150 साल पुरानी कांग्रेस के सामने अस्तित्व बचाने का संकट क्यों आया !

लोकसभा चुनाव 2024 में जब भाजपा को 2019 की 303 सीटों के मुकाबले 240 ही मिलीं तो विपक्ष इस बात से उत्साहित था कि नरेंद्र मोदी का जलवा खत्म हो गया. कांग्रेस के पीएम फेस रहे राहुल गांधी तो इसी से गदगद थे कि 2 बार असफल रहने के बाद तीसरी बार उन्हें नेता प्रतिपक्ष […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
सोमवार, 19 जनवरी 2026, 06:39 AM 9 मिनट read
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150 साल पुरानी कांग्रेस के सामने अस्तित्व बचाने का संकट क्यों आया !
Photo: UB India News Archive
लोकसभा चुनाव 2024 में जब भाजपा को 2019 की 303 सीटों के मुकाबले 240 ही मिलीं तो विपक्ष इस बात से उत्साहित था कि नरेंद्र मोदी का जलवा खत्म हो गया. कांग्रेस के पीएम फेस रहे राहुल गांधी तो इसी से गदगद थे कि 2 बार असफल रहने के बाद तीसरी बार उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनने लायक सीटें मिल गईं. विपक्षी नेताओं को इस बात का तनिक आभास नहीं था कि इसके बावजूद भाजपा उस मुकाम तक पहुंच जाएगी, जहां कभी वे हुआ करते थे. मुस्लिम वोटों के लिए आज के विपक्ष के तब भी कई रूप दिखे और आज भी उन्हें उन्हीं रूपों पर अधिक भरोसा है. सेकुलरिज्म के नाम पर मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति तब का सत्ताधारी और आज का विपक्ष करता रहा. यहां तक कि इसके चलते सत्ता से बेदखल होने के बावजूद विपक्ष में यह सामान्य समझ विकसित नहीं हो पाई कि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद अपवादों को छोड़ कर उसे लगातार भाजपा से मुंह की खानी पड़ रही है. हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार के चुनावों में विपक्षी गोलबंदी का एक ही मकसद रहा कि मुस्लिम वोट उसे मिल जाएं. वे यह समझ नहीं पाए कि बहुसंख्यक हिन्दुओं की राजनीति की आरंभ से अब तक पैरोकार रही भाजपा अपने इसी अटल सिद्धांत के कारण लगातार सफलता हासिल करती जा रही है. महाराष्ट्र में बीएमसी चुनाव और नगर निकायों के चुनाव में भाजपा को इस बार जैसी सफलता मिली है, उससे विपक्ष की आंखें खुल जानी चाहिए. इसलिए कि मुसलमानों ने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM पर तो भरोसा किया, लेकिन उनके लिए लगातार भाजपा पर हमलावर बने विपक्षी दलों को रत्ती भर भी भाव नहीं दिया.
पुरानी पार्टी का सिर्फ रुतबा बचा
कांग्रेस दुनिया की सबसे पुरानी पार्टी है. कांग्रेस ने हाल ही में अपनी स्थापना के 150 साल पूरे किए हैं. इसके बावजूद देश में सबसे खराब हाल में कांग्रेस पहुंच गई है. उसकी यह दुर्गति 1989 से शुरू हुई और अब भी बदस्तूर है. वर्ष 2014 में केंद्र की सत्ता गंवाने के बाद कांग्रेस के पतन का जो सिलसिला शुरू हुआ है, वह रुकने का नाम नहीं ले रहा. कभी केंद्र से लेकर राज्यों तक कांग्रेस की ही सरकार हुआ करती थीं. अब कर्नाटक और तेलंगाना को छोड़ कर कांग्रेस राज्यों की सत्ता से गायब है. तमिलनाडु और झारखंड को छोड़ दें तो कोई ऐसा राज्य नहीं दिखता, जहां गठबंधन सरकारों में भी उसकी भागीदारी हो. आखिर ऐसा क्यों हुआ कि देश भर में राजनीतिक परिदृश्य से कांग्रेस को लोगों ने किनारे कर दिया. कांग्रेस अगर इस बात पर ही ठीक ढंग से मंथन और चिंतन कर ले तो शायद वह स्थिति थोड़ी ठीक कर सकती है.
