बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे के सुप्रीम कोर्ट और सीजेआई को लेकर दिए गए बयान पर सियासी बवाल मचा हुआ है. निशिकांत दुबे ने शनिवार (19 अप्रैल) को कहा था कि अगर कानून सुप्रीम कोर्ट ही बनाएगी तो संसद को बंद कर देना चाहिए. इस पर विपक्षी दलों ने कहा कि यह न केवल न्यायपालिका की प्रतिष्ठा पर हमला है, बल्कि संसद और संविधान की आत्मा पर भी सवाल खड़े करता है.
यह बयान आते ही सोशल मीडिया से लेकर सियासी गलियारों तक भारी प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गईं. विपक्षी दलों खासकर कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया तो वहीं बीजेपी अध्यक्ष ने सामने आकर साफ किया कि बीजेपी का निशिकांत दुबे के बयान से कोई लेना-देना नहीं है. बीजेपी के पल्ला झाड़ने पर कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इस मुद्दे पर पोस्ट करते हुए कहा कि भाजपा सांसदों की तरफ से भारत के मुख्य न्यायाधीश पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों से भाजपा के निवर्तमान अध्यक्ष की ओर से खुद को अलग करने की कोई विशेष अहमियत नहीं रह जाती.
कांग्रेस नेता ने मुद्दे पर पीएम से पूछे सवाल
जयराम रमेश ने बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा की उस प्रतिक्रिया पर निशाना साधा, जिसमें उन्होंने कहा था कि “निशिकांत दुबे के विचार उनके निजी हैं, पार्टी का इससे कोई लेना-देना नहीं है.” कांग्रेस नेता ने तंज कसते हुए कहा कि निवर्तमान भाजपा अध्यक्ष का स्पष्टीकरण डैमेज कंट्रोल के अलावा कुछ नहीं है. इससे कोई मूर्ख नहीं बनेगा. यह Entire Political Science नहीं बल्कि Entire Political Hypocrisy की मिसाल है. उन्होंने पूछा कि निवर्तमान भाजपा अध्यक्ष ने अपनी ही पार्टी के उच्च संवैधानिक पद पर बैठे एक अति विशिष्ट व्यक्ति द्वारा न्यायपालिका पर बार-बार की जा रही अस्वीकार्य टिप्पणियों पर पूरी तरह चुप्पी साध रखी है. क्या इन टिप्पणियों पर उनका कोई मत नहीं है? क्या भाजपा इन बयानों का समर्थन करती है?
अगर संविधान पर इस तरह के निरंतर हमलों को प्रधान मंत्री मोदी की मौन स्वीकृति नहीं है तो इस सांसद के ख़िलाफ़ कड़े कदम क्यों नहीं उठा रहे? क्या नड्डा जी ने इन्हें कारण बताओ नोटिस दिया?
निशिकांत दुबे से जुड़ा मुद्दा एक बड़ी बहस की शुरुआत
निशिकांत दुबे से जुड़ा मुद्दा अब केवल एक बयान नहीं रह गया है, बल्कि इसने एक बड़ी बहस की शुरुआत कर दी है, जो संविधान, उसकी व्याख्या और उसमें निहित शक्तियों की सीमाओं को फिर से परिभाषित करने की मांग कर रहा है. एक तरफ सुप्रीम कोर्ट अपने फैसलों के जरिए सामाजिक न्याय, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा कर रही है. वहीं दूसरी ओर कुछ राजनीतिक बयान न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल उठाकर संस्थाओं के बीच टकराव की स्थिति बना रहे हैं.
निशिकांत दुबे के बयान का बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने किया समर्थन, अध्यक्ष बोले- कहीं न कहीं कुछ गलती हुई है
बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन मिश्रा ने कहा कि हाल में जो निर्णय आए हैं, उससे पूरे देश और संसद को थोड़ी परेशानी जरूर है. उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि कहीं न कहीं कुछ गलती हुई है और जिस जज ने ये आदेश पारित किया है, वह भी इस बात को समझेंगे और इस पर पुनर्विचार होना चाहिए.
झारखंड से बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे की ओर से सुप्रीम कोर्ट को लेकर दिए गए बयान पर सियासत देखने को मिल है. बीजेपी सांसद के बयान पर विपक्ष ने एकजुट होकर बीजेपी और पीएम मोदी के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है. वहीं निशिकांत के बयान से बीजेपी ने खुद को अलग कर लिया है. बीजेपी का साफ कहना है कि यह बयान सांसद के अपने विचार हैं. पार्टी का इससे संबंध नहीं है. वहीं अब बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन मिश्रा ने निशिकांत दुबे का कथित तौर पर समर्थन किया है. निशिकांत के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए मनन मिश्रा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को अपना काम और संसद को अपना काम करना है.
बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन मिश्रा ने कहा कि निशिकांत दुबे एक वरिष्ठ सांसद हैं और भाजपा के सदस्य हैं. मैं मानता हूं कि सुप्रीम कोर्ट को अपना काम करना है और संसद को अपना काम करना है. सारी बात संविधान में पहले से ही निर्धारित है, किसको क्या काम करना चाहिए और किसकी कितनी लिमिट है. उन्होंने (निशिकांत दुबे) भी कहा है कि जो भी कानून संसद या विधानसभा से पारित होते हैं, उनकी कैसे विवेचना की जाए. मैं इतना ही कहूंगा कि यह काम न्यायतंत्र का है और ऐसी स्थिति में हम यह नहीं कह सकते कि पार्लियामेंट या विधानसभाओं को बंद कर देना चाहिए. हालांकि, हाल में जो निर्णय आए हैं, उससे पूरे देश और संसद को थोड़ी परेशानी जरूर है.
मनन मिश्रा ने कहा कि संविधान में यह भी कहा गया है कि राज्य विधानसभाओं से जो कानून पास किए जाएंगे, अगर राज्यपाल चाहेंगे तो उसे राष्ट्रपति को रेफर कर देंगे, लेकिन जब तक कोई निर्देश प्राप्त नहीं होते हैं तो ये कानून नहीं बनेगा. उन्होंने आगे कहा कि निशिकांत दुबे ने जजमेंट को लेकर जो बातें कही हैं, मुझे ऐसा लगता है कि संविधान में कोई समय रेखा तय नहीं की गई है. हालांकि, हाल ही के एक जजमेंट ने राष्ट्रपति के लिए तीन महीने की समय रेखा तय कर दी, जो देश के लिए दिक्कत जरूर है. मैं समझता हूं कि इसमें सरकार को रिव्यू के लिए जाना चाहिए और इस पर भी ध्यान देना चाहिए कि सारी बातों को कंसीडर किया गया है या नहीं.
उपराष्ट्रपति जगदीश धनखड़ की सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर मनन मिश्रा ने कहा कि उपराष्ट्रपति हमारे देश के एक जाने-माने वकील भी रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के सीनियर एडवोकेट भी हैं. साथ ही वह कानून के अच्छे जानकार हैं. उनके दिल में जो बात है, वह बात इस देश के सभी नागरिकों के मन में है, जो भी निर्णय होता है या कोई कानून बनता है, उसके बहुत दूरगामी प्रभाव होते हैं. मुझे लगता है कि कहीं न कहीं कुछ गलती हुई है और जिस जज ने ये आदेश पारित किया है, वह भी इस बात को समझेंगे और इस पर पुनर्विचार होना चाहिए.








