बिहार के महामहिम राज्यपाल की सक्रियता से उठे सवाल !

जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर 12 दिनों से आमरण अनशन पर हैं. नीतीश सरकार की ओर से अनशन को खत्म करवाने की कोई खास पहल अब तक नहीं दिखी है. इस बीच राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान की ओर से राजभवन ने प्रशांत किशोर की टीम को यह संदेश भेजा है कि अपने प्रतिनिधियों को […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
सोमवार, 13 जनवरी 2025, 08:15 AM 5 मिनट read
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बिहार के महामहिम राज्यपाल की सक्रियता से उठे सवाल !
Photo: UB India News Archive

जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर 12 दिनों से आमरण अनशन पर हैं. नीतीश सरकार की ओर से अनशन को खत्म करवाने की कोई खास पहल अब तक नहीं दिखी है. इस बीच राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान की ओर से राजभवन ने प्रशांत किशोर की टीम को यह संदेश भेजा है कि अपने प्रतिनिधियों को भेजिए जिनसे राज्यपाल बात करेंगे और गतिरोध को दूर करने का प्रयास करेंगे. राज्यपाल की ओर से विवाद खत्म कराने की पहल को राजभवन की सक्रियता से जोड़कर देखा जा रहा है. दरअसल, इस पहल को लेकर चर्चा इस बात की हो रही है कि क्या राज्य में एक निर्वाचित सरकार के रहते राजभवन को ऐसे मामलों में एक्टिव होना चाहिए? क्या राज्यपाल की अति सक्रियता तो नहीं दिख रहे? क्या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को यह बात पसंद आएगी कि उनकी सरकार के बदले राजभवन ऐसे मामलों में आगे आए?

बता दें कि बीपीएससी 70वीं पीटी परीक्षा को रद्द करवाने की मांग को लेकर प्रशांत किशोर आंदोलन पर रहे हैं और इसी क्रम में वह आमरण अनशन कर रहे हैं. उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद बीते 7 जनवरी को उनको मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया था. कुछ दिनों तक वह आईसीयू में रहे फिर आइसोलेशन वार्ड में भी उनको रखा गया. मेदांता अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद वह पटना के मरीन ड्राइव के पास नये सिरे से आंदोलन को चलाने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन पटना जिला प्रशासन ने इसकी अनुमति नहीं दी. इस बीच प्रशांत किशोर का अनशन जारी है, लेकिन राज्यपाल की पहल को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. सवाल यह कि क्या नीतीश सरकार राज्यपाल की अति सक्रियता बर्दाश्त करेगी क्योंकि केरल में आरिफ मोहम्मद खान के ऐसे ही व्यवहार पर बवाल मचता था.

दरअसल, बिहार के नए राज्यपाल के रूप में जब से आरिफ मोहम्मद खान के नाम की घोषणा हुई तभी से इस बात का चर्चा है कि क्या उनकी नीतीश सरकार से निभ पाएगी? हालांकि, उदाहरण देखें तो पिछले राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर के जमाने में भी जब राजद-जदयू की मिली जुली महागठबंधन सरकार थी तो राजभवन से काफी टकराव हुए थे. शिक्षा मंत्री और कई अधिकारियों के फैसलों के कारण सरकार और राजभवन के बीच टकराव की स्थिति भी आई. लेकिन, इस दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार परिपक्व व्यवहार करते रहे और उन टकरावों को आगे जाने नहीं दिया. लेकिन, अब एक बार फिर राजभवन एक्टिव है तो नीतीश सरकार की टेंशन बढ़ने की बात कही जाने लगी है.

बिहार सरकार-राजभवन में अभी तक सब ठीक-ठाक!
हालांकि, यहां यह भी बता दें कि बिहार में भी जब आरिफ मोहम्मद खान ने शपथ ग्रहण के बाद पहला बड़ा फैसला जो किया गया वह भी नीतीश सरकार के मनोनुकूल ही रहा. उन्होंने सीएम नीतीश के कहने पर चार विश्वविद्यालयों के कुलपति नियुक्त किये. लेकिन, यहां यह बात जरूरी है कि आरिफ मोहम्मद खान का राज्यपाल के रूप में पिछला इतिहास जो रहा है, उसके कारण बिहार में भी सवाल खड़े हो रहे हैं.

आरिफ साहब के साथ केरल के कार्यकाल का इतिहास
दरअसल, केरल के राज्यपाल रहते हुए आरिफ मोहम्मद खान ने काफी सक्रियता दिखाई थी. वर्ष 2019 में जब उन्हें केरल का राज्यपाल बनाया गया तो केरल की पिनराई विजयन सरकार और केरल गवर्नर हाउस के साथ टकराव की खबरें आती रहीं. कुलपति नियुक्ति के मामले हों या फिर अन्य मामले, सत्ताधारी सीपीएम नेतृत्व वाले गठबंधन लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट सरकार की नाक में उन्होंने दम कर रखा था.

कुलपतियों के मामले में राज्य सरकार से राजभवन की ठनी
एक समय स्थिति ऐसी आ गई कि सीएम पिनरई विजयन की ओर से भेजे गए दर्जनभर विधेयकों पर उन्होंने हस्ताक्षर नहीं किए. विजयन सरकार ने एक यूनिवर्सिटी के कुलपति के जनसंपर्क अधिकारी को निलंबित कर द‍िया तो आर‍िफ मोहम्‍मद खान ने अपनी शक्‍त‍ियों का उपयोग करते हुए उन्‍हें फ‍िर से पद पर तैनात कर दिया. हालात यहां तक आ गए क‍ि उन्‍होंने राज्य की 11 यूनिवर्सिटी के कुलपतियों को इस्तीफा देने के ल‍िए कह द‍िया.

राज्यपाल ने केरल की विजयन सरकार की नाक में किया दम!
केरल की पिनराई विजयन सरकार प्रदेश के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान साहब से इतनी परेशान हो गई थी कि बगल के राज्य तमिलनाडु की एक स्टालिन सरकार से मिलकर रणनीति बनानी शुरू कर दी थी. हालात इतने बिगड़ गए थे कि राज्यपाल से धक्का मुक्की तक हो गई थी. एक दौर ऐसा भी आया जब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार ने यह आरोप लगाए कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए काम करते हैं.

क्या नीतीश सरकार को भाएगी राजभवन की अति सक्रियता?
वहीं, सीएए और कृषि कानून जैसे मुद्दों पर जिस तरह से आरिफ मोहम्मद खान ने केंद्र की भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार का खुलकर पक्ष लिया तो वामपंथी सरकार ने इसे संघ परिवार और वाम मोर्चा सरकार के बीच संघर्ष करार दिया था. सवाल उठ रहा है कि अब बिहार में क्या ऐसी ही स्थिति बनेगी? प्रशांत किशोर के मामले को लेकर राज्यपाल और राजभवन की सक्रियता देखी जा रही है तो सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस मामले में नीतीश सरकार चुप बैठेगी?

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