By UB India News • Patna, Bihar सोमवार, 31 अगस्त 2026, 04:36 AM • 4 मिनट read
कनाडा में RSS प्रमुख मोहन भागवत के संबोधन का एक संदेश खास तौर पर चर्चा में आ गया—“हिंदू सबका सम्मान करते हैं और सबको स्वीकार करते हैं।” विविधता और सह-अस्तित्व पर जोर देते हुए भागवत ने भारतीय परंपरा को केवल धार्मिक पहचान तक सीमित न रखते हुए मानवता और सहयोग की भावना से जोड़ने की कोशिश की। उनके संबोधन में यह विचार भी सामने आया कि भारत की संस्कृति जरूरतमंदों की सहायता और विविधताओं को साथ लेकर चलने की रही है।
भागवत का यह संदेश ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया के कई हिस्सों में धर्म, पहचान और सांस्कृतिक अस्मिता को लेकर बहस तेज है। ऐसे माहौल में उनका यह कहना कि “ये मेरा है, वह तुम्हारा है” जैसी सोच से ऊपर उठकर विविधता को स्वीकार करना चाहिए, उनके भाषण का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
उनके इस विचार पर कार्यक्रम में तालियां भी बजीं। हालांकि, भारत में भागवत के हिंदू-मुस्लिम संबंधों से जुड़े बयानों पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं और AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी समेत कुछ नेताओं ने उनके विचारों पर अपनी अलग राय रखी है।
इससे पहले RSS प्रमुख मोहन भागवत ने अमेरिका में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा था कि मुसलमानों को भारत से निकालना हिंदुत्व नहीं है. उन्होंने कहा था कि धर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवता एक है. उन्होंने हिंदू शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि इसे किसी एक भाषा, पूजा-पद्धति या जीवनशैली तक सीमित नहीं किया जा सकता. उनके अनुसार विविधताओं के बावजूद हिंदू सभी का सम्मान और सभी को स्वीकार करते हैं. भागवत ने कहा कि भारत ने ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़ित लोगों को शरण दी और विभिन्न समुदाय आज भी अपनी विशिष्टताओं के साथ भारत में रहते हैं. इस मौके पर उन्होंने मुस्लिम, ईसाई और यहूदियों का भी जिक्र किया.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने कनाडा के टोरंटो में आयोजित ‘हिंदू विश्व बंधु – एम्ब्रेस द वर्ल्ड इन फ्रेंडशिप’ कार्यक्रम में भारत की सभ्यतागत सोच और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की सदियों पुरानी अवधारणा पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि भारत ने दुनिया पर विजय हासिल करने के बजाय ज्ञान, मूल्यों और सेवा के जरिए अपना प्रभाव स्थापित किया और इसी चरित्र के कारण उसे ‘विश्वगुरु’ कहा गया. आरएसएस चीफ मोहन भागवत ने कहा कि खुले विचारों वाले और ज्ञान से संपन्न लोग ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना को स्वीकार करते हैं, जिसका अर्थ है कि पूरी पृथ्वी एक परिवार है. उन्होंने कहा कि इंसानों के शरीर, आकार और रंग अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन मूल रूप से सभी एक हैं. इसलिए दूसरों की सेवा करना हमारा कर्तव्य है. उनके मुताबिक यही ज्ञान मनुष्य को स्थायी खुशी और संतोष की ओर ले जाता है.
भारत महाशक्ति या विश्वगुरु?
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि भारत को भले ही आज ‘सुपरपावर’ कहा जाए, लेकिन उसका इतिहास किसी महाशक्ति की तरह दुनिया पर प्रभुत्व जमाने का नहीं रहा है. उन्होंने कहा कि भारत ने दुनिया की सेवा की और अपने चरित्र के बल पर ‘विश्वगुरु’ बना, ‘महाशक्ति’ नहीं. भागवत ने भारतीय पूर्वजों की यात्राओं का जिक्र करते हुए कहा कि वे मैक्सिको से साइबेरिया तक गए और हिमालय को पैदल पार किया. छोटी नावों से दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुंचे, लेकिन किसी देश को जीतने के लिए नहीं गए. उन्होंने वहां ज्ञान, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद और सभ्यतागत मूल्यों का प्रसार किया.
टोरंटो में कार्यक्रम को संबोधित करते हुए RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि भारत की परंपरा दुनिया के प्रति मदद और अपनत्व की भावना पर आधारित है. उन्होंने कहा कि जब भी दुनिया में कहीं भारत से मदद मांगी गई, देश ने कभी इनकार नहीं किया और कई बार बिना मांगे भी मदद का हाथ बढ़ाया है. भागवत ने इसे भारत का ‘डीएनए’ और उसकी परंपरा बताया. उन्होंने कहा कि हिंदू चेतना में सजीव और निर्जीव दोनों को अपना मानने की भावना है. भारत को विविधता में एकता देखने की शिक्षा मिली है. उन्होंने कहा कि देश में विविधता कभी एकता के लिए समस्या नहीं बनी, बल्कि भारतीय परंपरा के अनुसार विविधता स्वयं एकता का ही रूप है.