कर्नाटक में सांविधानिक टकराव बढ़ने की आशंका…………..

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने राज्यपाल थावरचंद गहलोत पर संविधान उल्लंघन का गंभीर आरोप लगाया है। सिद्धारमैया ने कहा कि राज्यपाल ने सरकार द्वारा तैयार पूरा भाषण नहीं पढ़ा, जो संविधान के खिलाफ है। बंगलूरू में मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्यपाल ने केंद्र सरकार के कठपुतली की तरह व्यवहार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्यपाल […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 22 जनवरी 2026, 08:00 AM 5 मिनट read
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कर्नाटक में सांविधानिक टकराव बढ़ने की आशंका…………..
Photo: UB India News Archive

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने राज्यपाल थावरचंद गहलोत  पर संविधान उल्लंघन का गंभीर आरोप लगाया है। सिद्धारमैया ने कहा कि राज्यपाल ने सरकार द्वारा तैयार पूरा भाषण नहीं पढ़ा, जो संविधान के खिलाफ है। बंगलूरू में मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्यपाल ने केंद्र सरकार के कठपुतली की तरह व्यवहार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्यपाल ने संविधान के अनुसार अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं किया है।

सीएम सिद्धारमैया ने कहा कि हम राज्यपाल के इस रवैये के खिलाफ विरोध करेंगे। सरकार इस बात की जांच करेगी कि क्या राज्यपाल के आचरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया जाए।

क्यों हुआ विवाद?

दरअसल राज्यपाल विधानसभा के संयुक्त सत्र को संबोधित करने पहुंचे तो लेकिन उन्होंने पूरा भाषण नहीं पढ़ा और सिर्फ दो लाइनें पढ़कर सदन से चले गए। इसके बाद विधायकों ने हंगामा कर दिया और नारेबाजी की। इससे पहले बुधवार को राज्यपाल ने विधानसभा के संयुक्त सत्र को संबोधित करने से इनकार कर दिया था। जिससे कर्नाटक में भी सरकार और राज्यपाल के बीच तनातनी की स्थिति बन गई थी, जो कि अभी कई गैर-भाजपा शासित राज्यों में दिखाई दे रही है।

राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच तनातनी का तीसरा मामला

राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच तनातनी का बीते दो दिनों में यह तीसरा मामला है। इससे पहले तमिलनाडु राज्यपाल आर एन रवि और तमिलनाडु सरकार के बीच भी संयुक्त सत्र के भाषण को लेकर विवाद हुआ। साथ ही केरल के राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच भी इसी मुद्दे पर मतभेद हुए।

राज्यपाल से मिलने पहुंचे एचके पाटिल

चूंकि यह साल 2026 का पहला सत्र है इसीलिए परम्परा के मुताबिक सरकार ने गवर्नर को संयुक्त अभिभाषण के लिए आमंत्रित किया था। संसदीय कार्य मंत्री एचके पाटिल ने कहा कि वे राज्यपाल से मुलाकात कर इस बारे में उनसे चर्चा करेंगे। इस बीच एचके पाटिल राज्यपाल से मुलाकात करने कर्नाटक लोक भवन पहुंचे हैं।

बता दें कि इससे पहले तमिलनाडु और केरल में भी ऐसा ही हुआ। यहां अभिभाषण की भाषा और संवैधानिक भूमिका को लेकर गंभीर विवाद हुए। अब कर्नाटक में भी वैसा ही देखने को मिला है। सूत्रों के मुताबिक राज्यपाल ने अपने अभिभाषण के मसौदे में बदलाव की मांग है। अभिभाषण का मसौदा राज्य सरकार द्वारा तैयार किया जाता है जिसे राज्यपाल विधानसभा के संयुक्त सत्र में पढ़ते हैं। हालांकि राज्यपाल थावर चंद गहलोत के इनकार के पीछे क्या ठोस वजह है इस पर कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

केरल में क्या हुआ?

