NPR का नोटिफिकेशन जारी नहीं, फिर बजट में क्यों दिया गया 6000 करोड़ का फंड?

केंद्र सरकार के बजट 2026-27 ने एक बार फिर राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) को चर्चा के केंद्र में ला दिया है. भले ही अब तक NPR कराने को लेकर कोई औपचारिक अधिसूचना जारी नहीं की गई हो, लेकिन बजट में इसके लिए पर्याप्त धनराशि का प्रावधान किया गया है. इससे स्वाभाविक रूप से यह सवाल […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
सोमवार, 2 फरवरी 2026, 09:04 AM 6 मिनट read
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NPR का नोटिफिकेशन जारी नहीं, फिर बजट में क्यों दिया गया 6000 करोड़ का फंड?
Photo: UB India News Archive

केंद्र सरकार के बजट 2026-27 ने एक बार फिर राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) को चर्चा के केंद्र में ला दिया है. भले ही अब तक NPR कराने को लेकर कोई औपचारिक अधिसूचना जारी नहीं की गई हो, लेकिन बजट में इसके लिए पर्याप्त धनराशि का प्रावधान किया गया है. इससे स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठ रहा है कि क्या आने वाले समय में एनपीआर की प्रक्रिया शुरू हो सकती है और क्या यह आगे चलकर नागरिकता से जुड़े बड़े कदमों का आधार बनेगी.

इस साल के केंद्रीय बजट में Census, Survey and Statistics/Registrar General of India (RGI) के तहत लगभग 6,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं. बजट में साफ तौर पर कहा गया है कि इस राशि में भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त के कार्यालय, उनकी विभिन्न योजनाओं, एनपीआर और साल 2027 की जनगणना से जुड़े खर्च शामिल हैं. बजट की ये लाइन कई तरह की अटकलों को जन्म दे रही है, क्योंकि इसमें एनपीआर का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज है. हालांकि, सरकार का कहना है कि अभी एनपीआर कराने का कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है. गृह मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, यह बजटीय प्रावधान केवल एहतियात के तौर पर किया गया है, ताकि भविष्य में यदि सरकार एनपीआर कराने का निर्णय ले, तो धन की कमी आड़े न आए.

हाउस लिस्टिंग और एनपीआर का रिश्ता

आमतौर पर एनपीआर की गणना, जनगणना के पहले चरण यानी मकान की जनगणना के साथ की जाती है. इस साल मकान की जनगणना अप्रैल से सितंबर के बीच कराने की अधिसूचना जारी हो चुकी है, लेकिन उसमें एनपीआर का कोई जिक्र नहीं है. यही वजह है कि विशेषज्ञ मानते हैं कि फिलहाल सरकार ने जानबूझकर स्थिति को अस्पष्ट रखा है. बजट में पैसा देना एक प्रशासनिक तैयारी हो सकती है, जबकि राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए NPR पर अंतिम फैसला बाद में लिया जाए.

NPR क्यों रहा है विवादों में?

एनपीआर का नाम आते ही 2019-20 की घटनाएं लोगों के जेहन में ताजा हो जाती हैं. उस समय नागरिकता संशोधन कानून के पारित होने के बाद देशभर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे. एनपीआर को नागरिकों की सूची तैयार करने की दिशा में पहला कदम माना गया और आशंका जताई गई कि इसके बाद राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी NRC लागू किया जाएगा. विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों का तर्क था कि इससे खासकर अल्पसंख्यक समुदायों को नुकसान पहुंच सकता है.

इन विरोधों का असर यह हुआ कि कई राज्यों ने अपने विधानसभा में एनपीआर के खिलाफ प्रस्ताव पारित किए और केंद्र सरकार ने भी इस प्रक्रिया को ठंडे बस्ते में डाल दिया. उस समय कैबिनेट से एनपीआर के लिए हजारों करोड़ रुपये की मंजूरी मिल चुकी थी, लेकिन कोविड-19 महामारी और राजनीतिक दबाव के चलते यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी.

कानून में पहले से मौजूद है प्रावधान

एक अहम बात यह है कि एनपीआर कोई नई अवधारणा नहीं है. इसका कानूनी आधार पहले से मौजूद है. नागरिकता अधिनियम, 1955 और उसके तहत बने 2003 के नियमों में एनपीआर और एनआरसी दोनों का उल्लेख है. नियमों के अनुसार, केंद्र सरकार किसी भी समय यह तय कर सकती है कि जनसंख्या रजिस्टर तैयार किया जाए और उसके आधार पर नागरिकों की पुष्टि की जाए.

इन नियमों में यह भी कहा गया है कि यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता संदिग्ध पाई जाती है, तो उसे रिकॉर्ड में दर्ज कर आगे जांच की जा सकती है. यही प्रावधान सबसे ज्यादा चिंता का कारण रहा है, क्योंकि इससे लोगों को यह डर लगता है कि सामान्य जनगणना जैसी दिखने वाली प्रक्रिया आगे चलकर नागरिकता जांच का रूप ले सकती है.

Budget 2025

पहले भी हो चुका है डेटा संग्रह

यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि एनपीआर के लिए डेटा संग्रह पहले ही हो चुका है. साल 2010 में जनगणना के साथ पहली बार एनपीआर का डेटा इकट्ठा किया गया था. इसके बाद 2015 में घर-घर जाकर इस जानकारी को अपडेट किया गया. सरकार का कहना है कि उस समय जुटाया गया डेटा अब पूरी तरह डिजिटल रूप में सुरक्षित है और जरूरत पड़ने पर उसका उपयोग किया जा सकता है. लेकिन 2016 के बाद आधार को सरकारी योजनाओं का मुख्य आधार बना दिए जाने से एनपीआर की भूमिका कम होती चली गई. आधार के जरिए सब्सिडी, पेंशन और अन्य लाभों का वितरण आसान हो गया, जिससे एनपीआर को प्राथमिकता नहीं दी गई.

विरोध के बाद सरकार का बदला था रुख

2019 में एनपीआर को फिर से सक्रिय करने की कोशिशें ऐसे समय पर हुईं, जब देश पहले से ही नागरिकता के मुद्दे पर संवेदनशील माहौल से गुजर रहा था. असम में एनआरसी प्रक्रिया के दौरान लाखों लोगों के नाम सूची से बाहर रह जाने की खबरों ने लोगों की चिंता और बढ़ा दी. इसी कारण एनपीआर के खिलाफ व्यापक आंदोलन हुए. बाद में प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा कि सरकार ने अभी तक एनआरसी लागू करने का कोई फैसला नहीं किया है. गृह मंत्री और अन्य अधिकारियों ने भी इसी बात को दोहराया. इसके बाद एनपीआर को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया.

सरकार को किसी तरह की नहीं है कोई जल्दबाजी

अब बजट में फिर से एनपीआर का नाम आना यह संकेत देता है कि सरकार ने इसे अभी तक छोड़ा नहीं है. हालांकि, अधिसूचना का न होना और मंत्रालय का सतर्क बयान यह भी बताता है कि फिलहाल सरकार कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहती. आने वाले समय में यह मुद्दा राजनीतिक बहस का विषय बना रहेगा, खासकर तब जब जनगणना 2027 की तैयारियां तेज होंगी. कुल मिलाकर, एनपीआर आज भी एक ऐसा विषय है, जिसमें प्रशासनिक तैयारी, कानूनी प्रावधान और राजनीतिक संवेदनशीलता, तीनों आपस में उलझे हुए हैं. बजट ने इस बहस को फिर से जगा दिया है, लेकिन अंतिम फैसला अभी भी भविष्य के पन्नों में छिपा हुआ है.

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