क्या मतदाता सूची में धांधली से कोई चुनाव जीता जा सकता है ?

कांग्रेस के नेतृत्व में गठित विपक्षी दलों का गठजोड़ ‘इंडिया’ कई राज्यों में मतदाता सूची के आंकड़ों में हेराफेरी काे मुद्दा बना रहा है। वह यह आरोप लगा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी फर्जी मतदाताओं के जरिए धोखाखड़ी से चुनाव जीतती है। सच्चाई यह है कि देश में मतदाता सूची कभी भी पूरी तरह […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
बुधवार, 10 सितंबर 2025, 06:04 AM 9 मिनट read
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क्या मतदाता सूची में धांधली से कोई चुनाव जीता जा सकता है ?
Photo: UB India News Archive

कांग्रेस के नेतृत्व में गठित विपक्षी दलों का गठजोड़ ‘इंडिया’ कई राज्यों में मतदाता सूची के आंकड़ों में हेराफेरी काे मुद्दा बना रहा है। वह यह आरोप लगा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी फर्जी मतदाताओं के जरिए धोखाखड़ी से चुनाव जीतती है।

सच्चाई यह है कि देश में मतदाता सूची कभी भी पूरी तरह से सही नहीं रही है। विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) जैसे अभियानों से गलत तरीके से मतदाताओं के नाम काटे जा सकते हैं, तो जोड़े भी जा सकते हैं। हालांकि, पहली बार विधानसभावार विश्लेषण करके यह पाया गया है कि बिहार में एसआईआर होने के बाद जारी की गई मसौदा सूची में नाम हटाने की कोई सुनियोजित साजिश नहीं दिखती है। इस विषय पर काम करनेवाली ‘टुडेज नंबर थ्योरी’ नामक संस्था ने आंकड़ों का उपयोग करके प्रमुख बिंदुओं को समझाने का प्रयास किया है। उसने यह साबित किया है कि 2024 के लोकसभा चुनाव और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों के बीच मतदाताओं की संख्या बढ़ने से भाजपा की जीत का कोई सीधा संबंध नहीं है।

हालांकि, कांग्रेस महाराष्ट्र में भाजपा की जीत को कथित मतदाता सूची से छेड़छाड़ का ही परिणाम बताती है। महाराष्ट्र के लगभग हर विधानसभा क्षेत्र में 2024 में मतदाताओं की संख्या बढ़ने का जो रुझान देखा गया, वह राज्य में आबादी के अनुरूप ही है। इतना ही नहीं, इसके एक साल के भीतर अन्य राज्यों में भी हुए लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच बढ़ी मतदाता संख्या भी आबादी के अनुरूप है। इसके अतिरिक्त यह भी देखा गया कि 2014 के बाद और उसके पहले हुए विधानसभा चुनावों में प्रत्येक क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या में बदलाव बहुत अलग नहीं है।

महाराष्ट्र और शिकायत

महाराष्ट्र में भाजपा के नेतृत्व में मिली जीत का मतदाता सूची से कोई लेना-देना नहीं है। कांग्रेस महाराष्ट्र के कुछ विधानसभा क्षेत्रों के बारे में आरोप लगा रही है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के कुछ ही महीने बाद हुए विधानसभा चुनावों के समय मतदाता संख्या में भारी वृद्धि हो गई। यह ध्यान रहे कि कांग्रेस-राकांपा-शिवसेना के गठबंधन- महा विकास आघाड़ी ने 2024 के लोकसभा चुनावों में महाराष्ट्र में जीत हासिल की, लेकिन विधानसभा चुनावों में भाजपा के नेतृत्ववाली महायुति से बुरी तरह हार गया। विश्लेषण में पाया गया कि 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन की जीत कुछ विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या में असामान्य रूप से हुई भारी वृद्धि के कारण नहीं हुई।

दरअसल, महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव में जिन विधानसभा सीटों पर महा विकास आघाड़ी ने बढ़त बनाई थी, उनमें से विधानसभा चुनाव में 109 सीटें भाजपा की महायुति ने वापस छीन ली। यहां देखनेवाली बात यह है कि राज्य में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच जिन सीटों पर मतदाताओं की संख्या सर्वाधिक यानि 25 प्रतिशत से अधिक बढ़ी, उनमें से एक चौथाई भी महायुति गठबंधन नहीं जीत पाया।

