चीन ने ताईवान के आसपास बड़े सैन्य अभ्यास शुरू कर दिए हैं. इन अभ्यासों का नाम ‘जस्टिस मिशन 2025’ रखा गया है. इसमें सेना, नौसेना, वायुसेना और रॉकेट फोर्स की यूनिट्स शामिल हैं. रॉयटर्स ने बताया कि कल मतलब मंगलवार को लाइव-फायर ड्रिल्स होंगी, और ताईवान के आसपास पांच जोनों में समुद्री और हवाई क्षेत्र […]
By UB India News • Patna, Bihar सोमवार, 29 दिसंबर 2025, 06:42 AM • 7 मिनट read
चीन ने ताईवान के आसपास बड़े सैन्य अभ्यास शुरू कर दिए हैं. इन अभ्यासों का नाम ‘जस्टिस मिशन 2025’ रखा गया है. इसमें सेना, नौसेना, वायुसेना और रॉकेट फोर्स की यूनिट्स शामिल हैं. रॉयटर्स ने बताया कि कल मतलब मंगलवार को लाइव-फायर ड्रिल्स होंगी, और ताईवान के आसपास पांच जोनों में समुद्री और हवाई क्षेत्र पर पाबंदी लगाई गई है. अल जजीरा ने बताया कि ये अभ्यास अमेरिका द्वारा ताईवान को दिए गए अब तक के सबसे बड़े हथियार पैकेज के ठीक 11 दिन बाद शुरू हुए हैं. अमेरिका का कहना है कि ये हथियार ताईवान की आत्मरक्षा करने में काम आएंगे. चीन ने इसका भी कड़ा जवाब दिया है. चीन का कहना है कि ताईवान को हथियार बेचना ‘वन चाइना पॉलिसी’ का उल्लंघन है.
इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ वॉर के अनुसार, चीन ताईवान को अपना हिस्सा मानता है और उसे मर्ज करना चाहता है, जरूरत पड़े तो ज़ोर-जबरदस्ती से भी. ताईवान इसे मानने से इनकार करता है और खुद को एक अलग लोकतांत्रिक देश मानता है. अभी तक की स्टोरी पढ़कर आपको लग रहा होगा कि यह सिर्फ क्षेत्र का विवाद है, जिस पर चीन हमेशा की तरह अपनी विस्तारवादी नीति थोपना चाहता है. लेकिन… जरा रुकिए. असल बात केवल क्षेत्र नहीं, बल्कि बहुत अलग स्तर की है. तो चलिए समझाते हैं पूरी कहानी क्या है!
पहला कारण: चीन, ताईवान और सेमीकंडक्टर
अगर हम ताईवान को नक्शे पर देखें, तो यह एक छोटा-सा द्वीप है, लेकिन इसकी आर्थिक अहमियत किसी महाद्वीप से कम नहीं है. ताईवान पर चीन की नजर होने की सबसे बड़ी वजह वहां मौजूद ‘सेमीकंडक्टर चिप्स’ का खजाना है. आज की दुनिया में चिप्स वही भूमिका निभा रहे हैं, जो 20वीं सदी में क्रूड ऑयल निभाता था.
ताईवान की कंपनी TSMC (Taiwan Semiconductor Manufacturing Company) दुनिया की सबसे एडवांस चिप्स बनाने वाली इकलौती कंपनी है. दुनिया की 90% से ज्यादा ‘सुपर एडवांस’ चिप्स यहीं बनती हैं. ये वो चिप्स हैं जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सुपर कंप्यूटर, हाइपरसोनिक मिसाइलों और अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों में लगती हैं. चीन खुद को मैन्युफैक्चरिंग का पावरहाउस कहता है, लेकिन सच यह है कि चिप बनाने की मशीनरी और उसकी बारीकियों में वो आज भी ताईवान और अमेरिका से पीछे है.
यही चिप्स ताईवान के लिए ‘सिलिकॉन शील्ड’ बन जाती हैं. ये चिप्स उसकी सबसे बड़ी सुरक्षा भी हैं. अगर चीन हमला करता है तो ताईवान में फैक्ट्रियां तबाह हो जाएंगे. इसका परिणाम यह होगा कि चीन की अपनी अर्थव्यवस्था भी बैठ जाएगी, क्योंकि उसकी मशीनें और गैजेट्स भी इन्हीं चिप्स पर चलते हैं. वहीं, अमेरिका और यूरोप कभी नहीं चाहेंगे कि इस ‘खजाने’ की चाबी चीन के हाथ लगे, क्योंकि फिर चीन पूरी दुनिया की तकनीक को अपनी उंगलियों पर नचाएगा.
अपनी ताकत का अहसास कराना चाहता है चीन!
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने ताईवान के आसपास पांच ऐसे जोन बनाए हैं जहां उसने समुद्री और हवाई रास्तों को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया है. वहां ‘लाइव-फायर’ ड्रिल यानी असली गोला-बारूद के साथ अभ्यास किया जा रहा है. चीन का मकसद ताईवान को यह दिखाना है कि वो जब चाहे इस द्वीप की सांसें रोक सकता है और इसे पूरी दुनिया से काट सकता है.
