राजस्थान में विधेयक को कांग्रेस क्यों बता रही बांटने वाला?

राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की कैबिनेट ने एक बिल को मंजूरी दी, जिसका मकसद राज्य के कुछ इलाकों में डेमोग्राफिक इंबैलेंस, सांप्रदायिक तनाव, दंगे और अशांति जैसी समस्याओं को दूर करना है. इस बिल के तहत राज्य के कुछ इलाकों को अशांत घोषित किया जाएगा. विधेयक को डिस्टर्ब एरिया एक्ट नाम दिया गया है. […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 22 जनवरी 2026, 08:07 AM 5 मिनट read
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राजस्थान में विधेयक को कांग्रेस क्यों बता रही बांटने वाला?
Photo: UB India News Archive

राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की कैबिनेट ने एक बिल को मंजूरी दी, जिसका मकसद राज्य के कुछ इलाकों में डेमोग्राफिक इंबैलेंस, सांप्रदायिक तनाव, दंगे और अशांति जैसी समस्याओं को दूर करना है. इस बिल के तहत राज्य के कुछ इलाकों को अशांत घोषित किया जाएगा. विधेयक को डिस्टर्ब एरिया एक्ट नाम दिया गया है.

कैबिनेट मीटिंग के बाद कानून मंत्री जोगाराम पटेल ने कहा, हिंसा से प्रभावित इलाकों को अशांत क्षेत्र घोषित किया जा सकता है, जहां प्रॉपर्टी ट्रांसफर तब तक अमान्य होंगे जब तक कि जिला मजिस्ट्रेट जैसे सक्षम अधिकारी से मंजूरी न मिल जाए. उन्होंने कहा कि हमारे राज्य के कई क्षेत्रों में समुदाय विशेष की बढ़ती जनसंख्या, जनसंख्या असंतुलन, सांप्रदायिक तनाव, सार्वजनिक सद्भावना की कमी का प्रभाव काफी समय से देखा जा रहा है. कुछ खास इलाकों में दंगे, हिंसा और अशांति फैलाई जाती है और कई पुराने निवासियों को तो अपनी संपत्ति बहुत कम दामों पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है.

प्रॉपर्टी ट्रांसफर के लिए DM की मंजूरी जरूरी

जोगाराम पटेल ने कहा कि लोगों ने सरकार से बार-बार ऐसे हादसों, सांप्रदायिक तनाव और अशांति को कंट्रोल करने के लिए कानून लाने की अपील की. पटेल ने कहा कि यह विधेयक सरकार को कुछ इलाकों को डिस्टर्ब एरिया घोषित करने का अधिकार देता है. एक बार जब किसी इलाके को ऐसा घोषित कर दिया जाता है तो कोई भी प्रॉपर्टी ट्रांसफर अमान्य माना जाएगा और अगर कोई ट्रांसफर करना चाहता है तो वह सक्षम अथॉरिटी, आमतौर पर डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के जरिए किया जा सकता है.

इलाकों को तीन साल के लिए डिस्टर्ब एरिया घोषित किया जा सकता है. नियमों के अनुसार और कुछ शर्तों के तहत इसे बढ़ाया या घटाया जा सकता है. उल्लंघन के मामले में बिल में 3-5 साल की जेल का प्रस्ताव है और अपराध गैर-जमानती होंगे.

कांग्रेस ने बिल को बताया असंवैधानिक

कांग्रेस ने राजस्थान सरकार के इस बिल को असंवैधानिक बताया है और कहा कि ये कानून-व्यवस्था की चिंता के बजाय राजनीतिक एजेंडे से प्रेरित है. राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा, इस बिल का मकसद एक शांतिपूर्ण राज्य में डर पैदा करना है. उन्होंने आरोप लगाया, इस बिल की भाषा ही संवैधानिक नहीं है. यह राजनीतिक भाषा है जिसका मकसद जनता के मुद्दों और सरकार की नाकामियों से ध्यान भटकाना है. डोटासरा ने नए कानून की जरूरत पर सवाल उठाते हुए कहा कि BNS और BNSS के तहत मौजूदा कानूनी प्रावधान कानून-व्यवस्था की स्थितियों से निपटने के लिए काफी हैं.

गुजरात में कांग्रेस का था आइडिया

कांग्रेस भले ही इस बिल का विरोध कर रही है, लेकिन एक समय उसने भी ऐसा ही कानून गुजरात में लाया था. 1980 के दशक का समय गुजरात के लिए बहुत उथल-पुथल वाला था. जैसे-जैसे हिंदू-मुस्लिम दंगे बढ़े और नगर निगम चुनावों में बीजेपी मजबूत हुई, मोहल्लों में नई चिंताएं और डर फैल गए. खासकर अहमदाबाद में. 1986 में सांप्रदायिक तनाव चरम पर पहुंच गए, जिससे कुछ मोहल्लों से लोग पलायन करने लगे और घबराहट में प्रॉपर्टी बेची जाने लगी. इसी माहौल में मुख्यमंत्री अमरसिंह चौधरी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने 1986 में डिस्टर्ब्ड एरिया ऑर्डिनेंस पेश किया.

इस अध्यादेश में यह जरूरी किया गया था कि अशांत इलाके में हर बिक्री के लिए डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर गेटकीपर के तौर पर काम करेगा. वो यह पक्का करेगा कि लेन-देन मर्जी से, बिना किसी दबाव के और सही मार्केट वैल्यू पर हो.

सिर्फ 1.5 साल के लिए एक अस्थायी उपाय के तौर पर लाए गए इस अध्यादेश का रास्ता 1991 में बदल गया, जब इसे चिमनभाई पटेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में एक कानून के तौर पर लागू किया गया. इसका मकसद शुरू में सांप्रदायिक दंगों से होने वाली मजबूरी में बिक्री को रोकना था. लेकिन गुजरात में जहां धार्मिक ध्रुवीकरण बहुत गहरा है, यह राज्य के लिए समुदायों के बीच प्रॉपर्टी खरीदने-बेचने को रेगुलेट करने का एक जरिया बन गया. यह कानून अभी राज्य के तीन बड़े शहरों अहमदाबाद, वडोदरा और सूरत के बड़े हिस्सों में लागू है. यह भरूच, कपडवंज, गोधरा, आनंद और दूसरे छोटे कस्बों और शहरों पर भी लागू होता है.

  • 1986 में कांग्रेस की सरकार अहमदाबाद के लिए डिस्टर्ब एरिया एक्ट लेकर आई
  • 1991 में 1.5 साल की समय सीमा को खत्म किया गया और इसे पूरे गुजरात में लागू किय गया.
  • 2002 दंगे के बाद इस एक्ट का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हुआ.
  • 2019 में कानून में संशोधन किया गया, जिसके तहत डिस्टर्ब एरिया में किसी भी संपत्ति के लेनदेन में डिस्ट्रिक्ट क्लेक्टर की मंजूरी जरूरी हो गई. संशोधन में
  • ये भी कहा गया कि किसी भी क्षेत्र में अगर ध्रुवीकरण, जनसांख्यिकीय संतुलन हो रहा है, उसे डिस्टर्ब एरिया घोषित किया जाएगा.
  • 2021 में गुजरात हाई कोर्ट ने सरकार के फैसले पर रोक लगा दी.
  • अक्टूबर, 2023 में गुजरात सरकार ने हाई कोर्ट में कहा कि संशोधित प्रावधानों पर विचार कर रही है.
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