अंतरिक्ष यात्रियों के शरीर में किस तरह के होते हैं बदलाव ……….

9 महीने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर फंसी भारतीय मूल की सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर आखिरकार पृथ्वी पर सकुशल लौट आए हैं। बुधवार सुबह एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स के ड्रैगन यान से फ्लोरिडा के पास समंदर में उतरे। उनकी पहली लैंडिंग समंदर में हुई। दुनिया भर में उनकी सुकुशल वापसी की खुशी मनाई जा […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
बुधवार, 19 मार्च 2025, 05:16 AM 6 मिनट read
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अंतरिक्ष यात्रियों के शरीर में किस तरह के होते हैं बदलाव ……….
Photo: UB India News Archive

9 महीने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर फंसी भारतीय मूल की सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर आखिरकार पृथ्वी पर सकुशल लौट आए हैं। बुधवार सुबह एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स के ड्रैगन यान से फ्लोरिडा के पास समंदर में उतरे। उनकी पहली लैंडिंग समंदर में हुई। दुनिया भर में उनकी सुकुशल वापसी की खुशी मनाई जा रही है।अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और एलन मस्क के स्पेसएक्स के अंतरिक्ष यान ड्रैगन से सुनीता विलियम्स, बुच विल्मोर, निक हेग और रूसी कॉस्मोनॉट अलेक्जेंडर गोर्बुनोव पृथ्वी पर लौटे। उनकी धरती पर वापसी के 17 घंटों का सफर बेहद कामयाबी के साथ खत्म हुआ। दरअसल, सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर ने 5 जून, 2024 को परीक्षण यान स्टारलाइनर से अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (ISS) के लिए उड़ान भरी थी। वहां आठ दिन गुजारने के बाद उनकी वापसी थी, मगर यान में तकनीकी खामी के कारण यह अटक गई थी। इन 9 महीनों में दोनों की बॉडी में क्या बदलाव हुए और क्या दोनों के शरीर पहले जैसे हो पाएंगे? जानते हैं।

9 महीने में सुनीता की बॉडी कितनी बदल गई
इसरो के पूर्व साइंटिस्ट डॉ. विनोद कुमार श्रीवास्तव के अनुसार, 2022 में नेचर मैगजीन में कनाडा की एक रिसर्च छपी। ओटावा यूनिवर्सिटी की इस स्टडी में कहा गया कि अंतरिक्ष में रहने के दौरान एस्ट्रोनॉट्स के शरीर की 50 फीसदी लाल रक्त कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं और मिशन के चलने तक ऐसा होता रहता है। यानी शरीर में खून की कमी हो जाती है। इसे स्पेस एनीमिया कहा जाता है। ये लाल कोशिकाएं पूरे शरीर को ऑक्सीजन पहुंचाती हैं।

चांद या मंगल पर यात्रा करना एस्ट्रोनॉट्स के लिए बड़ी चुनौती
इसी वजह से चांद, मंगल या उससे दूर की अंतरिक्ष यात्राएं करना एक बड़ी चुनौती हैं। हालांकि, ऐसा किस वजह से होता है, ये अब तक एक राज ही है। इसके अलावा, अंतरिक्ष में रहने के दौरान यात्रियों की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं और हड्डियों में कैल्शियम की कमी हो जाती है। धरती पर लौटने के बाद अंतरिक्ष यात्री कमजोर और थका हुआ महसूस करते हैं।

सबसे ज्यादा दिन तक अंतरिक्ष में रहने वाली तीसरी हस्ती
सुनीता के अंतरिक्ष से धरती पर कदम रखने के साथ ही वह कुल 286 दिन अंतरिक्ष में बिताने वाली हस्ती बन गई हैं। इसके साथ ही वह एक यात्रा में तीसरी सबसे ज्यादा दिन तक आईएसएस पर बिताने वाली महिला वैज्ञानिक बन गई हैं। इस मामले में सबसे पहले नंबर पर 328 दिनों के साथ क्रिस्टीना कोच हैं। वहीं, पिग्गी वीटस्न 289 दिनों के साथ दूसरे नंबर पर हैं। आईएसएस में एक बार में सबसे ज्यादा 371 दिन अंतरिक्ष यात्री फ्रैंक रूबियो ने बिताए हैं। कुल मिलाकर सबसे ज्यादा दिन बिताने का रिकॉर्ड 675 दिनों के साथ पिग्गी वीटस्न के पास है।

