‘पारिवारिक समस्या’ इन दो शब्दों की आड़ में छिपा है भारतीय समाज का स्याह चेहरा……………………

राजस्थान में दो बहनें। उत्तर प्रदेश में तीन। दिल्ली में एक युवा सॉफ्टवेयर पेशेवर। हर कहानी का अंत एक दर्दनाक आत्महत्या पर आकर थमता है। राज्य अलग हैं, हालात जुदा हैं, पर पुलिस रिकॉर्ड और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों में एक ही जुमला बार-बार गूंजता है-पारिवारिक विवाद या समस्याएं। भारत में युवा […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शनिवार, 7 मार्च 2026, 01:39 AM 6 मिनट read
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‘पारिवारिक समस्या’ इन दो शब्दों की आड़ में छिपा है भारतीय समाज का स्याह चेहरा……………………
Photo: UB India News Archive

राजस्थान में दो बहनें। उत्तर प्रदेश में तीन। दिल्ली में एक युवा सॉफ्टवेयर पेशेवर। हर कहानी का अंत एक दर्दनाक आत्महत्या पर आकर थमता है। राज्य अलग हैं, हालात जुदा हैं, पर पुलिस रिकॉर्ड और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों में एक ही जुमला बार-बार गूंजता है-पारिवारिक विवाद या समस्याएं। भारत में युवा महिलाओं की आत्महत्याओं पर हाल ही में छिड़ी बहस को महज अलग-थलग घटनाएं कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। एनसीआरबी के आंकड़े गंभीर हैं, और संवेदनशील चिंतन की मांग करते हैं।

एनसीआरबी की एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया (2022) रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में 1,64,000 से अधिक आत्महत्या की घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें से 28,000 से ज्यादा महिलाएं ‘गृहिणी’ थीं-यह एक ऐसा वर्ग है, जो हर साल महिला आत्महत्याओं में सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखता है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि आत्महत्या करने वाली महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा 18 से 30 वर्ष की युवतियों का है, जिनके आगे एक पूरी जिंदगी पड़ी होती है। इनमें से अधिकांश मामलों में आधिकारिक कारण ‘पारिवारिक समस्या’ बताया जाता है। इन दो शब्दों की आड़ में भारतीय समाज का वह स्याह चेहरा छिपा है, जो शहरी-ग्रामीण, अमीर-गरीब या शिक्षित-अशिक्षित के बीच कोई भेद नहीं करता। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि 18-29 वर्ष आयु वर्ग में आत्महत्या के मामले स्त्री-पुरुष, दोनों में सर्वाधिक हैं। यह आयु वर्ग सबसे संवेदनशील और जोखिमग्रस्त माना जा रहा है। महिलाओं के लिए उम्र का यह पड़ाव शादी के साथ ही सामाजिक बदलाव भी लाता है।

इस बदलाव में सिर्फ पहचान ही नहीं बदलती, बल्कि अक्सर जगह, कार्यबल में प्रवेश या निष्कासन, उच्च शिक्षा, शादी की बातचीत और बच्चे का जन्म भी शामिल होता है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस-5) बताते हैं कि कानूनी पाबंदियों के बावजूद कई राज्यों में बाल विवाह या कम उम्र में शादी की प्रथा अब भी प्रचलित है। और घरेलू हिंसा आज भी एक गंभीर वास्तविकता है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने भी इसे अवसाद और आत्महत्या के प्रमुख कारकों के रूप में पहचाना है। लाखों महिलाएं ऐसे नरक में जी रही हैं, जिसे उन्होंने खुद नहीं बनाया है और कई को मौत ही इससे निकलने का रास्ता नजर आता है।

हाल ही में, उत्तर प्रदेश का एक मामला राष्ट्रीय बहस का विषय तब बना, जब विवाह से जुड़ी पाबंदियों और सामाजिक दबाव के चलते तीन नाबालिग बहनों ने आत्महत्या कर ली। राजस्थान में भी दो महिला शिक्षिकाओं ने अपनी शादी से कुछ घंटे पहले जहर खाकर जान दे दी। वहीं दिल्ली में एक युवा पेशेवर पर अपनी पत्नी की हत्या का आरोप लगा, जहां विवाद की वजह सोशल मीडिया पोस्ट से शुरू हुई तकरार बताई गई। कानूनी तौर पर ये सभी मामले अलग-अलग हैं, पर सभी मामलों में एक ही दर्दनाक पहलू बार-बार सामने आता है : स्वायत्तता और सहमति को लेकर तनाव। महिलाओं को समाज द्वारा तय किए गए पैमाने के आधार पर आंका जाता है। उन पर बहुत ज्यादा दबाव होता है।

