चुनाव विशेषज्ञ संजय कुमार को ‘सुप्रीम’ राहत

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को चुनाव विशेषज्ञ संजय कुमार को सोशल मीडिया पर पोस्ट के जरिए महाराष्ट्र की मतदाता सूची से जुड़ी गलत जानकारी फैलाने के आरोप में चुनाव आयोग की ओर से दर्ज कराई गई दो एफआईआर के सिलसिले में गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान की। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
सोमवार, 25 अगस्त 2025, 09:29 AM 6 मिनट read
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चुनाव विशेषज्ञ संजय कुमार को ‘सुप्रीम’ राहत
Photo: UB India News Archive

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को चुनाव विशेषज्ञ संजय कुमार को सोशल मीडिया पर पोस्ट के जरिए महाराष्ट्र की मतदाता सूची से जुड़ी गलत जानकारी फैलाने के आरोप में चुनाव आयोग की ओर से दर्ज कराई गई दो एफआईआर के सिलसिले में गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान की। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा और वकील सुमीर सोढ़ी की इस दलील पर गौर किया कि चुनाव विशेषज्ञ की ओर से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के बावजूद एफआईआर दर्ज की गई हैं। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘नोटिस जारी करें। इस बीच कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।’

शीर्ष अदालत का दरवाजा क्यों खटखटाया?
सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) में लोकनीति के सह-निदेशक संजय कुमार ने महाराष्ट्र में अपने खिलाफ दर्ज दो एफआईआर को रद्द करने की मांग करते हुए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है।

एफआईआर में क्या?
एफआईआर में उन पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट के जरिए महाराष्ट्र की मतदाता सूची से जुड़ी गलत जानकारी फैलाने का आरोप लगाया गया है।

याचिका में क्या आरोप?
याचिका में आरोप लगाया गया है कि ये एफआईआर कानून का दुरुपयोग हैं। यह एक शिक्षाविद को कम से कम एक वास्तविक गलती के लिए परेशान करने का प्रयास हैं।

संजय कुमार के मतदाता सूची पर विवाद के पूरा विवरण

संजय कुमार के मतदाता सूची विवाद का मुख्य बिंदु यह है कि उन्होंने महाराष्ट्र चुनाव से जुड़ी मतदाता सूची पर एक गलत डेटा सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, जो बाद में विवाद का कारण बना और उन पर एफआईआर दर्ज की गई।

विवाद की शुरुआत

  • लोकनीति-सीएसडीएस के सह-निदेशक प्रो. संजय कुमार ने अगस्त 2025 में सोशल मीडिया (एक्स) पर महाराष्ट्र के दो विधानसभा क्षेत्रों (नासिक का देवलाली और नागपुर का रामटेक) की मतदाता सूची में कथित हेराफेरी से संबंधित एक डेटा साझा किया।

  • उनका दावा था कि 2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बीच इन क्षेत्रों में मतदाता संख्या में असामान्य बदलाव पाया गया।

  • यह पोस्ट वायरल हो गई और विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग एवं सत्तारूढ़ दल पर बड़े पैमाने पर मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोप लगा दिए।

सरकारी प्रतिक्रिया और एफआईआर
  • चुनाव आयोग ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए संजय कुमार पर ‘झूठा/भ्रामक डेटा फैलाने’ के आरोप में नागपुर और नासिक के जिला निर्वाचन अधिकारियों की ओर से अलग-अलग एफआईआर दर्ज कराईं।

  • आरोप था कि राहुल गांधी सहित विपक्ष द्वारा इस डेटा को चुनावी आरोपों के लिए आगे बढ़ाया गया, जिससे चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठे।

  • चुनाव आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी प्रकार का गैर-आधिकारिक और अप्रमाणित चुनावी डेटा कानून के तहत दंडनीय है।

संजय कुमार की सफाई और माफी

  • संजय कुमार ने सार्वजनिक रूप से अपनी गलती स्वीकार की और स्पष्ट किया कि डेटा टीम के स्तर पर पंक्तियों की गलत तुलना के कारण गलती हुई।