बता दें कि केरल विधानसभा में मंगलवार को तब एक अभूतपूर्व स्थिति उत्पन्न हो गई, जब मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने सदन में राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर के संबोधन समाप्त करने के तुरंत बाद आरोप लगाया कि उन्होंने राज्य मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित नीतिगत भाषण को पूरी तरह नहीं पढ़ा। विजयन ने कहा कि छोड़े गए अंशों में भाजपा-शासित केंद्र सरकार की राजकोषीय नीति की आलोचना करने वाले हिस्से और राजभवन में लंबित विधेयकों से संबंधित संदर्भ शामिल थे। मुख्यमंत्री विजयन के अनुसार, राज्यपाल ने दस्तावेज के 12वें पैरा का शुरुआती हिस्सा और 15वें पैरा के अंतिम हिस्से को नहीं पढ़ा। उन्होंने कहा कि इसके अलावा, 157 पैरा और 72 पृष्ठों वाले नीतिगत भाषण के 16वें पैरा में राज्यपाल द्वारा एक पंक्ति जोड़ी गई।

विजयन ने सदन को बताया कि जिन अंशों को राज्यपाल ने नहीं पढ़ा, उनमें एक यह था— “इन सामाजिक और संस्थागत उपलब्धियों के बावजूद, केरल को केंद्र सरकार की एक के बाद एक प्रतिकूल कार्रवाइयों के कारण गंभीर राजकोषीय दबाव का सामना करना पड़ रहा है, जो राजकोषीय संघवाद के संवैधानिक सिद्धांतों को कमजोर करता है।” उनके अनुसार, राज्यपाल द्वारा नहीं पढ़े गए अन्य अंश यह था— “राज्य सदन द्वारा पारित विधेयक लंबे समय तक लंबित रहे हैं। इन मुद्दों पर मेरी सरकार ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया है, जिन्हें संविधान पीठ के पास भेजा गया है।” अर्लेकर द्वारा किए गए जोड़ के संदर्भ में, विजयन ने कहा कि राज्यपाल ने पैराग्राफ 16 के दूसरे हिस्से में “मेरी सरकार मानती है” जोड़ दिया, जो इस प्रकार है – “कर का बंटवारा और वित्त आयोग अनुदान राज्यों का संवैधानिक अधिकार है, यह कोई दान नहीं है। और इस जिम्मेदारी से जुड़े संवैधानिक निकायों पर किसी भी तरह का दबाव संघीय सिद्धांतों को कमजोर करता है।”

तमिलनाडु में क्या हुआ?

तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन.रवि ने मंगलवार को विधानसभा में द्रमुक सरकार द्वारा तैयार परंपरागत अभिभाषण पढ़ने से इसलिए ‘इनकार’ कर दिया, क्योंकि उसमें कई ‘अप्रमाणित दावे और भ्रामक बयान’ शामिल थे। लोकभवन ने यह दावा किया। राज्यपाल के सदन से बाहर निकलने के तुरंत बाद विधानसभा में मुख्यमंत्री एम.के.स्टालिन द्वारा पेश एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें कहा गया कि केवल सरकार द्वारा तैयार परंपरागत अभिभाषण ही आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज किया जाएगा। इसके कुछ ही देर बाद लोकभवन ने सदन के भीतर हुई घटनाओं को लेकर स्पष्टीकरण देते हुए एक बयान जारी किया। लोकभवन ने आरोप लगाया कि राष्ट्रगान का एक बार फिर “अपमान” किया गया। साथ ही, जनता को परेशान करने वाले कई अहम मुद्दों को पूरी तरह अनदेखा किया गया। राज्यपाल रवि परंपरागत अभिभाषण की शुरुआत में राष्ट्रगान बजाने की मांग कर रहे थे, जबकि राज्य सरकार का कहना है कि परंपरा के अनुसार शुरुआत में तमिल थाई वाज़्थु और अंत में राष्ट्रगान बजाया जाता है।

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