पटना हाईकोर्ट ने धार्मिक जुलूस को लेकर एक ऐसा फैसला सुनाया है, जो आस्था और कानून-व्यवस्था के बीच की सीमा को साफ करता है. कोर्ट ने कहा कि धर्म मानने और धार्मिक गतिविधियां करने का अधिकार संविधान देता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि किसी भी जुलूस या धार्मिक आयोजन को बिना शर्त अनुमति […]
By UB India News • Patna, Bihar शनिवार, 22 अगस्त 2026, 05:34 AM • 4 मिनट read
पटना हाईकोर्ट ने धार्मिक जुलूस को लेकर एक ऐसा फैसला सुनाया है, जो आस्था और कानून-व्यवस्था के बीच की सीमा को साफ करता है. कोर्ट ने कहा कि धर्म मानने और धार्मिक गतिविधियां करने का अधिकार संविधान देता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि किसी भी जुलूस या धार्मिक आयोजन को बिना शर्त अनुमति मिल जाएगी. खासकर जब मामला रिहायशी इलाके का हो और वहां आम लोगों की सुरक्षा, शांति या स्वास्थ्य प्रभावित होने की आशंका हो, तब प्रशासन इन पहलुओं को नजरअंदाज नहीं कर सकता. यानी आस्था अपनी जगह है, लेकिन सड़क और समाज की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है.
यह मामला बिहार के सीवान जिले के हथुआरा गांव में हर साल निकलने वाले ‘महावीरी जुलूस’ से जुड़ा था. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार याचिकाकर्ता भदई चौधरी ने एक अखाड़े की ओर से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. मांग थी कि करीब 300 लोगों को जुलूस निकालने की अनुमति दी जाए. याचिकाकर्ता का तर्क था कि धार्मिक जुलूस निकालना मौलिक अधिकार का हिस्सा है. लेकिन राज्य सरकार ने पुराने आयोजनों का हवाला देते हुए बताया कि पहले ऐसे जुलूसों के दौरान सार्वजनिक वाहन जलाने और उपद्रव जैसी घटनाएं हो चुकी हैं.
धार्मिक आजादी पर कोर्ट ने क्या कहा?
संविधान का अधिकार, लेकिन ‘उचित प्रतिबंध’ भी
- कोर्ट ने अपने फैसले में धर्मनिरपेक्षता को संविधान की मूल संरचना का हिस्सा बताया. साथ ही कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता जब सामान्य नागरिक जीवन और सार्वजनिक सुविधाओं को प्रभावित करती है, तो उस पर संविधान में दिए गए ‘उचित प्रतिबंध’ लागू हो सकते हैं. इसका सीधा मतलब है कि किसी धार्मिक गतिविधि को केवल आस्था के आधार पर असीमित छूट नहीं मिल सकती. प्रशासन को यह देखना होगा कि आयोजन से आम जनता को परेशानी या खतरा तो नहीं है.
- याचिका में जिस महावीरी जुलूस की अनुमति मांगी गई थी, वह विक्रम संवत के भाद्र महीने की 11वीं तिथि को हर साल निकाला जाता है. अखाड़े की ओर से करीब 300 लोगों के शामिल होने की बात कही गई थी. दूसरी तरफ सरकार ने अपने जवाब में पिछले अनुभवों को आधार बनाया. उसके मुताबिक पहले ऐसे आयोजनों में भीड़ से सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हुई थी. इसी वजह से हाईकोर्ट ने अनुमति को मौलिक अधिकार के तौर पर स्वीकार करने से इनकार कर दिया.
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का भी हवाला
पटना हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के डॉ. एम. इस्माइल फारूकी मामले में दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया. उस फैसले में कहा गया था कि पूजा या धार्मिक उपासना करना मौलिक अधिकार से जुड़ा विषय है, लेकिन पूजा के लिए किसी खास स्थान का इस्तेमाल अपने आप में उसी स्तर का मौलिक अधिकार नहीं बन जाता. पटना हाईकोर्ट ने इसी अंतर को धार्मिक जुलूस के मामले में भी महत्वपूर्ण माना.
आस्था और सार्वजनिक जीवन के बीच संतुलन जरूरी
कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, इस फैसले का महत्व सिर्फ एक जुलूस की अनुमति तक सीमित नहीं है. अदालत ने यह संदेश दिया है कि धार्मिक स्वतंत्रता और नागरिक व्यवस्था को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय दोनों के बीच संतुलन जरूरी है. किसी आयोजन से दूसरे लोगों की आवाजाही, सुरक्षा, स्वास्थ्य या शांति प्रभावित होती है तो प्रशासन उस पर शर्तें लगा सकता है. ऐसे मामलों में अनुमति देना सिर्फ धार्मिक अधिकार का सवाल नहीं, बल्कि सार्वजनिक जिम्मेदारी का भी विषय है.