चार साल बाद पीठ पर खोंपा युद्ध का खंजर
1962 में सामने आई दोस्ताना तस्वीर की सच्चाई
दोस्ती का मुखौटा लगा चीन रचता रहा साजिश
- चीन ने पंचशील और ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ जैसे नारों का इस्तेमाल कर भारत को भरोसे में रखा, जबकि समानांतर रूप से अक्साई चिन में सड़क निर्माण और सैन्य तैनाती जारी रखी.
- 1954 के पंचशील समझौते के बावजूद चीन ने कभी भी भारत-चीन सीमा को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया, जिससे भविष्य के टकराव की जमीन पहले ही तैयार हो चुकी थी.
- भारत ने 1950 में तिब्बत पर चीन के नियंत्रण को मान्यता देकर सद्भावना दिखाई, लेकिन बदले में चीन ने भारतीय सुरक्षा चिंताओं को गंभीरता से नहीं लिया.
- 1958-59 के दौरान जब चीन अक्साई चिन में सड़क बनाने की कोशिश की. यह सडक भी भारत और चीन के बीच गहने तनाव की वजह बनी.
- 1959 में दलाई लामा को भारत में शरण देने के बाद चीन का रुख खुलकर आक्रामक हो गया और सीमा पर तनाव तेजी से बढ़ने लगा.
यहां है आपके जहन में उठ रहे सवालों के जवाब
रिपोर्ट्स के अनुसार, 1958 के गणतंत्र दिवस पर भारत के मुख्य अतिथि मार्शल ये जियानयिंग उस समय पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) में मार्शल के पद पर कार्यरत थे. आसान शब्दों में कहें तो वे चीन की सेना के सर्वोच्च रैंक के अधिकारियों में से एक थे. चीनी सैन्य ढांचे में ‘मार्शल’ का पद फील्ड मार्शल के समकक्ष माना जाता है और यह बहुत ही सीमित लोगों को दिया जाता है. इस लिहाज से मार्शल ये जियानयिंग चीन के शीर्ष सैन्य नेतृत्व का एक बेहद प्रभावशाली चेहरे थे.
1958 में चीन के एक शीर्ष सैन्य मार्शल को भारत के गणतंत्र दिवस का मुख्य अतिथि बनाना एक अहम राजनयिक फैसला था. उस समय भारत और चीन के रिश्ते काफी अच्छे माने जाते थे. दोनों ही देश एशिया के नए-नए स्वतंत्र राष्ट्र थे, जो लंबे समय तक उपनिवेशवाद में रहने के बाद अब दुनिया में अपनी अलग पहचान बना रहे थे. 1954 में भारत और चीन के बीच पंचशील समझौता हुआ था. इस समझौते में आपसी सम्मान, एक-दूसरे के मामलों में दखल न देना और शांतिपूर्ण तरीके से साथ रहने जैसे सिद्धांत शामिल थे. इन बातों से दोनों देशों के बीच भरोसा बढ़ा. ऐसे माहौल में चीन के इतने बड़े सैन्य नेता को आमंत्रित कर चीन को सिर्फ पड़ोसी देश नहीं, बल्कि भरोसेमंद दोस्त दिखाने कीा कोशिश की गई थी.
1958 में भारत–चीन दोस्ती की तस्वीर सामने से बेहत साफ-सुथरी दिखाई देती थी, लेकिन उसी दशक में सीमा विवाद के बीज अपनी काफी गहरी जड़ें बना चुकी थी. विवदा की इन जड़ों ने ऐतिहासिक, भौगोलिक और नक्शाई मतभेद शामिल थे. उस समय इन मुद्दों पर खुलकर सार्वजनिक चर्चा कम होती थी, लेकिन जमीन पर तनाव धीरे-धीरे बढ़ रहा था. तिब्बत, मैकमोहन रेखा और अक्साई चिन जैसे क्षेत्र इन विवादों के केंद्र में थे. बाहर से रिश्ते मधुर दिखते थे, लेकिन अंदर ही अंदर अविश्वास और असहमति बढ़ रही थी. यही कारण है कि बाद के वर्षों में ये छुपे हुए विवाद खुलकर सामने आए.
मैकमोहन रेखा लगभग 890 किलोमीटर लंबी वह सीमा रेखा है, जो भारत और तिब्बत के बीच तय की गई थी. इसे 1914 में शिमला सम्मेलन के दौरान ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव सर हेनरी मैकमोहन ने प्रस्तावित किया था. इस रेखा के तहत तवांग सहित पूर्वी हिमालय का बड़ा हिस्सा ब्रिटिश भारत के अधिकार क्षेत्र में आया. स्वतंत्रता के बाद भारत ने इसी रेखा को अपनी अंतरराष्ट्रीय सीमा माना. चीन ने कभी इस रेखा को स्वीकार नहीं किया. उसका तर्क था कि उस समय तिब्बत स्वतंत्र देश नहीं था, इसलिए उसे सीमा तय करने का अधिकार नहीं था. यही असहमति आगे चलकर गंभीर सीमा विवाद का कारण बनी.
1950 में चीन द्वारा तिब्बत पर पूर्ण नियंत्रण हासिल करने के बाद भारत–चीन संबंधों की पूरी भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति बदल गई. इससे पहले तिब्बत भारत और चीन के बीच एक बफर जोन की तरह काम करता था. उसके खत्म होते ही दोनों देश सीधे आमने-सामने आ गए. तिब्बत को लेकर भारत और चीन के बीच धीरे-धीरे तनाव बढ़ने लगा. तिब्बत के साथ भारत के पुराने धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंध भी इस स्थिति को और संवेदनशील बना रहे थे. यह बदलाव भारत–चीन रिश्तों में में अविश्वास की एक अहम वजह बना.
अक्साई चिन लद्दाख क्षेत्र का वह इलाका है, जिसे भारत जम्मू-कश्मीर का हिस्सा मानता है. चीन ने इस क्षेत्र को अपने शिनजियांग प्रांत से जोड़ते हुए वहां एक सड़क का निर्माण कर दिया. भारत को इस सड़क की जानकारी काफी बाद में मिली, जिसे उसने अपने क्षेत्र में अवैध निर्माण माना. इसके बाद दोनों देशों के नक्शों में अलग-अलग सीमाएं दिखाई देने लगीं. यही ‘नक्शा विवाद’ भारत–चीन तनाव का एक बड़ा कारण बना. अक्साई चिन का मुद्दा आगे चलकर दोनों देशों के बीच टकराव की अहम बन गया.
1950 के दशक के अंत में भारत ने सीमा क्षेत्रों में अपनी चौकियां स्थापित करनी शुरू कीं, जिसे ‘फॉरवर्ड पॉलिसी’ कहा गया. भारत का मानना था कि यह उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी कदम है. लेकिन चीन ने इसे आक्रामक नीति के रूप में देखा. इसी दौरान 1959 का तिब्बती विद्रोह हुआ और दलाई लामा को भारत में शरण दी गई. इससे चीन की नाराजगी काफी बढ़ गई. दोनों देशों के बीच संवाद की जगह शक ने ले ली, जिसने रिश्तों को और कमजोर कर दिया.