चुनावों के बीच अंतर

लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच मतदाताओं में बदलाव सामान्य बात है। महाराष्ट्र में 2024 के दो चुनावों के बीच मतदाताओं की संख्या में वृद्धि हर विधानसभा क्षेत्र में औसतन 3.6 प्रतिशत थी। यह 2019 की तुलना में काफी ज्यादा है, लेकिन 2014 में हुई वृद्धि के काफी करीब है। 2014 और 2024 के बीच सात अन्य राज्यों में हुए चुनावों में मतदाता संख्या का भी विश्लेषण किया गया, इसके अनुसार, तीन ऐसे राज्य दिल्ली, हरियाणा और झारखंड हैं, जहां लोकसभा चुनाव के एक साल से भी कम समय में विधानसभा चुनाव हुए और कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान ऐसे चार राज्य हैं, जहां विधानसभा चुनाव के लगभग एक साल बाद लोकसभा चुनाव हुए। इनमें से झारखंड और कर्नाटक जैसे राज्यों में विधानसभा क्षेत्रवार मतदाताओं की बढ़ोतरी महाराष्ट्र जैसी ही है, पर इन दोनों राज्यों में भाजपा चुनाव हार गई।

मतदाताओं की बढ़ती संख्या

अपने देश में साल 2014-2025 और 1980-2005 के बीच मतदाताओं की संख्या समान रूप से बढ़ी है। ऐसा नहीं है कि संख्या आज ही बढ़ रही है, पहले भी संख्या बढ़ती थी। विश्लेषण में यह भी देखा गया है कि 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के सत्ता में आने से पहले हुए लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच मतदाताओं की संख्या में किस तरह का बदलाव आया?

चुनाव आयोग ने 2014 के बाद से ही विधानसभा क्षेत्रवार मतदाता आंकड़े प्रकाशित करना शुरू किया है, इसलिए विधानसभा स्तर पर तुलना नहीं की जा सकती। संसदीय निर्वाचन क्षेत्र की तुलना से पता चलता है कि 2014 से 2025 तक एक वर्ष के भीतर हुए लोकसभा और विधानसभा के चुनावों के बीच मतदाताओं की संख्या में औसत वृद्धि 1980-2005 के बीच एक साल के अंदर हुए लोकसभा व विधानसभा चुनावों से केवल 1.2 प्रतिशत अधिक है। हालांकि, 1980-2005 की अवधि में संख्या अंतर 2014-25 की अवधि की तुलना में बहुत अधिक है। इस विश्लेषण में तुलना के लिए 1980-2005 की अवधि इसलिए चुनी गई, क्योंकि 2008 में परिसीमन के बाद चुनाव क्षेत्रों की सीमाएं बदल गईं।

2014 से पहले का हाल

साल 2014 से पहले विधानसभा चुनावों के बीच मतदाता संख्या में कहीं ज्यादा अंतर होता था। कांग्रेस के आला नेता राहुल गांधी द्वारा मतदाताओं की संख्या में भारी उछाल के आरोप 2024 के लोकसभा चुनाव के एक साल के भीतर हुए विधानसभा चुनावों तक ही केंद्रित हैं, लेकिन आमतौर पर नियमित अंतराल पर होने वाले विधानसभा चुनावों के बीच के रुझान की जांच करना भी जरूरी है। पता चलता है कि 1978-2007 की अवधि में विधानसभा के हुए दो चुनावों के बीच मतदाता संख्या में भारी बदलाव आम तौर पर 2008-2025 की अवधि में हुए ऐसे बदलावों की तुलना में ज्यादा रहा है। इनमें कुछ असामान्य किस्म के बदलावों को अपवाद मान लेना चाहिए, जो संभवतः चुनाव आयोग की रिपोर्टों में टाइपिंग संबंधी त्रुटियों के कारण हो सकते हैं।

शिकायतों के मायने

कुल मिलाकर, मतदाता सूची विश्लेषण का निचोड़ यह है कि मतदाताओं की संख्या में हालिया उतार-चढ़ाव कोई नई बात नहीं है, बल्कि इस तरह के बदलाव मोदी-पूर्व काल में भी होते रहे हैं। आज भी इनका भाजपा की जीत से कोई लेना-देना नहीं है। हां, मतदाता सूची में त्रुटियां हो सकती हैं, चाहे वे साजिशन हों या लापरवाही के कारण। ऐसी विसंगतियों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर सुनियोजित तरीके से मतदाता-सूची में धांधली का आरोप लगाने के लिए करना अनुचित लगता है।

