क्या 2026 में लालू के बाद नीतीश भी रिटायर होंगे ?

2025 में बिहार की सियासत में कई बड़े उलटफेर हुए। बीजेपी पहली बार विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनी। नीतीश कुमार 2010 के बाद पहली बार 80 का आंकड़ा (जदयू विधायकों की संख्या) पार कर पाए। तेजस्वी की अगुआई में राजद सबसे खराब स्थिति में पहुंच गई। रामविलास पासवान के बाद अब चिराग पासवान भी […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शनिवार, 3 जनवरी 2026, 09:16 AM 10 मिनट read
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क्या 2026 में लालू के बाद नीतीश भी रिटायर होंगे ?
Photo: UB India News Archive

2025 में बिहार की सियासत में कई बड़े उलटफेर हुए। बीजेपी पहली बार विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनी। नीतीश कुमार 2010 के बाद पहली बार 80 का आंकड़ा (जदयू विधायकों की संख्या) पार कर पाए। तेजस्वी की अगुआई में राजद सबसे खराब स्थिति में पहुंच गई।

रामविलास पासवान के बाद अब चिराग पासवान भी बिहार की सियासत में बड़ा चेहरा बनकर उभरे हैं। दो दशक से बिहार की सियासत से गायब चल रहे उपेंद्र कुशवाहा की विधानसभा से लेकर राज्यसभा तक एंट्री हुई। लेफ्ट और कांग्रेस दोनों सिमट गई।

2026 बिहार की सियासत के लिए बदलाव का साल माना जा रहा है। लालू प्रसाद यादव खराब हेल्थ के कारण लगभग राजनीति से रिटायर हो चुके हैं। अब इस बात की चर्चा तेज है कि इस साल नीतीश कुमार भी राजनीति से रिटायर हो सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो 1990 से चले आ रहे लालू-नीतीश राज का अंत 2026 में हो जाएगा।

नीतीश की जगह निशांत संभाल सकते हैं जदयू

2005 के बाद से लगातार नीतीश कुमार बिहार के पावर सेंटर बने हुए हैं। पार्टी और सरकार में सबकुछ उनके इशारे पर होता है। 2025 से अचानक जदयू में बदलाव की बयार चलने लगी है। विधानसभा चुनाव के पहले से अचानक उनके बेटे निशांत कुमार की पॉलिटिकल डेब्यू की चर्चा जोर पकड़ने लगी।

उनके परिवार से लेकर पार्टी के नेताओं तक, सब लगातार इस बात की मांग कर रहे हैं कि निशांत को अब पार्टी की कमान संभाल लेना चाहिए। हालांकि पॉलिटिकल डेब्यू को लेकर निशांत लगातार चुप्पी साधे हुए हैं। वे कुछ भी बोलने से बचते रहे हैं। राजनीति में एंट्री के सवाल को टालते रहे हैं।

हालांकि सूत्रों की मानें तो बीजेपी के साथ निशांत के डेब्यू की डील पूरी हो गई है। पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और नीतीश के बेहद खास व केंद्रीय मंत्री ललन सिंह की अगुआई में उनकी एंट्री की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। कब और कैसे निशांत पॉलिटिक्स में आएंगे? उनके डेब्यू के बाद नीतीश कुमार की भूमिका क्या होगी? ये बातें केवल नीतीश कुमार तय करेंगे। इस पर कोई भी नेता कुछ भी बोलने को राजी नहीं।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत का अध्यात्म में मन लगता है। वह राजनीति से अब तक दूरी बनाकर रखे हुए हैं। फोटो 20 नवंबर 2025 के शपथ ग्रहण समारोह के तुरंत बाद की है।

2025 में निशांत ने दिए थे डेब्यू के संकेत

अमूमन राजनीति और राजनीतिक बयानबाजी से दूर रहने वाले निशांत 2025 में अचानक पॉलिटिकल तौर पर एक्टिव हो गए। जनवरी 2025 में स्वतंत्रता सेनानियों की मूर्ति अनावरण कार्यक्रम में पहली बार राजनीतिक बयान दिया। जनता से नीतीश कुमार और जेडीयू को वोट देने की अपील की। इसके बाद होली मिलन समारोह और अन्य सरकारी आयोजनों में उनकी मौजूदगी ने सियासी हलकों में हलचल मचा दी।

वे लगातार जनता से अपने पिता की उपलब्धियों को गिनाकर वोट करने की अपील करते रहे। हालांकि निशांत के चुनाव नहीं लड़ने के फैसले के बाद उनके राजनीति में आने की चर्चा पर लगभग ब्रेक लग गया था, लेकिन नतीजों के बाद एक बार फिर से इस बात की चर्चा तेज हो गई है।

बीजेपी में जेनरेशन शिफ्ट, नई तिकड़ी तैयार करने की तैयारी

2020 से पहले तक बिहार में तीसरे नंबर की पार्टी रहने वाली BJP अब बिहार में पहले नंबर की पार्टी है। भाजपा लगातार प्रयोग कर रही है। अब नए साल में पार्टी बिहार में सरकार के साथ-साथ संगठन को मजबूत बनाने पर भी ध्यान दे रही है।