दूसरा कारण: अमेरिका का ताईवान दो दिया सुरक्षा कवच
चीन की इस आक्रामकता की एक बड़ी वजह अमेरिका द्वारा ताईवान को दिया गया अब तक का सबसे बड़ा हथियार पैकेज भी है. करीब 11.1 अरब डॉलर के इस सौदे ने चीन को बुरी तरह भड़का दिया है. इस पैकेज में ऐसे हथियार शामिल हैं जो ताईवान को एक साही (Porcupine) की तरह बना देंगे, जिसे छूना चीन के लिए दर्दनाक होगा.
- HIMARS रॉकेट सिस्टम: यह वही सिस्टम है जिसने यूक्रेन युद्ध में रूस के पसीने छुड़ा दिए थे. यह लंबी दूरी तक सटीक निशाना लगाता है.
- ATACMS मिसाइलें: ये मिसाइलें चीन के तट पर बने सैन्य अड्डों को निशाना बनाने में सक्षम हैं.
- जेवलिन और होवित्जर: ये हथियार समुद्र के रास्ते आने वाली चीनी सेना को तट पर ही रोकने के लिए दिए गए हैं.
- ड्रोन तकनीक: समंदर में चीन के बड़े जहाजों को ट्रैक करने और उन्हें तबाह करने के लिए आधुनिक ड्रोन भी इस सौदे का हिस्सा हैं.
अमेरिका का कहना है कि ये हथियार सिर्फ आत्मरक्षा के लिए हैं, लेकिन चीन इसे अपनी संप्रभुता को चुनौती मानता है. जवाब में चीन ने बोइंग की एक ब्रांच सहित 20 अमेरिकी रक्षा कंपनियों और 10 बड़े अधिकारियों पर प्रतिबंध लगा दिए हैं.
तीसरा कारण: ताईवान की लोकेशन और व्यापार का रास्ता
चीन सिर्फ चिप्स के लिए ही नहीं, बल्कि ताईवान की लोकेशन के लिए भी बेताब है. ताईवान ‘फर्स्ट आइलैंड चेन’ का हिस्सा है. सरल भाषा में कहें तो, यह द्वीप प्रशांत महासागर में एक ऐसे गेट की तरह है, जो चीन को घेरे हुए है.
अगर ताईवान पर चीन का कब्जा हो जाता है, तो चीनी नौसेना को प्रशांत महासागर में सीधी एंट्री मिल जाएगी. इससे चीन सीधे अमेरिका के गुआम और हवाई जैसे ठिकानों को चुनौती दे पाएगा. इसके अलावा, दुनिया का एक बड़ा समुद्री व्यापार ताईवान जलडमरूमध्य (Taiwan Strait) से होकर गुजरता है. इस रास्ते पर कब्जा होने का मतलब है कि चीन यह तय करेगा कि किस देश का जहाज वहां से गुजरेगा और किसका नहीं.
दुनिया का रुख: कौन किसके साथ?
ताईवान की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बहुत अजीब स्थिति है. आधिकारिक तौर पर दुनिया के केवल 12 देश ही उसे एक आजाद देश मानते हैं. इनमें बेलीज, ग्वाटेमाला, हैती, पैराग्वे और सेंट लूसिया जैसे छोटे देश शामिल हैं. भारत और अमेरिका जैसे बड़े देश भी ‘वन चाइना पॉलिसी’ के तहत ताईवान के साथ सीधे राजनयिक संबंध नहीं रखते.
वन चाइना पॉलिसी का मतलब क्या है? दरअसल, चीन यह मानता है कि ताइवान चीन का ही हिस्सा है. इसी नीति के तहत कई देश ताइवान को अलग देश के रूप में मान्यता नहीं देते और चीन के साथ आधिकारिक कूटनीतिक संबंध रखते हैं.
लेकिन, पर्दे के पीछे की कहानी अलग है. अमेरिका ताईवान का सबसे बड़ा अनौपचारिक समर्थक है. जापान, ऑस्ट्रेलिया और फिलीपींस भी जानते हैं कि अगर ताईवान गिरा, तो अगला नंबर उनका हो सकता है. यूरोपीय संघ भी अपनी चिप्स की जरूरतों के लिए ताईवान पर निर्भर है, इसलिए वो भी लोकतंत्र की रक्षा के बहाने ताईवान के साथ खड़ा है.
चीन-ताईवान में क्या युद्ध होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्ण युद्ध (Full-scale War) होना इतना आसान नहीं है. इसके पीछे तीन बड़े कारण हैं:
- आर्थिक बर्बादी: ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगर ताईवान में युद्ध होता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को 10 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान होगा. यह दुनिया की कुल जीडीपी का लगभग 10% है. चीन भी इस मंदी से बच नहीं पाएगा.
- तबाही का डर: अगर युद्ध लंबा खिंचता है, तो ताईवान की चिप फैक्ट्रियां नष्ट हो सकती हैं. चीन को खाली द्वीप तो मिल जाएगा, लेकिन वो ‘खजाना’ नहीं मिलेगा, जिसके लिए वो यह सब कर रहा है.
- अमेरिकी दखल: अमेरिका का ‘ताईवान रिलेशंस एक्ट’ उसे ताईवान की रक्षा के लिए बाध्य तो नहीं करता, लेकिन उसे हथियार देने और जरूरत पड़ने पर मदद करने का विकल्प खुला रखता है.