भारतीय कानून वैवाहिक क्रूरता को अपराध मानता है। घरेलू हिंसा के खिलाफ और उससे महिलाओं के संरक्षण के लिए देश में कानून हैं, पर जमीनी स्तर पर इनका क्रियान्वयन असमान है और सामाजिक कलंक के डर से अक्सर महिलाएं शिकायत नहीं करतीं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी रिश्तों के आपसी टकराव और हिंसा को वैश्विक स्तर पर आत्महत्या के जोखिम का एक प्रमुख कारण माना है। भारत में, जहां शादी अक्सर सिर्फ एक व्यक्तिगत फैसला नहीं, बल्कि पारिवारिक गठबंधन होती है, वहां जोखिम तो बढ़ते ही हैं और बदनामी भी कई गुना बढ़ जाती है। समाजशास्त्री लंबे समय से मानते आए हैं कि लड़कियों को बचपन से ही सामंजस्य बिठाकर चलना सिखाया जाता है। विवाह को एक अपरिहार्य सत्य माना जाता है, जिसमें उन्हें उनकी मांओं की तरह त्याग करना होगा। दुनिया बदल गई है, पर महिलाओं से वही पुरानी अपेक्षाएं की जाती हैं। जब एनसीआरबी के आंकड़ों  में ‘पारिवारिक समस्याएं’ लिखा जाता है, तो इसके भीतर वैवाहिक विवाद, दहेज उत्पीड़न, संतानहीनता का दबाव, पीढ़ियों के बीच टकराव और घरेलू आर्थिक तनाव जैसे अनेक कारण शामिल होते हैं। एनसीआरबी के 2022 के आंकड़ों के अनुसार, आत्महत्याओं के मामलों में ‘पारिवारिक समस्याएं’ सबसे बड़ा कारण रहीं, जो कुल मामलों के 30 फीसदी से अधिक के लिए जिम्मेदार थीं। महिलाओं के संदर्भ में यह अनुपात और भी अधिक भयावह है। द लैंसेट पब्लिक हेल्थ (2018) के अनुसार, वैश्विक आत्महत्या के मामलों में भारत की हिस्सेदारी लगभग एक-चौथाई है। युवा भारतीय महिलाओं में आत्महत्या की दर, उसी आयु वर्ग के वैश्विक औसत से कहीं अधिक है। सार्वजनिक चर्चाओं में अक्सर छात्र आत्महत्याओं या किसान आत्महत्याओं को प्रमुखता दी जाती है, पर विवाहित युवतियों, खासकर गृहिणियों, को उतनी तवज्जो नहीं मिल पाती है। कॅरिअर और नौकरी के दबाव पर खुलकर बात होती है, परंतु यौन शोषण या जबरन विवाह पर सार्वजनिक चर्चा नहीं होती। यही कारण है कि यह मौन संकट भीतर ही भीतर फैलता रहता है। हालांकि, धीरे-धीरे परिवर्तन के संकेत भी दिखाई दे रहे हैं।

इसे ‘परंपरा बनाम आधुनिकता’ का संघर्ष बताना आसान है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक गहरी और जटिल है। भारत में पारिवारिक संरचनाएं विविधतापूर्ण हैं। असली समस्या ‘परंपरा’ नहीं है, बल्कि परंपरा के भीतर किसी विकल्प का न होना है। यह भी समझना आवश्यक है कि आत्महत्या के पीछे कोई एक इकलौता कारण नहीं होता। शोध बताते हैं कि आत्मघाती व्यवहार अक्सर अनेक तनावों के लगातार बढ़ते बोझ का परिणाम होता है, जो एक बिंदु पर व्यक्ति की सहनशीलता को तोड़ देता है। फिर भी जब आधिकारिक आंकड़े लगातार ‘पारिवारिक समस्याओं’ को एक प्रमुख कारण बताते हैं, तो इस पर गहरी जांच-पड़ताल होनी चाहिए। यह चर्चा शुरू करने में पहले ही बहुत देर हो चुकी है।
अब यह समझने की जरूरत है कि समाज वैवाहिक संबंधों के भीतर पैदा हो रही दरारों का समाधान कैसे खोजे। यदि हमें विवाह संस्था और परिवार की गरिमा को सुरक्षित रखना है, तो उन व्यक्तियों की जरूरतों और अधिकारों को स्वीकार करना होगा, जो इन संबंधों का निर्माण करते हैं। और सबसे महत्वपूर्ण बात-जीवन बचाने के लिए हमें ‘पारिवारिक समस्याओं’ को कई मामलों में से एक प्रमुख कारक के रूप में पहचानना होगा।

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