धर्म, आस्था, पवित्रता का संगम… शांति से होने वाली कांवड़ यात्रा इतनी अराजक क्यों हुई?

1980 के दशक में हरिद्वार की कांवड़ यात्रा में भीड़-भड़क्का शुरू हुई. तब लोग हरिद्वार से गंगा जल लेकर मेरठ स्थित पुरा महादेव मंदिर में यह जल शिवलिंग पर अर्पित करते. उस समय कांवड़िये चुप चाप चलते और न कोई डीजे न शोर शराबा. न कोई रेला. सिर्फ़ वही आते, जिनमें श्रद्धा होती, आस्था होती. […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
मंगलवार, 22 जुलाई 2025, 06:51 AM 10 मिनट read
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धर्म, आस्था, पवित्रता का संगम… शांति से होने वाली कांवड़ यात्रा इतनी अराजक क्यों हुई?
Photo: UB India News Archive

1980 के दशक में हरिद्वार की कांवड़ यात्रा में भीड़-भड़क्का शुरू हुई. तब लोग हरिद्वार से गंगा जल लेकर मेरठ स्थित पुरा महादेव मंदिर में यह जल शिवलिंग पर अर्पित करते. उस समय कांवड़िये चुप चाप चलते और न कोई डीजे न शोर शराबा. न कोई रेला. सिर्फ़ वही आते, जिनमें श्रद्धा होती, आस्था होती. यह जरूर होता कि यह यात्रा जिन गांवों से होकर गुजरती, वे गांव वाले इनकी सेवा करते. रास्ते में यदि मुस्लिम गांव पड़ता तो गांव वाले इन कांवड़ियों को फल देते. उनका कहना होता कि हमें पता है, आप लोग हमारे यहां का खाना तो नहीं खाओगे परंतु फल तो खा ही सकते हो. कांवड़िये फल खा लेते.

हरिद्वार से मेरठ, गाजियाबाद के बीच अनेक गांव मुस्लिम बहुल हैं. वहां के मुसलमान भी शिविर लगाते. यूं भी इन गांवों के मुस्लिम अधिकतर राजपूत, त्यागी, जाट और गूजर हैं. ये सरनेम भी अपने पुराने हिंदू पुरखों वाला ही लगाते हैं, लेकिन अब पहले वाला माहौल नहीं रहा.

ब्रज चौरासी परिक्रमा में मुस्लिम स्वागत करते!
इस वेस्टर्न यूपी में मुसलमान सावन में मीट नहीं खाते थे. कमोबेश यही हाल मथुरा के क्षेत्र में होता. ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा हरियाणा के मेवात इलाके से भी गुजरती. मेवात में ज्यादातर आबादी मेव मुसलमानों की है. मुझे याद है कि इस मेवात क्षेत्र के सांसद तैयब हुसैन मुस्लिम समुदाय से अपील करते कि यात्रा के दौरान कोई मीट-मांस नहीं खाएगा. यात्रा के दौरान मुस्लिम गांवों में यात्रियों के लिए फल वितरण अवश्य होगा. पर अब उस ब्रज चौरासी कोस यात्रा में वह सद्भाव नहीं रहा. सांसद तैयब हुसैन भी नहीं रहे. वे फरीदाबाद और गुड़गांव लोकसभा सीट से सांसद रहे हैं.

गुलशन कुमार ने भीड़ जुटाई!
कांवड़ यात्रा में भीड़ जुटाने का श्रेय फिल्मकार गुलशन कुमार को जाता है. उन्होंने गंगा और शिव की महिमा को ऐसा प्रचारित किया कि कांवड़ यात्रा एक अभियान बन गई. पहले यह सावन की प्रतिपदा से शुरू होती और 13 दिन बाद शिवरात्रि को जलाभिषेक के साथ ही कांवड़ यात्रा संपन्न. कांवड़िये पहले हरिद्वार से जल भरते. फिर यह जल अपने घर के पास वाले शिव मंदिर में चढ़ाते. नियम यह होता कि कांवड़ लेकर जाने वाला जातक बड़े संयम से रहता.

मसलन इस बीच वह अपने किसी रिश्तेदार या मित्र के घर नहीं प्रवेश कर सकता था. अपनी कांवड़ को जमीन पर नहीं रख सकता था. यदि कांवड़ लेने के दौरान उसे पेशाब या शौच के लिए जाना होता तो वह अपनी कांवड़ किसी शिविर या मंदिर अथवा वृक्ष में टांग जाता, स्नान करता और तब वह कांवड़ पुनः धारण करता. पवित्रता इस यात्रा की खासियत थी. हर कांवड़ धारी कोई जाति पात नहीं मानता. साथ चलते और साथ ही भोजन करते. ब्राह्मण हो, चमार हो, जाट हो या यादव सब आपस में एक दूसरे को भोले ही संबोधित करते.