  • उन्होंने ट्वीट और संबंधित पोस्ट डिलीट कर दी तथा माफी भी मांगी।

सुप्रीम कोर्ट में मामला

  • गिरफ्तारी की आशंका के चलते संजय कुमार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

  • शीर्ष अदालत ने दोनों एफआईआर पर कार्रवाई पर रोक लगाई और फिलहाल उनकी गिरफ्तारी या किसी दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा प्रदान की।

  • कोर्ट ने माना कि संजय कुमार ने सार्वजनिक रूप से माफी मांग ली है, लिहाजा इस पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।विवाद का सार्वजनिक और राजनीतिक असर

  • बीजेपी नेताओं ने इस गलती को विपक्ष द्वारा चुनाव आयोग की साख पर हमला करने का हथियार बताया, जबकि विपक्ष ने इस पर चुनावी पारदर्शिता पर सवाल उठाए।

  • यह मामला देश में चुनावी डेटा की सत्यता, सार्वजनिक संवाद की जिम्मेदारी और सोशल मीडिया पर चुनावी आंकड़ों के प्रामाणिक होने की बहस को नई दिशा दे गया।

संजय कुमार ने महाराष्ट्र चुनाव की मतदाता सूची में हेराफेरी संबंधी गलत डेटा साझा किया, जिस पर दो जगह एफआईआर दर्ज हुई, बाद में उन्होंने माफी मांगी और सुप्रीम कोर्ट से उन्हें गिरफ्तारी पर राहत मिली।

मतदाता सूची विवाद के बाद CSDS की स्थिति क्या है

मतदाता सूची विवाद के बाद CSDS (Centre for the Study of Developing Societies) की स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण हो गई है। विवाद के चलते CSDS को फंडिंग देने वाली संस्था ICSSR ने संस्था को कारण बताओ नोटिस जारी किया है, जिसमें उनके काम में झूठे आंकड़े और नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है।

फंडिंग पर संकट
भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) ने CSDS को कारण बताओ नोटिस भेजा है और उनके शोध अनुदान (ग्रांट) की शर्तों के उल्लंघन और डेटा हेरफेर का गंभीर आरोप लगाया है।

ICSSR के नोटिस में वित्तीय तथा प्रशासनिक अनियमितताओं सहित कुल ग्यारह शिकायतें हैं, जिनमें कथित पक्षपातपूर्ण चुनाव विश्लेषण और भारत के चुनाव आयोग की साख को नुकसान पहुंचाने का प्रयास भी शामिल है।

CSDS की अनुदान पर भी खतरा मंडराया हुआ है, क्योंकि उक्त अनुदान से संस्था का अधिकांश कुशल और प्रशासनिक खर्चा पूरा होता है।

संस्थागत साख पर असर
विवाद के बाद CSDS की साख पर भी सवाल उठे हैं और उनके पुराने शोध कार्यों की निष्पक्षता, खासकर चुनावी सर्वे और डेटा पर, दबाव में आ गई है।

विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस, ने विवादित डेटा के जरिए सत्तारूढ़ पक्ष पर चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए, वहीं सत्ताधारी दलों ने CSDS के कार्य को विदेशी फंडिंग और समाज विभाजन से जोड़कर आरोप लगाए।

भविष्य की दिशा
फिलहाल संस्था के कार्य और फंडिंग को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। ICSSR के फैसले और सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई के बाद ही संस्था की स्थिति स्पष्ट हो पाएगी।

संस्था के संचालन व शोध-कार्य पर इस विवाद का फिलहाल नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, लेकिन CSDS का कई दशकों का अकादमिक योगदान अब राजनीतिक सवालों के घेरे में है।

मतदाता सूची विवाद के चलते CSDS की फंडिंग पर संकट और अकादमिक स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल उठ गए हैं, संस्था की प्रतिष्ठा व भविष्य अभी अनिश्चितता के दौर में है।

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