श्चिम एशिया इस समय बारूद के ढेर पर बैठा है। ईरान और उसके विरोधियों के बीच बढ़ता सैन्य तनाव केवल मध्य-पूर्व की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर ऊर्जा, समुद्री व्यापार, वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी पड़ रहा है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजेश्कियन की आमने-सामने होने वाली मुलाकात सामान्य कूटनीतिक मुलाकात से कहीं अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देती है।
यह मुलाकात ऐसे समय हो रही है जब दुनिया की नजर इस बात पर है कि भारत इस जटिल संकट में किस तरह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखता है।
युद्ध के बीच संवाद की मेज क्यों महत्वपूर्ण है?
युद्ध के दौर में संवाद अक्सर सबसे कठिन, लेकिन सबसे जरूरी विकल्प होता है। भारत लंबे समय से पश्चिम एशिया में तनाव कम करने और बातचीत के माध्यम से समाधान की वकालत करता रहा है। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पजेश्कियन की मुलाकात इसी कूटनीतिक सोच को आगे बढ़ाने का अवसर हो सकती है।
भारत के लिए ईरान केवल एक पश्चिम एशियाई देश नहीं है। दोनों देशों के संबंध इतिहास, संस्कृति, व्यापार और रणनीतिक हितों से जुड़े हैं। वहीं दूसरी ओर भारत के अमेरिका, इजरायल और खाड़ी देशों के साथ भी महत्वपूर्ण संबंध हैं।
यही कारण है कि नई दिल्ली की स्थिति बेहद संवेदनशील है। उसे किसी एक खेमे में खड़े होने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए सभी पक्षों के साथ संवाद बनाए रखना है।
हॉर्मुज पर टिकी दुनिया की नजर
मोदी-पजेश्कियन वार्ता में सबसे महत्वपूर्ण विषयों में से एक स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज हो सकता है।
दुनिया की बड़ी मात्रा में तेल और गैस की आवाजाही इस समुद्री मार्ग से होती है। यदि युद्ध के कारण यहां तनाव बढ़ता है या समुद्री यातायात बाधित होता है तो उसका प्रभाव केवल तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा। परिवहन लागत, महंगाई, उद्योग और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला तक प्रभावित हो सकती है।
भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए यह चिंता और भी बड़ी है।
इसलिए भारत की प्राथमिकता स्पष्ट है—ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित रहे, समुद्री व्यापार निर्बाध रहे और क्षेत्रीय संघर्ष का विस्तार न हो।
चाबहार: एक बंदरगाह से कहीं ज्यादा
मोदी-पजेश्कियन बातचीत में चाबहार बंदरगाह का मुद्दा भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित चाबहार भारत के लिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंच का महत्वपूर्ण रणनीतिक रास्ता है। पाकिस्तान के रास्ते पर निर्भर हुए बिना भारत को मध्य एशिया से जोड़ने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण है।
इसलिए ईरान में लंबे समय तक अस्थिरता भारत की कनेक्टिविटी योजनाओं के लिए भी चुनौती पैदा कर सकती है।
भारत के लिए सवाल केवल यह नहीं है कि युद्ध कौन जीतता है। असली सवाल यह है कि युद्ध के बाद क्षेत्रीय व्यवस्था कैसी होगी और उसमें भारत के लिए कितनी रणनीतिक जगह बचेगी।
ईरान के साथ संबंध और अमेरिका का संतुलन
भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक उसका संतुलन रहा है।
एक तरफ भारत अमेरिका के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को लगातार मजबूत कर रहा है। दूसरी तरफ रूस के साथ उसके पुराने संबंध हैं और ईरान के साथ भी उसके महत्वपूर्ण रणनीतिक हित जुड़े हैं।