हरिद्वार से गंगोत्री तक यात्रा!
धीरे-धीरे कांवड़िये हरिद्वार की बजाय ऋषिकेश से गंगा जल लाने लगे और इसके बाद उनका गंतव्य उत्तरकाशी हो गया. जहां से वे गंगा जल लेते तथा विश्वनाथ मंदिर के दर्शन करते और अपने-अपने घरों को लौट जाते. इसके बाद वे गंगोत्री और गोमुख जाने लगे. यानी हरिद्वार से 300 किमी ऊपर. भीड़ भी ऐसी कि उसे संभालना मुश्किल. कांवड़ यात्रा दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के अलवर तक से आने लगी. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ और सहारनपुर मंडल के गांव-गांव से लोग कांवड़ लेकर आते. इस यात्रा में धर्म, आस्था और पवित्रता लुप्त होने लगी, दिखावा बढ़ने लगा. गैंग से एक आदमी गया तो देखा-देखी चार और चल पड़े. यात्रा के दौरान कांवड़िये नशा-पत्ती भी करने लगे. अब यात्रा एक शोर थी और यात्रा रूट पर पड़ने वाले लोगों के लिए आफत!

कांवड़िया बना वोटर
लेकिन, कांवड़ यात्रा के दौरान मारपीट और अराजकता तब शुरू हुई जब राजनीतिक दलों ने हिंदू वोटरों को एक करने के लिए इसमें खुद को शरीक किया. कांवड़ यात्रियों के लिए पॉलिटिकल लोगों ने कैम्प लगाए. 2017 से तो सीधे सरकार इस यात्रा को प्रायोजित करने लगी. कांवड़ यात्रियों को राजनेता अपने लिए साक्षात देवदूत समझने लगे. वे यात्रा के दौरान चाहे कितना ऊधम करें, हुड़दंग मचाएं उनको सब माफ. जो काम पहले समाज अपने सहयोग से करता था, अब उसमें सरकार घुस गई.

कांवड़ यात्रा के दौरान मीट-मांस की दुकानों पर सरकार ने रोक लगा दी. शिवरात्रि तक उनकी बिक्री बाधित कर दी गई. पुलिस कांवड़ यात्रा के लिए निकले लोगों के कारण पैदा हुई अराजकता को संभालने की व्यवस्था करने की बजाय उनकी सेवा में लग गई. वे जो कहें, वह सच. वे भीड़ भरी सड़कों पर पूरी सड़क घेर कर चलते. इस दौरान धोखे से कोई गाड़ी उन्हें छू गई तो कांवड़िये गाड़ी तोड़ देते और चालक को धुन डालते. उनके कोप का शिकार कोई भी हो सकता है. अब यह कांवड़धारी वोट पुख्ता करने लगे.

एक महीने तक सड़कों पर भय और अराजकता का माहौल
लगभग एक महीने तक अफरा-तफरी का माहौल रहता है. जो लोग राजस्थान के अलवर, सीकर आदि स्थानों से आते हैं, वे एक महीने पहले से गंगोत्री और गोमुख किसी भी टैक्सी अथवा बस से आ जाते हैं और फिर गंगा जल लेकर अपने-अपने क्षेत्र को निकल पड़ते हैं. ये लोग वापसी पैदल करते हैं इसलिए महीना भर लगना स्वाभाविक है. पहाड़ी रास्तों से पैदल गुजरना आसान नहीं होता. कहीं सड़क सकरी होती है तो कहीं सीधी चढ़ाई. उतराई में पैदल चलना और कष्टकारी होता है. जरा सा भी पैर फैसला तो सैकड़ों फिट गहरी खाई में गए. कांवड़ियों को पहाड़ी सड़क पर पैदल चलने या गाड़ी चलाने का सलीका भी नहीं पता होता. यहां चढ़ती हुई गाड़ी को पहले रास्ता देना होता है पर कांवड़िये इसका ख्याल नहीं रखते.

डाक कांवड़ तो भागती आ रही मौत!
इसके अलावा जब डाक कांवड़ चलती है तब तो ऋषिकेश से गंगोत्री तक का सड़क मार्ग इतना व्यस्त हो जाता है कि पल-पल खाई में गिरने का खतरा. डाक कांवड़ को रोका नहीं जा सकता. यह रात-दिन 24 घंटे चलती है. इन्हें चार या पांच दिन में गोमुख और वाहन से घर आने तक की यात्रा पूरी करनी होती है. ये लोग अपने साथ ट्रक लेकर आते हैं. ट्रक में उनकी बाइक्स, हफ़्ते भर का राशन पानी, खाना बनाने के बर्तन, कुकिंग गैस और बीसियों लोग बैठे होते हैं. ये अपने ट्रक पर पटरे लगा कर उसे तीन खंडों में बांटते हैं. नीचे के खाने में बाइक और खाने-पीने का सामान, बर्तन तथा कुकिंग गैस आदि. फट्टा लगाकर ऊपर के खाने में सवारियां बैठती हैं और सबसे ऊपर कुछ और सामान. ट्रक अपनी सामान्य ऊंचाई से दो-तीन फिट ऊंचा हो जाता है.