बिहार में भारतीय चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण ने एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर रखा है। विपक्षी दलों ने बार-बार यह आशंका व्यक्त की है कि मतदाता सूची में शामिल होने के लिए निर्धारित सख्त दस्तावेज मानदंडों के कारण ऐसे कई लोग मताधिकार से वंचित हो सकते हैं, जिनके पास पूरे दस्तावेज नहीं हैं। इस पर सर्वोच्च न्यायालय की भी नजर है और उसकी दृष्टि उदार है, ताकि किसी भी मतदाता के साथ नाइंसाफी न हो। आधार को भी एक प्रमाण के रूप में स्वीकार किया गया है।

आज एक बड़ा सवाल पूछा जा सकता है। क्या 1.4 अरब की आबादी वाले देश में एक आदर्श मतदाता सूची संभव है? शायद अभी ऐसा होना संभव नहीं है। हम यह पाते हैं कि देश में मतदाता सूची कभी सोलह आना सही नहीं थी। सूची को लेकर हमेशा से शिकायतें रही हैं।

राजनीति पर नहीं, चुनाव सुधार पर ध्यान देना चाहिए

जब मतदाताओं की संख्या को लेकर शिकायत सामान्य बात रही है, तब किसी के लिए सबसे आसान तरीका यह दावा करना होगा कि चुनावी धोखाधड़ी हुई है। ज्यादा समझदारी की बात यह होगी कि उन प्रक्रियाओं में कुछ सांख्यिकीय विसंगतियों को स्वीकार किया जाए, जिनमें अतीत में करोड़ों लोग शामिल थे और अब लगभग एक अरब लोग शामिल हैं। यह संभव है कि जनगणना के आंकड़े सौ प्रतिशत सटीक न हों। इसके अनेक कारण हैं। अपनी सूचना के लिए लोग स्वयं जिम्मेदार होते हैं। अनेक मतदाता खुद को एक से अधिक जगह पंजीकृत कराते हैं। कुछ नेताओं के भी एकाधिक वोटर कार्ड पाए गए हैं। यही कारण है कि वयस्क आबादी से भी ज्यादा मतदाता दर्ज हो जाते हैं। यह विषय राजनीति का नहीं, चुनाव सुधार का है।

मतदान योग्य आबादी और मतदाता संख्या एक होनी चाहिए

हमने जनगणना के आस-पास हुए आम चुनावों में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या की तुलना जनगणना के अनुसार, उस चुनाव में मतदान के पात्र लोगों की संख्या से की है। भारत में मतदान की आयु 1984 के चुनाव तक 21 वर्ष थी और 1989 के चुनावों के बाद से 18 वर्ष हो गई है। ऐसी पांच जोड़ियों – 1971 के चुनाव और जनगणना, 1980 के चुनाव और 1981 की जनगणना, 1991 के चुनाव और जनगणना, 1999 के चुनाव, 2001 की जनगणना, 2009 के चुनाव और 2011 की जनगणना – की तुलना से पता चलता है कि मतदाताओं की संख्या आम तौर पर पात्र वयस्क जनसंख्या से अधिक रही है, हालांकि 2009 के चुनाव और 2011 की जनगणना की जोड़ी में यह अंतर कम हुआ है। यह साफ है कि मतदाता सूची सुधार जरूरी है।

जनगणना और मतदाता

साल 2009 में लोकसभा चुनाव हुए थे। तब अनेक राज्यों में मतदान योग्य लोगों की संख्या से ज्यादा मतदाताओं की संख्या थी और कुछ राज्य ऐसे भी थे, जहां मतदाताओं की संख्या मतदान योग्य लोगों की संख्या से कम थी। (आंकड़े प्रतिशत में)

उत्तर प्रदेश 111.7

आंध्र प्रदेश 107.4

कर्नाटक 106.6

दिल्ली 105.3

ओडिशा 105.2

छत्तीसगढ़ 105

हिमाचल प्रदेश 103.8

बिहार 103.8

महाराष्ट्र 102.1

उत्तराखंड 101.2

झारखंड 100.9

राजस्थान 99.5

गुजरात 98.9

असम 97.8

पंजाब 95.3

केरल 95.3

मध्य प्रदेश 93.4

जम्मू-कश्मीर 93.3

पश्चिम बंगाल 91.5

तमिलनाडु 85.3

हरियाणा 80

 

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