ऐसे में ईरान संकट भारत की विदेश नीति के लिए एक कठिन परीक्षा है।
नई दिल्ली को यह संदेश देना होगा कि भारत किसी दूसरे देश की विदेश नीति का अनुयायी नहीं है। भारत अपने फैसले भारत के हितों के आधार पर करता है।
यही रणनीतिक स्वायत्तता भारत को वैश्विक राजनीति में अलग पहचान देती है।
पजेश्कियन के लिए भी मोदी से मुलाकात महत्वपूर्ण
इस मुलाकात का महत्व केवल भारत के लिए नहीं है। ईरान के लिए भी भारत एक महत्वपूर्ण साझेदार है।
पश्चिमी दबाव, आर्थिक प्रतिबंधों और क्षेत्रीय तनाव के बीच ईरान को ऐसे देशों की आवश्यकता है जिनके साथ वह आर्थिक और कूटनीतिक संबंध बनाए रख सके।
भारत ईरान के लिए पश्चिमी दुनिया और एशिया के बीच एक महत्वपूर्ण संपर्क बिंदु हो सकता है।
मोदी और पजेश्कियन की बातचीत इसलिए केवल युद्ध पर प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं रहेगी। इसमें भविष्य के आर्थिक संबंध, व्यापार, ऊर्जा, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर भी चर्चा की संभावना महत्वपूर्ण है।
भारत की कूटनीति का असली चेहरा
इस पूरी परिस्थिति में सबसे दिलचस्प बात यह है कि भारत युद्ध के बीच किसी एक पक्ष का प्रचारक बनने के बजाय संवाद का पक्षधर बनना चाहता है।
भारत के सामने चुनौती बहुत बड़ी है।
उसे ईरान के साथ अपने संबंध बचाने हैं, अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत रखनी है, खाड़ी देशों के साथ आर्थिक हित सुरक्षित रखने हैं और साथ ही इजरायल के साथ अपने संबंधों को भी प्रभावित नहीं होने देना है।
यह आसान संतुलन नहीं है।
लेकिन शायद यही आज की भारतीय विदेश नीति की सबसे बड़ी परीक्षा भी है—दोस्तियां अनेक हो सकती हैं, लेकिन राष्ट्रीय हित एक ही होता है।
SCO से दुनिया को क्या संदेश मिलेगा?
यदि यह मुलाकात SCO जैसे बहुपक्षीय मंच के दौरान होती है, तो इसका प्रतीकात्मक महत्व और बढ़ जाता है।
आज वैश्विक राजनीति तेजी से बदल रही है। अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रभाव के साथ-साथ चीन और रूस की भूमिका भी बढ़ रही है। पश्चिम एशिया में संघर्ष इस शक्ति-संतुलन को और जटिल बना रहा है।
ऐसे में भारत खुद को किसी स्थायी ध्रुव में सीमित करने के बजाय ऐसी विदेश नीति की ओर बढ़ता दिखाई देता है जिसमें वाशिंगटन से भी संवाद हो, मॉस्को से भी; तेहरान से भी संबंध हों और खाड़ी देशों से भी।
यही भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका का संकेत है।
मोदी-पजेश्कियन मुलाकात का सबसे बड़ा संदेश
आखिरकार इस मुलाकात को केवल दो नेताओं की बैठक के रूप में देखना शायद इसके महत्व को कम करके आंकना होगा।
यह मुलाकात तीन स्तरों पर महत्वपूर्ण है—
पहला, भारत की ऊर्जा और समुद्री सुरक्षा के लिए।
दूसरा, ईरान के साथ भारत के रणनीतिक संबंधों के लिए।
तीसरा, वैश्विक शक्ति-संतुलन के बीच भारत की स्वतंत्र विदेश नीति के लिए।
युद्ध की भाषा मिसाइलों और बमों से लिखी जाती है, लेकिन शांति की भाषा बातचीत से लिखी जाती है।
अगर मोदी और पजेश्कियन के बीच बातचीत तनाव कम करने, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और क्षेत्रीय संवाद की दिशा में कोई रास्ता खोलती है, तो यह केवल भारत-ईरान संबंधों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया के लिए महत्वपूर्ण संकेत होगा।
आज दुनिया यह देख रही है कि युद्ध के शोर के बीच कौन बातचीत की आवाज को जिंदा रख सकता है। भारत के लिए यही अवसर है—न किसी खेमे का हिस्सा बनने का, न किसी से दूरी बनाने का, बल्कि अपने हितों की रक्षा करते हुए शांति और संवाद के पक्ष में खड़े होने का।