ऋषिकेश से चंबा के बीच कई जगह पहाड़ धसकते हैं और एकाध जगह सड़क और चट्टान के बीच ऊंचाई इतनी कम होती है कि ट्रक रोककर उसका कुछ सामान नीचे उतारते हैं तथा एक खंड को पटरा हटाकर ख़त्म कर देते हैं. तब वह ट्रक निकल पाता है. इसके अलावा मैदान के ड्राइवरों को पहाड़ी सड़क पर ट्रक चलाना नहीं आता. आमतौर पर कांवड़ यात्री सस्ते के चक्कर में खस्ताहाल ट्रक लाते हैं, जो अक्सर ऊंचाई पर धोखा दे जाते हैं. वे खराब हो गए तो पूरा रास्ता बाधित. खासकर उत्तरकाशी से आगे बढ़ते ही रास्ता खतरनाक होने लगता है.

चार धाम यात्राएं हादसों को न्योता देती हैं!
कांवड़ यात्रा तो सावन में शुरू होती है, किंतु चार धाम यात्रा मई महीने की शुरुआत से चालू होती है और दीवाली तक निरंतर चलती है. अब चार धाम- बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जाने के लिए ऐसी भीड़ उमड़ती है कि हर साल लाखों यात्री इन धाम पर आते हैं. सरकार को रेवन्यू मिलता है और स्थानीय लोगों की भी कमाई होती है. किंतु ये यात्राएं हिमालय के कच्चे पहाड़ों के संतुलन को ध्वस्त कर रही हैं. हर साल पहाड़ों पर अति वर्षा होती है. कई जगह धसान होती है, पहाड़ी नदियां प्रलय ला देती हैं. हर साल कई बसें या कारें खाई में गिरती हैं. असंख्य लोग काल कवलित होते हैं. जाड़ों में ग्लेशियर नदियों में आ गिरते हैं. नदियों में अथाह जल उमड़ता है और अपने साथ वह इतना मलबा लाती हैं कि नदियों के किनारे बन रही परियोजनाओं में मलबा भर जाता है, काम रुक जाता है और उन असंख्य मजदूरों का पता नहीं चलता जो हाइडल परियोजनाओं के लिए बनी टनल के अंदर काम कर रहे होते हैं.

पहले चारधाम यात्रा तीर्थ दर्शन थी
मेरी दादी ने 1955 में बद्री, केदार, गंगोत्री और यमुनोत्री की यात्रा की थी. उस समय गांव का पूरा जत्था यात्रा पर निकला था. हरिद्वार से ऋषिकेश होते हुए वे पैदल बद्रीनाथ गए फिर पहाड़ के ऊपर से केदार और गंगोत्री तथा यमुनोत्री. पूरा पहाड़ी रास्ता पैदल मापा. पहाड़ के ऊपर का रास्ता कम थकाऊ और कम खतरनाक होता है. क्योंकि क्लाउड बर्स्ट (बादल फटने) जैसी आपदाएं पहाड़ के मध्य हिस्से में होती हैं. इसके अलावा वहां बाढ़ का खतरा भी नहीं. वे बताती थीं कि यह यात्रा जान जोखिम वाली तो होती थी क्योंकि पगडंडी से पहाड़ चढ़ने में बहुत से यात्री गिर जाते. अधिकतर यात्री बुजुर्ग होते थे. इसीलिए तब कहावत थी- जाय जो बद्री, वो लउटे न उद्री. लउटे जो उद्री वो होय न दरिद्री.

अर्थात् जो बद्री नाथ यात्रा पर जाता है, वह जीवित नहीं लौट पाता और यदि लौट आया तो फिर वह दारिद्रता से दूर हो जाएगा. उस समय चार धाम यात्रा करने वालों के विश्राम के लिए चट्टियां बनी थीं. हर कोस पर कोई न कोई चट्टी होती थी. बाबा काली कमली वालों के आश्रम में भोजन की व्यवस्था होती. पर अधिकांश यात्री स्थानीय जुगाड़ से भोजन के नाम पर खिचड़ी बना लेते. पूरा महीना दोनों टाइम खिचड़ी.

पहले की यात्रा सुरक्षित थी
1982 में गढ़वाल संसदीय सीट से हेमवती नंदन बहुगुणा चुनाव लड़े थे. तब इस चुनाव को कवरेज करने के लिए कानपुर जागरण से मुझे भेजा गया. इस सीट पर एक विधानसभा सीट देहरादून थी और उसके बाद कोटद्वार, पौड़ी, श्रीनगर, बद्री-केदार आदि. कोटद्वार से पौड़ी तक की सड़क एकदम सकरी थी. जगह-जगह हेयर पिन बैंड होते और सावधानी से गाड़ी चलाने की हिदायत होती. श्रीनगर से रुद्रप्रयाग, कर्ण प्रयाग, जोशीमठ पहुंचते तब विष्णु प्रयाग से एक तरफ़ की गाड़ियां छोड़ी जातीं. दूसरी तरफ़ से आने वाली गाड़ियों को पांडुकेश्वर में रोक देते. समय लगता लेकिन यात्रा सुरक्षित होती. तब यदा-कदा कोई गाड़ी दूसरी तरफ से आती दिखती. मगर अब तो चार धाम रूट दिल्ली-गुड़गांव जैसा मार्ग बन गया है. इसलिए सुविधा तो बढ़ी मगर खतरा भी उतना ही.

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