ऑपरेशन सिंदूर मौजूदा वक्त में भारतीय सेना की वीरता और सफलता की एक ऐसी कहानी है जिसकी चर्चा अब सात समंदर पार तक होने लगी है. अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ इस ऑपरेशन में भारत के सैन्य बलों की तैयारी और क्रियान्वयन के मुरीद हो गए हैं. वे इस ऑपरेशन को मॉडर्न दुनिया के लिए एक सीख बता रहे हैं. वे इसको जरिए बता रहे हैं कि कैसे बेहद कम समय में किसी युद्ध को जीता जा सकता है. इसी ऑपरेशन को आधार बनाकर वे अमेरिकी सरकार को नसीहत दे रहे हैं कि उनको भारत से सैन्य बलों के आधुनिकीकरण के तरीके के बारे में सीखना चाहिए.
एक वेबसाइट smallwarsjournal.com पर छपी एक विस्तृत रिपोर्ट में इन सभी बातों का जिक्र है. यह अमेरिका की रक्षा क्षेत्र की एक सबसे प्रतिष्ठित वेबसाइट है. इस रिपोर्ट को दो पत्रकारों जॉन स्पेंसर और विंसेंट विओला ने तैयार किया है. एक बेहद लंबी इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद कम से कम हर एक भारतीय का सीना अपनी सेना के गर्व में चौड़ा हो जाएगा. इस रिपोर्ट में पांच अहम बिंदुओं की चर्चा की गई है जो इस प्रकार है.
अमेरिका को रक्षा सुधार की तत्काल जरूरत
आधुनिक युद्ध की रफ्तार और जटिलता ने अमेरिका के सामने एक कठोर सच्चाई रख दी है. उसकी रक्षा प्रणाली को पूरी तरह से बदलने की जरूरत है. छोटे-मोटे बदलाव या मामूली सुधार अब काफी नहीं हैं. आज के युद्ध और भविष्य में होने वाले और भी भयंकर युद्धों को जीतने के लिए तेजी से सोचने, तेजी से बनाने और चतुराई से लड़ने की जरूरत है. जैसा कि ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने दिखाया है. सबसे महत्वपूर्ण है युद्धक्षेत्र में घातकता (lethality) को समझने और उसे लागू करने की कला में महारत हासिल करना. वर्तमान में अमेरिका इस दौड़ में पीछ
आधुनिक युद्ध का लक्ष्य अब लंबे, थकाऊ अभियानों की तैयारी करना नहीं है. लक्ष्य स्पष्ट है. युद्ध को तेजी से और निर्णायक रूप से जीतना, जिसमें बेहतर सैन्य क्षमता की जरूरत होती है. इसके लिए एक ऐसी रक्षा प्रणाली चाहिए जो न केवल तेज हो, बल्कि बड़े पैमाने पर उत्पादन भी कर सके. अमेरिका इस गलतफहमी में फंस गया है कि एक जादुई हथियार या एक उन्नत प्रणाली भविष्य के युद्ध जीत सकती है. यह सच नहीं है. जीत के लिए मॉड्यूलर सिस्टम, बड़ी मात्रा में उत्पादन, अतिरिक्त संसाधन और निरंतर अनुकूलन जरूरी है. इसके लिए युद्धक्षेत्र की जरूरतों को तेजी से पहचानना, खरीद प्रक्रिया, अनुसंधान, विकास और बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाली औद्योगिक प्रणाली की जरूरत है. भारत ने हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के जरिए यह दिखाया कि यह कैसे किया जा सकता है.
अमेरिका की खरीद प्रक्रिया धीमी
सबसे बड़ी समस्या थी तोपखाने के गोले (आर्टिलरी शेल्स) की कमी. उच्च तीव्रता वाले युद्ध में हर महीने लाखों गोले की जरूरत होती है, लेकिन अमेरिका की औद्योगिक क्षमता इस मांग को पूरा नहीं कर पाई. आपूर्ति श्रृंखलाएं तनाव में थीं और विनिर्माण ढांचा पुराना पड़ चुका था. पेंटागन को सालों में मापा जाने वाला समय चाहिए था, जबकि युद्ध को हफ्तों में जवाब चाहिए. 9/11 के बाद से युद्धक्षेत्र में सबसे प्रभावी समाधान औपचारिक खरीद प्रक्रिया से नहीं, बल्कि अनौपचारिक रास्तों से आए. रैपिड इक्विपिंग फोर्स, जॉइंट अर्जेंट ऑपरेशनल नीड्स स्टेटमेंट्स (JUONS), और कमांडरों के विवेकाधीन फंड जैसे प्रोग्राम ने निजी कंपनियों और युद्धक्षेत्र के कमांडरों को तेजी से जरूरी उपकरण- जैसे काउंटर-IED गियर और सर्विलांस ड्रोन मुहैया कराने में मदद की.