2014 से हारती रही हैं कांग्रेस
कांग्रेस 2014 से 2024 के बीच लगातार लोकसभा के 3 चुनाव हार चुकी है. कांग्रेस की न सिर्फ लोकसभा चुनावों में हार हुई, बल्कि उसकी सीटें भी 2 चुनावों में इस कदर घटीं कि वह नेता प्रतिपक्ष बनाने लायक नहीं बची. 2014 में तो कांग्रेस को अब तक की सबसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा. उसे लोकसभा में सिर्फ 44 सीटें आईं. 2019 में स्थिति थोड़ी सुधरी, लेकिन उसे 52 सीटों से ही संतोष करना पड़ा. विपक्षी गोलबंदी का लाभ उठाते हुए कांग्रेस ने 2024 में 99 सीटें जीतीं. तब जाकर विपक्षी इंडिया ब्लाक के पीएम फेस रहे राहुल गांधी को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा मिल पाया. राज्यों के चुनाव में भी कांग्रेस का प्रदर्शन बदतर रहा है. लगातार राज्यों में उसकी सत्ता समाप्त होती गई. पंजाब में आम आदमी पार्टी से कांग्रेस को मात खानी पड़ी. छत्तीसगढ़ की सत्ता भी कांग्रेस के हाथ से निकल गई. झारखंड और तमिलनाडु में कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन सरकार में है. पुडुचेरी में कांग्रेस ने सत्ता गंवाई. कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकारें जरूर हैं, लेकिन अगली बार सत्ता में वापसी उसके लिए आसान नहीं होगा, यह आशंका इसलिए कि लोकसभा चुनाव 2024 के बाद से कांग्रेस राज्यों में लगातार हारती रही है. कर्नाटक के राजनीतिक घमासान से इसके भीतर के अंतर्विरोध को भी समझा जा सकता है.
20 से अधिक चुनावों में हार हुई
वर्ष 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद राज्यों में अब तक जितने भी भी चुनाव हुए, कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है. अभी तक 20 से अधिक चुनाव 12 सालों के दौरान कांग्रेस हार चुकी है. कुछ राज्यों- हिमाचल प्रदेश कर्नाटक और तेलंगाना को छोड़ बाकी राज्यों में कांग्रेस अपने बूते सरकार बनाने में असफल रही है. झारखंड और तमिलनाडु में कांग्रेस सहयोगी की भूमिका में सरकार में शामिल है. तमिलनाडु में उसे अपने लीडिंग पार्टनर से खटपट भी जाहिर है. साल भर के अंदर हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार और झारखंड के विधानसभा चुनाव हुए हैं. सब में कांग्रेस की हालत खराब रही. झारखंड में जरूर क्षेत्रीय पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ कांग्रेस सरकार में शामिल है, लेकिन वहां की राजनीतिक परिस्थितियां ऐसी बनती दिख रही हैं, जिसमें कांग्रेस को सत्ता सुख से वंचित भी होना पड़ सकता है.
निकाय चुनावों में भी BJP भारी
सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि दलीय आधार पर होने वाले निकाय चुनावों में भी कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी है. महाराष्ट्र इसका उदाहरण है. बंगाल में तो कांग्रेस का सफाया ही हो चुका है. पंचायत या दूसरे चुनावों में कांग्रेस का कोई प्रतिनिधि नहीं दिखता. विधानसभा में कांग्रेस का कोई विधायक ही नहीं है. बंगाल के आसन्न असेंबली इलेक्शन में भी कांग्रेस की स्थिति शायद ही सुधर पाए. इसलिए कि न उसका संगठन मजबूत है और न कोई उसका नाम लेने को ही तैयार है. कांग्रेस के बंगाल प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ममता बनर्जी के विरोध में वही भाषा बोल रहे हैं, जो भाजपा के स्वर हैं. केंद्रीय नेतृत्व भी बंगाल चुनाव के प्रति गंभीर नहीं दिखता. पीएम मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष समेत बड़े नेताओं के लगातार दौरे हो रहे हैं. कांग्रेस में कोई सुगबुगाहट ही नहीं दिखती..