क्या हर सेकेंड 30 लाख लाल कोशिकाएं नष्ट होती हैं
विनोद श्रीवास्तव बताते हैं कि अंतरिक्ष में रहने के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों के शरीर में हर एक सेकेंड में 30 लाख लाल रक्त कोशिकाएं (RED BLOOD CELLS) नष्ट हो जाती हैं। वहीं, जमीन पर यह रफ्तार प्रति सेकेंड दो लाख ही है। हालांकि, अंतरिक्ष के मुकाबले धरती पर हर सेकंड इंसान की 2 लाख लाल रक्त कोशिकाएं नष्ट होती हैं। जमीन में शरीर इसकी भरपाई कर लेता है क्योंकि शरीर धरती के हिसाब से विकसित हुआ है।

क्या इसी वजह से चांद, मंगल की यात्रा करना बड़ी चुनौती
इसी वजह से चांद, मंगल या उससे दूर की अंतरिक्ष यात्राएं करना एक बड़ी चुनौती हैं। इसके अलावा, अंतरिक्ष में रहने के दौरान यात्रियों की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं और हड्डियों में कैल्शियम की कमी हो जाती है। धरती पर लौटने के बाद अंतरिक्ष यात्री कमजोर और थका हुआ महसूस करते हैं।

बेबी फीट, मसल्स कमजोर होने की समस्या
कई रिपोर्ट के अनुसार, विनोद कुमार श्रीवास्तव के अनुसार, सुनीता और बुच को जिन स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, उनमें बेबी फीट (एक ऐसी स्थिति जिसमें अंतरिक्ष यात्री अपने तलवों की मोटी त्वचा खो देते हैं), खराब दृष्टि, चलने में कठिनाई और चक्कर आना शामिल हैं। इसमें कहा गया है कि अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी पर जीवन के लिए अपने रोजाना के कामकाज को फिर से करने में कई हफ्ते लग सकते हैं।

अभी खड़े होने, देखने और चलने-फिरने में समस्या
ह्यूस्टन स्थित बेलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन ने नोट किया है कि एक बार जब अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी पर लौटते हैं, तो “उन्हें तुरंत पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में वापस समायोजित होने के लिए मजबूर होना पड़ता है, और उन्हें खड़े होने, अपनी निगाह को स्थिर करने, चलने और मुड़ने में समस्या हो सकती है”।

ऑर्थोस्टेटिक हाइपोटेंशन की समस्या भी हो जाती है
जापान की स्पेस एजेंसी JAXA के अनुसार, पृथ्वी पर लौटने वाले अंतरिक्ष यात्रियों को खड़े होने पर अक्सर चक्कर आते हैं, जिसे ऑर्थोस्टेटिक हाइपोटेंशन के रूप में जाना जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण अंतरिक्ष की तुलना में अधिक मजबूत है और हृदय से सिर तक रक्त पहुंचाना अधिक कठिन होता है।

हड्डियां कमजोर हो जाती हैं, खोखलापन बढ़ता है
NASA के अनुसार, अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण की कमी से अक्सर हड्डियों के घनत्व में भारी कमी भी हो जाती है। अंतरिक्ष में हर महीने, अगर अंतरिक्ष यात्री इस कमी को दूर करने के लिए सावधानी नहीं बरतते हैं, तो उनकी वजन सहन करने वाली हड्डियों के घनत्व में एक प्रतिशत की कमी हो जाती है। यानी हड्डियां खोखली होकर कमजोर होने लगती है।

इन समस्याओं से निपटने के लिए क्या किया जाना चाहिए
इन प्रॉब्लम्स से निपटने के लिए ISS पर अंतरिक्ष यात्री इसीलिए एक्सरसाइज करते रहते हैं। अंतरिक्ष यात्रियों को शून्य गुरुत्वाकर्षण में होने वाली हड्डी और मांसपेशियों को कमजोर होने से बचाने के लिए ट्रेडमिल या स्थिर साइकिल का इस्तेमाल करवाया जाता है। हर दिन उन्हें वहां पर 2 घंटे एक्सरसाइज करना पड़ता है। ऐसा नहीं करने पर अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष में महीनों तक तैरने के बाद पृथ्वी पर लौटने पर चलने या खड़े होने में असमर्थ होंगे।

शरीर को और क्या नुकसान पहुंचता है
पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण की कमी का ब्लड सर्कुलेशन, संतुलन और हड्डियों के घनत्व पर भी बड़ा प्रभाव पड़ता है। पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण रक्त और शरीर के अन्य तरल पदार्थों को शरीर के निचले हिस्से में खींचता है, लेकिन अंतरिक्ष में भारहीनता का अनुभव करने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के शरीर के ऊपरी हिस्सों में ये तरल पदार्थ जमा हो जाते हैं, जिससे वे फूले हुए दिखते हैं। इसके अलावा, कानों पर भी असर पड़ता है।

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