2005 से 2020 तक लगातार संगठन को धारदार बनाने की जिम्मेदारी दिवंगत सुशील मोदी के कंधे पर थी। तब सुशील मोदी, नंदकिशोर यादव और अश्विनी चौबे की तिकड़ी हुआ करती थी। कैलाशपति मिश्र की अगुआई में बिहार बीजेपी की जो मजबूत नींव रखी गई थी। उसे इन्होंने विस्तार दिया।

सुशील मोदी के बाद बीजेपी के सभी प्रयोग अब तक फेल ही साबित रहे हैं। बीजेपी के एक प्रदेश अध्यक्ष का कार्यकाल तीन साल का होता है, लेकिन 2023-25 के बीच पार्टी अपने तीन प्रदेश अध्यक्ष बदल चुकी है।

अब जब अगले 4 साल तक बिहार में कोई बड़ा चुनाव नहीं है तो राष्ट्र से लेकर प्रदेश स्तर तक पार्टी को खड़ा करने की जिम्मेदारी बिहार के नेता (नितिन नबीन, भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष) को दी है। पार्टी ने बिहार में नई तिकड़ी बनाने की कोशिश की है।

भाजपा ने संजय सरावगी को प्रदेश अध्यक्ष और नितिन नबीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है। (फाइल फोटो)
भाजपा ने संजय सरावगी को प्रदेश अध्यक्ष और नितिन नबीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है। (फाइल फोटो)

पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता रहे नितिन नबीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और दरभंगा सदर के विधायक संजय सरावगी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर पार्टी को नए सिरे से मजबूत बनाने की कोशिश की है। इन दोनों के साथ प्रदेश स्तर पर सम्राट चौधरी का कद सरकार में लगातार बढ़ाया जा रहा है। इस हिसाब से देखें तो पार्टी बिहार में नई तिकड़ी को तैयार करने की कोशिश में जुट गई है।

इतना ही नहीं, अगर बिहार के मंत्रिमंडल में देखें तो संजय टाइगर, श्रेयसी सिंह, लखेंद्र पासवान, रमा निषाद और सुरेंद्र मेहता को जगह दी गई है। ये बिहार की सियासत में फ्रेस चेहरा हैं। अगर पुराने चेहरों की बात करें तो मंगल पांडेय, विजय सिन्हा जैसे नेता पर बीजेपी ने दांव लगाया है।

पॉलिटिकल एक्सपर्ट की मानें तो BJP ने जाति की जगह समावेशी पॉलिटिक्स का प्रयोग किया है। जाति की जगह पार्टी के प्रति वफादारी और निष्ठा को तवज्जो दी है। गैर यादव OBC और सवर्ण को साधने के साथ युवाओं को भी आगे बढ़ा रही है। इससे मैसेज दूर तक जाएगा। पार्टी को लॉन्ग टर्म पॉलिटिक्स में लाभ मिलेगा।

अब परिवार के सहारे कुशवाहा की पॉलिटिक्स, बेटे-पत्नी के साथ बहू भी एक्टिव

1990 के दशक से अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाले उपेंद्र कुशवाहा की पहचान एक ऐसे नेता के रूप में है जो कभी स्थिर नहीं रहे। 2005 के बाद देखें तो 20 साल की सियासत में 3 बार जेडीयू से जॉइन- रिजाइन किए। 3 बार अपनी नई पार्टी बनाई। एनडीए और महागठबंधन के अलावा तीसरे मोर्चे का भी प्रयोग कर चुके हैं, लेकिन पूरी तरह स्थिर नहीं रह पाए।

बिहार में कुशवाहा पॉलिटिक्स के बड़े नाम रहे उपेंद्र कुशवाहा हर सदन के नेता बने, लेकिन न पार्टी को लंबा चला पाए, न गठबंधन में टिक कर रह पाए। अपने दोस्त नीतीश कुमार के साथ भी उनका रिश्ता उतार चढ़ाव वाला ही रहा। 2020 के चुनाव में मात खाने वाले उपेंद्र कुशवाहा ने 2025 में वापसी की।

अपनी तीसरी पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा के बैनर तले न केवल वे बीजेपी के सहयोग से राज्यसभा के सदस्य बने। बल्कि 2025 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी के 4 विधायक बने।

अपनी पार्टी और पॉलिटिकल स्थिरता बनाए रखने के लिए कुशवाहा ने लालू यादव का वर्षों पुराना प्रयोग अब अपनी पार्टी में किया है। कार्यकर्ताओं की वफादारी पर भरोसा करने के बजाए उन्होंने अपने परिवार को आगे बढ़ा दिया है।