बहुत महंगी रक्षा प्रणाली
अमेरिका की रक्षा प्रणाली न केवल धीमी है, बल्कि बहुत महंगी भी है. अमेरिकी हथियार दुनिया के सबसे उन्नत हैं, लेकिन उनकी लागत उन्हें अव्यवहारिक बना रही है. एक टॉमहॉक मिसाइल की कीमत 20 लाख डॉलर तक है और एक हिमार्स लॉन्चर की कीमत 50 लाख डॉलर से ज्यादा. दूसरी ओर दुश्मन और सहयोगी देश कम लागत में समान या बेहतर प्रभाव वाले सिस्टम बना रहे हैं. उदाहरण के लिए ईरान के लोइटरिंग म्यूनिशन्स अमेरिकी हथियारों की तुलना में बहुत सस्ते हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में ड्रोन की लागत पर सवाल उठाए, जब उन्होंने बताया कि ईरान के 40,000 डॉलर के ड्रोन की तुलना में अमेरिकी ड्रोन के लिए 4.1 करोड़ डॉलर का कोटेशन दिया गया. ट्रम्प ने कहा, “ये ड्रोन अच्छे, तेज और घातक हैं.” लेकिन हमें ईरान की नकल करने की जरूरत नहीं. इजरायल और भारत जैसे सहयोगी देश पहले से ही बेहतर मॉडल पेश कर रहे हैं.
यूक्रेन का हाइब्रिड मॉडल
यूक्रेन ने 2014 से एक हाइब्रिड रक्षा मॉडल अपनाया, जिसमें राष्ट्रीय सेना को पश्चिमी विचारों और एक इनोवेशन बेस्ड रक्षा उद्योग का समर्थन प्राप्त है. नतीजा एक दशक से भी कम समय में, यूक्रेन ड्रोन युद्ध और रियल-टाइम टारगेट अधिग्रहण में वैश्विक अग्रणी बन गया. उन्होंने वाणिज्यिक ड्रोन को लोइटरिंग म्यूनिशन्स और निगरानी मंचों में बदला, जो युद्धक्षेत्र की जरूरतों और नवाचार से निकला. 2023 तक, यूक्रेन ने AI-सहायता प्राप्त लक्ष्य पहचान और हमले समन्वय वाले स्वायत्त ड्रोन तैनात किए, जो मानव हस्तक्षेप के बिना मिशन पूरा कर सकते हैं. यह पश्चिमी सेनाओं से भी आगे है.

ऑपरेशन सिंदूर में 70 फीसदी तक देसी हथियार इस्तेमाल किए गए.
ऑपरेशन सिंदूर: भविष्य का खाका
भारत ने भी एक प्रभावशाली मॉडल पेश किया. 2014 में मेक इन इंडिया पहल के तहत भारत ने अपनी रक्षा प्रणाली को आत्मनिर्भरता और तेजी पर केंद्रित किया. एक दशक बाद, ऑपरेशन सिंदूर ने इसके परिणाम दिखाए. ऑपरेशन सिंदूर एक आतंकी हमले के जवाब में शुरू हुआ. यह केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं था. इसने भारत की रणनीतिक ताकत को दिखाया. चार दिनों में भारत ने स्वदेशी ब्रह्मोस मिसाइलों, अकाशतीर वायु रक्षा इकाइयों और लोइटरिंग म्यूनिशन्स का उपयोग कर सीमा पार आतंकी ठिकानों को नष्ट किया. कोई अमेरिकी सिस्टम या विदेशी आपूर्ति नहीं- सब कुछ स्वदेशी.
भारत की सफलता ने यह दिखाया कि एक कुशल घरेलू औद्योगिक ताकत और रणनीतिक सिद्धांत कितना प्रभावी हो सकता है. ब्रह्मोस मिसाइल जो भारत और रूस की साझेदारी से बनी है लेकिन अब ज्यादातर भारत में निर्मित होती है, की कीमत लगभग 4.85 मिलियन डॉलर है. यह अमेरिकी टॉमहॉक (1-2.5 मिलियन डॉलर) से महंगी है, लेकिन इसकी गति (मैक 3) और प्रभाव इसे बेहतर बनाते हैं. अकाशतीर एक AI-एकीकृत वायु रक्षा प्रणाली है. इसकी लागत अमेरिकी NASAMS या पैट्रियट सिस्टम की तुलना में बहुत कम है. 240 मिलियन डॉलर में यह पूर्ण क्षमता प्रदान करती है.
ऑपरेशन सिंदूर में भारत के ड्रोन जैसे स्काईस्ट्राइकर और हारोप ने सटीक हमले किए. ये सिस्टम इजरायल से लिए गए लेकिन भारत में असेंबल किए गए. दूसरी ओर, पाकिस्तान के चीनी सिस्टम—LY-80, HQ-9/P, और FM-90—भारत के हमलों को रोकने में नाकाम रहे. भारत ने न केवल जीत हासिल की, बल्कि क्षेत्रीय प्रभुत्व को फिर से परिभाषित किया.
भारत ने अपनी रक्षा खरीद में स्वदेशी हिस्सेदारी को 30% से बढ़ाकर 65% किया और 2030 तक 90% का लक्ष्य रखा. रक्षा के लिए पूंजीगत खर्च 2019-20 में 6 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2023-24 में 20 बिलियन डॉलर हो गया. 74% तक विदेशी निवेश की अनुमति ने स्वदेशी क्षमता को और मजबूत किया. भारत ने सुधारों को लागू किया और जीत हासिल की.
अमेरिका के सामने रणनीतिक विकल्प
भारत की ऑपरेशन सिंदूर और यूक्रेन के इनोवेशन की सफलता अमेरिका के लिए चेतावनी है. अमेरिका अभी भी पुराने शीत युद्ध के ढांचे और खाड़ी युद्ध की मान्यताओं पर काम कर रहा है. अगर अमेरिका वैश्विक सैन्य शक्ति बने रहना चाहता है, खासकर चीन के खिलाफ, तो उसे सुधार करना होगा:








