8वीं के बच्चों के दिमाग में क्या डाल रहा NCERT?

नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) की क्लास 8 की सोशल साइंस की बुक चर्चा में है. किताब में बड़े बदलाव किए गए हैं. बुक में पहली बार ज्यूडिशियरी में करप्शन पर एक सेक्शन जोड़ा गया है. किताब का अपडेटेड एडिशन पहले के एडिशन से अलग है. पूर्व के एडिशन में मुख्य रूप […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
बुधवार, 25 फरवरी 2026, 07:40 AM 4 मिनट read
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8वीं के बच्चों के दिमाग में क्या डाल रहा NCERT?
Photo: UB India News Archive

नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) की क्लास 8 की सोशल साइंस की बुक चर्चा में है. किताब में बड़े बदलाव किए गए हैं. बुक में पहली बार ज्यूडिशियरी में करप्शन पर एक सेक्शन जोड़ा गया है. किताब का अपडेटेड एडिशन पहले के एडिशन से अलग है. पूर्व के एडिशन में मुख्य रूप से इस बात पर फोकस किया गया था कि कोर्ट कैसे काम करते हैं. ये अपडेट नई नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) और नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क फॉर स्कूल एजुकेशन (NCFSE) 2023 का हिस्सा हैं.

अपडेटेड एडिशन में एक चैप्टर का नाम है हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका, जिसमें सिस्टम की कमजोरियों और लंबित मामलों के बारे में बताया गया है. किताब में इस समस्या के बड़े पैमाने को साफ-साफ बताया गया है. इसमें अलग-अलग कोर्ट में लगभग 53,321,000 पेंडिंग केस बताए गए हैं. इनमें सुप्रीम कोर्ट में 81,000, पूरे भारत के हाई कोर्ट में 62.4 लाख (62,40,000) और डिस्ट्रिक्ट और सबऑर्डिनेट कोर्ट में लगभग 4.7 करोड़ (4,70,00,000) केस हैं.

बुक में हुए इस बदलाव पर सांसद कपिल सिब्बल ने भी चिंता जताई है. उन्होंने कहा कि NCERT 8वीं क्लास के बच्चों को भ्रष्ट ज्यूडिशियरी सिस्टम के बारे में बता रहा है.

करप्शन पर क्या लिखा?

करप्शन पर बात करते हुए टेक्स्टबुक में लिखा है कि जज कोड ऑफ कंडक्ट से बंधे होते हैं जो कोर्ट के अंदर और बाहर उनके बर्ताव को कंट्रोल करता है. इसमें बताया गया है कि ज्यूडिशियरी के सदस्यों के खिलाफ शिकायतें सेंट्रलाइज़्ड पब्लिक ग्रीवांस रिड्रेस एंड मॉनिटरिंग सिस्टम के जरिए फाइल की जा सकती हैं. किताब के मुताबिक, 2017 और 2021 के बीच इस सिस्टम के जरिए 1,600 से ज़्यादा शिकायतें मिलीं.

Book

इसमें गंभीर मामलों में जज को हटाने के लिए संवैधानिक प्रक्रिया के बारे में भी बताया गया है. चैप्टर में लिखा है, जिन मामलों में आरोप गंभीर होते हैं उनमें संसद कार्रवाई कर सकती है और महाभियोग का प्रस्ताव पास करके जज को हटा सकती है. ऐसे प्रस्ताव पर सही जांच के बाद ही विचार किया जाता है, जिसके दौरान जज को मामले में अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दिया जाता है.

चैप्टर में लोगों की सोच और चिंताओं का भी जिक्र है. चैप्टर में लिखा है, लोग ज्यूडिशियरी के अलग-अलग लेवल पर करप्शन का अनुभव करते हैं. गरीबों और ज़रूरतमंदों के लिए न्याय तक पहुंच आसान नहीं है.

चैप्टर में और क्या-क्या?

टेक्स्ट में यह भी कहा गया है कि राज्य और केंद्र सरकारें, टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके और गलत काम के साबित मामलों में तुरंत कार्रवाई करके ट्रांसपेरेंसी को बेहतर बनाने के लिए काम कर रही हैं. भारत के पूर्व चीफ जस्टिस बी आर गवई का जिक्र करते हुए, किताब में कहा गया है कि करप्शन और गलत काम लोगों के भरोसे को नुकसान पहुंचाते हैं. पूर्व CJI के अनुसार, भरोसा फिर से बनाना, इन मुद्दों को सुलझाने के लिए की गई तेज, निर्णायक और ट्रांसपेरेंट कार्रवाई में है.

पुरानी किताब में क्या था?

पुरानी किताब में सिर्फ ज्यूडिशियरी का रोल, इंडिपेंडेंट ज्यूडिशियरी क्या होती है, कोर्ट का स्ट्रक्चर और उन तक पहुंच के बारे में बताया गया था, लेकिन उसमें करप्शन का कोई जिक्र नहीं था. हालांकि उसमें एक पैराग्राफ था जिसमें कहा गया था कि एक मुद्दा जो आम आदमी की न्याय तक पहुंच को प्रभावित करता है, वह है कोर्ट को किसी केस की सुनवाई में लगने वाले साल. उसमें कहा गया था, कोर्ट को लगने वाले इस लंबे समय को बताने के लिए अक्सर जस्टिस डिले इज जस्टिस डिनाइड कहावत का इस्तेमाल किया जाता है.

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