2006 में उपेंद्र कुशवाहा ने अपनी पहली पार्टी बनाई थी। इसके बाद पहली बार 2025 में अपने परिवार से अपनी पत्नी को विधानसभा का टिकट दिया। वह जीतकर विधायक बन गईं। इसके बाद अपने बेटे दीपक प्रकाश की पॉलिटिकल डेब्यू कराई। उन्हें सीधे मंत्री बनवा दिया। अब चर्चा है कि संगठन में उनकी बहू भी एक्टिव हो गईं हैं।

कुशवाहा के इस फैसले से भले कार्यकर्ताओं में तात्कालिक नाराजगी है, लेकिन इस बात को कुशवाहा भी मान रहे हैं कि उनका यही प्रयोग उनकी पार्टी को टूटने से बचाएगा।

कुशवाहा का यह फैसला हैरान करने वाला

सीनियर जर्नलिस्ट प्रवीण बागी बताते हैं, ’उपेंद्र कुशवाहा में यह बदलाव हैरान करने वाला है। वह नीतीश कुमार के स्कूल से निकले छात्र थे। वसूलवादी राजनीति करने वाले व्यक्ति रहे हैं। जब दल बदलते थे तो सदन की सदस्यता से भी इस्तीफा दे देते थे।’

उन्होंने कहा, ‘उपेंद्र कुशवाहा ने पहले परिवारवाद को बढ़ावा नहीं दिया था। पिछले लोकसभा चुनाव में हार के बाद इनकी सोच बदली नजर आ रही है। पार्टी टूट की स्थिति में पहुंच गई है, लेकिन वह झुकने को तैयार नहीं है।’

राजद में अब सभी बड़े फैसले तेजस्वी ले रहे हैं। रिजल्ट आने के बाद वह पार्टी के कार्यकर्ताओं से मिले थे। तस्वीर 26 नवंबर 2025 की है।
राजद में अब सभी बड़े फैसले तेजस्वी ले रहे हैं। रिजल्ट आने के बाद वह पार्टी के कार्यकर्ताओं से मिले थे। तस्वीर 26 नवंबर 2025 की है।

राजद में परिवार राज नहीं, अब तेजस्वी की ही चलेगी

जेनरेशनल शिफ्टिंग सत्ता पक्ष के साथ विपक्ष में भी दिख रहा है। स्थापना के समय से लेकर लोकसभा चुनाव 2024 तक, राजद में उम्मीदवार चुनने से लेकर गठबंधन के साथ सीट शेयरिंग तक, सब पर अंतिम मुहर लालू प्रसाद यादव लगाते थे। 2025 के बाद अब ये स्थिति पूरी तरह बदल गई है। अब राजद पर पूरी तरह तेजस्वी यादव ने अपना एकाधिकार जमा लिया है। लालू यादव ने उन्हें यह अधिकार दिया है।

जैसे ही तेजस्वी यादव ने राजद पर अपनी पकड़ मजबूत की, उन्होंने एक-एक कर अपने परिवार के लोगों को पार्टी से किनारे लगाना शुरू कर दिया। शुरुआत बड़े भाई और स्वाभाविक हिस्सेदार तेजप्रताप यादव से की। चुनाव से ठीक पहले उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया।

हालांकि सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से भले इस बात की जानकारी दी गई कि लालू यादव ने उन्हें पार्टी और परिवार से निकाला है, लेकिन तेजप्रताप कई बार दोहरा चुके हैं कि उनके भाई और सहयोगियों ने षड्यंत्र किया।

जो पार्टी कार्यकर्ताओं को मौका नहीं देगी, पिछड़ जाएगी

सीनियर जर्नलिस्ट बताते हैं, ‘सही मायने में देखें तो राजनीतिक पार्टी में जिस तरीके से समय-समय पर बदलाव होते रहना चाहिए वो भाजपा में दिख रहा है। नितिन नबीन कोई बड़े कद वाले नेता नहीं थे। पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया। यह एक बड़ा बदलाव है।’

बागी ने कहा, ‘बाकी पार्टियां ऐसा नहीं कर रही हैं। यही कारण है कि बाकी पार्टियां पीछे खिसकते जा रही हैं। कार्यकर्ताओं का इस्तेमाल केवल भीड़ जुटाने और नारेबाजी करने के लिए किया जा रहा है।’

पद पाना एक बात, जनता तय करती है कद

पॉलिटिकल एक्सपर्ट ने बताया, ‘बिहार ही नहीं, हर राज्य की राजनीति में जेनरेशन शिफ्ट होते हैं। ये बदलाव तो होने ही हैं। सुविधा के आधार पर लोग परिवारवादी बात करते हैं। बहुत कम समय से बीजेपी सत्ता में रही है, यही कारण है कि इनका परिवारवाद दिखाई नहीं देता है।’

उन्होंने कहा, ‘नेतृत्व परिवर्तन भले पार्टियां अपने आधार पर कर देती हैं, लेकिन इनका स्थायित्व इस बात से तय होगा कि जनता कितना स्वीकार करती है। पार्टी में पद पाना एक बात है, लेकिन आप इस पद पर कितने समय तक रहेंगे, कितना कद होगा, यह जनता तय करती है।’

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