भारत का परमाणु ऊर्जा पर काम आजादी के बाद शुरू हुआ. 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग बना. यह भारत के लिए बड़ा कदम था. फिर 1956 में एशिया का पहला रिसर्च रिएक्टर अप्सरा शुरू हुआ. यह भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (BARC) में था. इसके बाद 1969 में तारापुर में परमाणु बिजली संयंत्र बना. यह एशिया में दूसरा ऐसा संयंत्र था. चीन से पहले भारत ने यह काम किया. 1950 और 1960 के दशक में भारत ने पश्चिमी देशों की मदद से परमाणु रिसर्च को मजबूत किया. यह सब डॉ. होमी जहांगीर भाभा और डॉ. विक्रम साराभाई ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई थी.
तीन चरणों का कार्यक्रम
भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम तीन हिस्सों में है. इसे होमी जहांगीर भाभा और साराभाई ने बनाया था. इसका मकसद भारत के थोरियम का पूरा इस्तेमाल करना है. थोरियम भारत में बहुत है, खासकर समुद्र के किनारे और नदियों की रेत में. अब इन तीन चरणों को समझते हैं.
पहला चरण: प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWR)
पहले चरण में प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर का इस्तेमाल होता है. इसमें प्राकृतिक यूरेनियम ईंधन की तरह काम करता है. हेवी वाटर इसमें ठंडा करने और नियंत्रण के लिए होता है. यह रिएक्टर बिजली बनाते हैं. साथ ही, इनके बचे हुए ईंधन से प्लूटोनियम (Pu239) निकलता है. यह प्लूटोनियम अगले चरण के लिए जरूरी है. कुछ हल्के वाटर रिएक्टर (LWR) भी बाहर से लाए गए हैं. बचे ईंधन को दोबारा प्रोसेस करना बहुत जरूरी है. इससे प्लूटोनियम अलग होता है.
दूसरा चरण: फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR)
दूसरे चरण में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर आते हैं. ऐसा रिएक्टर कलपक्कम में है. यह प्लूटोनियम से चलता है. खास बात यह है कि यह रिएक्टर जितना ईंधन इस्तेमाल करता है, उससे ज्यादा बनाता है. यह थोरियम को यूरेनियम-233 (U233) में बदल देता है. यूरेनियम-233 अगले चरण के लिए जरूरी है. कलपक्कम का रिएक्टर मार्च 2024 में शुरू हुआ. इसके लिए 20 साल से काम चल रहा था. बचे ईंधन को प्रोसेस करना इसमें भी जरूरी है. इससे प्लूटोनियम का सही इस्तेमाल होता है.
तीसरा चरण: थोरियम आधारित रिएक्टर
तीसरा चरण थोरियम पर आधारित है. इसमें यूरेनियम-233 का इस्तेमाल होगा. यह भारत के थोरियम भंडार को बिजली में बदलेगा. इसके लिए एडवांस्ड हेवी वाटर रिएक्टर (AHWR) बनाया जा रहा है. मोल्टन सॉल्ट रिएक्टर भी एक विकल्प है. यह चरण भारत को लंबे समय तक ऊर्जा देगा. थोरियम को यूरेनियम-233 में बदलने का काम दूसरे चरण से शुरू होता है. इस तरह पूरा कार्यक्रम एक-दूसरे से जुड़ा है.
फर्टाइल से फिसाइल सामग्री
यह समझना जरूरी है कि फर्टाइल और फिसाइल सामग्री क्या है. फर्टाइल सामग्री जैसे यूरेनियम-238 (U238) और थोरियम अपने आप चेन रिएक्शन नहीं शुरू कर सकते. लेकिन रिएक्टर में इन्हें फिसाइल सामग्री में बदला जा सकता है. यूरेनियम-238 से प्लूटोनियम-239 बनता है. थोरियम से यूरेनियम-233 बनता है. भारत ने “क्लोज्ड फ्यूल साइकिल” अपनाया है. इसमें बचे ईंधन को प्रोसेस करके प्लूटोनियम और यूरेनियम-233 निकाला जाता है. यह तरीका फिसाइल सामग्री को बढ़ाता है. इससे थोरियम का तीसरे चरण में इस्तेमाल आसान होता है.
फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की स्थिति
फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR) तीसरे चरण के लिए बहुत जरूरी है. यह थोरियम के इस्तेमाल का रास्ता खोलता है. भारत का पहला स्वदेशी FBR कलपक्कम, तमिलनाडु में है. इसका कोर लोडिंग मार्च 2024 में शुरू हुआ. इसे बनाने में 20 साल लगे. यह दिखाता है कि भारत ने इस लक्ष्य के लिए लगातार मेहनत की. अलग-अलग सरकारों ने इसमें योगदान दिया. यह रिएक्टर परमाणु ईंधन चक्र को पूरा करने में मदद करेगा.
न्यूक्लियर एनर्जी मिशन और भविष्य
भारत सरकार ने बड़ा लक्ष्य रखा है. 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु बिजली बनानी है. अभी यह 8.18 गीगावाट है. इसके लिए “न्यूक्लियर एनर्जी मिशन फॉर विकसित भारत” शुरू हुआ है. यह मिशन स्वदेशी तकनीक को बढ़ाएगा. यह भारत के “पंचामृत क्लाइमेट एक्शन प्लान” का भी हिस्सा है, जो COP 21 में तय हुआ था.
2025 के बजट में 20,000 करोड़ रुपये का ऐलान हुआ. यह छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) के लिए है. सरकार 2033 तक कम से कम पांच SMR शुरू करेगी. SMR छोटे रिएक्टर हैं. इनकी क्षमता 30 मेगावाट से 300 मेगावाट तक होती है. इन्हें फैक्ट्री में बनाया जा सकता है. ये सस्ते और आसानी से लगाए जा सकते हैं. इससे परमाणु ऊर्जा का विस्तार तेज होगा.
जयराम रमेश का सवाल
हाल ही में राज्यसभा में कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस कार्यक्रम पर सवाल उठाया. उन्होंने सरकार से पूछा कि दूसरे और तीसरे चरण में कितनी प्रगति हुई है. उनका कहना था कि यह कार्यक्रम बहुत पुराना है, लेकिन अभी तक थोरियम का पूरा इस्तेमाल शुरू नहीं हुआ. उन्होंने यह भी पूछा कि सरकार का 2047 का लक्ष्य कैसे पूरा होगा. इस सवाल से संसद में बहस हुई. सरकार ने जवाब दिया कि कलपक्कम का FBR शुरू हो चुका है और SMR पर काम चल रहा है. जयराम रमेश के सवाल से यह साफ हुआ कि लोग इसकी प्रगति पर नजर रख रहे हैं.
भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम संसद में भी चर्चा का विषय है. जयराम रमेश ने राज्यसभा में इसके बारे में सवाल पूछा. यह दिखाता है कि लोग इसकी प्रगति जानना चाहते हैं. यह कार्यक्रम भाभा और साराभाई की सोच से शुरू हुआ. फास्ट ब्रीडर रिएक्टर इसमें अहम कड़ी है. यह थोरियम के इस्तेमाल का रास्ता बनाता है. न्यूक्लियर एनर्जी मिशन और SMR से सरकार नई दिशा में बढ़ रही है. इसमें समय और चुनौतियां आईं, लेकिन भारत का लक्ष्य साफ है. वह अपने थोरियम भंडार से ऊर्जा सुरक्षा चाहता है. क्लोज्ड फ्यूल साइकिल इसकी नींव है. यह भारत को आत्मनिर्भर और मजबूत बनाएगा.








