सिर्फ 15 मीटर दूर थे।
यह तस्वीर सैटेलाइट में लगे कैमरे से ली गई है। जब दोनों सैटेलाइट एक-दूसरे से सिर्फ 15 मीटर दूर थे।
पहले 15 मीटर फिर 3 मीटर तक नजदीक आने के बाद सैटेलाइट को वापस सेफ डिस्टेंस पर ले जाया गया।
पहले 15 मीटर फिर 3 मीटर तक नजदीक आने के बाद सैटेलाइट को वापस सेफ डिस्टेंस पर ले जाया गया।

स्पेडेक्स मिशन ऑब्जेक्टिव: डॉकिंग और अनडॉकिंग टेक्नोलॉजी दुनिया को दिखाना

  • पृथ्वी की निचली कक्षा में दो छोटे स्पेसक्राफ्ट की डॉकिंग और अनडॉकिंग की टेक्नोलॉजी दिखाना।
  • डॉक किए गए दो स्पेसक्राफ्ट्स के बीच इलेक्ट्रिक पावर ट्रांसफर करने की टेक्नोलॉजी का प्रदर्शन करना।
  • स्पेस डॉकिंग का मतलब है स्पेस में दो अंतरिक्ष यानों को जोड़ना या कनेक्ट करना।

स्पेडेक्स मिशन प्रोसेस: जानिए कैसे नजदीक आए दोनों सैटेलाइट

30 दिसंबर को PSLV-C60 रॉकेट से 470 किमी की ऊंचाई पर दो छोटे स्पेसक्राफ्ट टारगेट और चेजर को अलग-अलग कक्षाओं में लॉन्च किया गया।

डिप्लॉयमेंट के बाद, दोनों स्पेसक्राफ्ट्स करीब 28,800 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से अंतरिक्ष में गए। ये रफ्तार बुलेट की स्पीड से 10 गुना ज्यादा थी।

दोनों स्पेसक्राफ्ट्स के बीच सीधा कम्युनिकेशन लिंक नहीं किया गया। इन्हें जमीन से गाइड किया गया। दोनों स्पेसक्रॉफ्ट को एक-दूसरे के करीब लाया गया।

5 किमी से 0.25 किमी के बीच की दूरी तय करते समय लेजर रेंज फाइंडर का उपयोग किया गया। 300 मीटर से 1 मीटर की रेंज के लिए डॉकिंग कैमरे का इस्तेमाल होगा। वहीं 1 मीटर से 0 मीटर तक की दूरी पर विजुअल कैमरा उपयोग में आएगा।

सक्सेसफुल डॉकिंग के बाद, दोनों स्पेसक्राफ्ट के बीच इलेक्ट्रिकल पावर ट्रांसफर को दिखाया जाएगा। फिर स्पेसक्राफ्ट्स की अनडॉकिंग होगी और ये दोनों अपने-अपने पेलोड के ऑपरेशन को शुरू करेंगे। करीब दो साल तक ये इससे वैल्युएबल डेटा मिलता रहेगा।

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