आगे भी कांग्रेस की राह कठिन
कांग्रेस की स्थिति अगर देश भर में ऐसी ही बनी रही तो आने वाला समय उसके लिए काफी कठिन दिखता है. बिहार में कांग्रेस ने आरजेडी के नेतृत्व वाले महागठबंधन में रह कर चुनाव लड़ा. महागठबंधन को 243 में सिर्फ 35 सीटों पर जीत मिली. उसमें कांग्रेस के सिर्फ 6 विधायक जीते. उनमें भी एका नहीं. पार्टी की बैठकों से निर्वाचित विधायक नदारद रहते हैं. अब तो बिहार में यह चर्चा आम है कि कांग्रेस के सभी विधायक पाला बदलने वाले हैं. वैसे भी बिहार में 2017 से ही कांग्रेस विधायकों के टूटने का इतिहास रहा है. इस बार भी कांग्रेस विधायक अगर टूट कर जेडीयू या भाजपा के साथ चले जाएं तो आश्चर्य नहीं. यह आशंका इसलिए कि विधायकों और कांग्रेस नेताओं के बीच खूब छीछालेदर होने लगी है.
गांधी फैमिली पर ही निर्भरता
कांग्रेस की इस दुर्गति की प्रमुख वजह पार्टी पर सोनिया-राहुल का दबदबा है. अब तो इसके खिलाफ कांग्रेस के भीतर आवाज भी उठने लगी है. हाल ही में महाराष्ट्र के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह और सांसद शशि थरूर ने कांग्रेस नेतृत्व की जिस तरह आलोचना की है, उससे यह बात साफ हो गई है कि कांग्रेस अगर नेतृत्व परिवर्तन नहीं करती है तो स्थिति और बिगड़ सकती है. ओड़िशा के एक पूर्व विधायक ने भी कांग्रेस नेतृत्व की खुल कर आलोचना की. इस पर विचार करने के बजाय कांग्रेस ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया. अब तो खुले रूप से कांग्रेस के भीतर राहुल गांधी के नेतृत्व पर भी सवाल उठने लगे हैं.
राहुल गांधी पर सारा दारोमदार
कांग्रेस लगातार 3 लोकसभा चुनावों में राहुल गांधी को पीएम फेस बना कर आजमा चुकी है. जनता ने तो उनके चेहरे को हर बार नकारा ही है, लेकिन अब पार्टी के भीतर से भी इस तरह का स्वर फूटने से साफ है कि राहुल गांधी से कांग्रेस का अब भला नहीं होने वाला है. ऐसी स्थिति में सिर्फ एक ही रास्ता बचता है कि कांग्रेस गांधी परिवार से किनारा कर ले या उसी परिवार से आने वाली प्रियंका गांधी को आजमाए. पर, राहुल ऐसा होने देंगे या कांग्रेसी इसके लिए खुल कर आवाज उठाएंगे, इसमें संदेह है. राहुल के नेतृत्व में जिस तरह कांग्रेस चुनाव हारती जा रही है, उससे हार का रिकार्ड ही बन रहा है. कांग्रेस में एक ही परिवार के दबदबे के कारण सलमान खुर्शीद जैसे नेताओं ने किनारा कर लिया. ममता बनर्जी ने तो काफी पहले कांग्रेस से अलग होकर अपनी अलग पार्टी बना ली थी. शरद पवार ने भी कांग्रेस छोड़ कर एनसीपी का गठन किया था. राहुल के रहते कांग्रेस में आगे भी ऐसा हो जाए तो आश्चर्य नहीं.
चुनाव के वक्त खुलती है नींद
कांग्रेस की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि उसके आला नेता सिर्फ चुनाव के वक्त ही एक्टिव नजर आते हैं. बाकी समय राहुल गांधी विदेश यात्राएं करते हैं या चुप बैठे रहते हैं. बिहार में करारी हार के बाद राहुल गांधी विदेश दौरे पर घूमते रहे हैं. हार की समीक्षा के बाद उसके अनुरूप रणनीति बनाने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं दिखती. इस साल बंगाल, असम समेत 5 राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं. भाजपा नेताओं ने दौरे शुरू कर दिए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बंगाल और असम के दौरे कर चुके. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के भी दोनों राज्यों के अलावा तमिलनाडु का दौरा कर गए. बंगाल को प्रतिष्ठा से जोड़ कर प्रधानमंत्री 17 जनवरी को फिर बंगाल पहुंचे हैं. दूसरी ओर राहुल गांधी विदेश दौरे का लुत्फ उठाने के बाद मध्य प्रदेश का दौरा कर रहे हैं. इससे ही अनुमान लगाया जा सकता है कि कांग्रेस चुनावों के प्रति कितनी गंभीर है. बाद में हार होते ही सिर्फ समीक्षा बैठकें कांग्रेस करेगी.
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