अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस :असंगठित क्षेत्र, उनके लिए क्या है महिला दिवस?

हर वर्ष 8 मार्च को जब दुनिया की ऊंची अट्टालिकाओं और कॉरपोरेट दफ्तरों में महिला सशक्तीकरण के नारे गूंज रहे होते हैं, तब भारत के करोड़ों खेतों, निर्माण स्थलों और तंग गलियों में एक अलग ही वास्तविकता सांस ले रही होती है। यह वास्तविकता है उस असंगठित क्षेत्र की, जहाँ देश की श्रम शक्ति का […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
रविवार, 8 मार्च 2026, 10:34 AM 7 मिनट read
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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस :असंगठित क्षेत्र, उनके लिए क्या है महिला दिवस?
Photo: UB India News Archive

हर वर्ष 8 मार्च को जब दुनिया की ऊंची अट्टालिकाओं और कॉरपोरेट दफ्तरों में महिला सशक्तीकरण के नारे गूंज रहे होते हैं, तब भारत के करोड़ों खेतों, निर्माण स्थलों और तंग गलियों में एक अलग ही वास्तविकता सांस ले रही होती है। यह वास्तविकता है उस असंगठित क्षेत्र की, जहाँ देश की श्रम शक्ति का एक विशाल हिस्सा बिना किसी शोर के अपनी नियति से लड़ रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का वास्तविक अर्थ तब तक अधूरा है, जब तक हम उस महिला के संघर्ष को केंद्र में न लाएं, जो आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ तो है, लेकिन सामाजिक और कानूनी सुरक्षा के मानचित्र पर आज भी एक धुंधला बिंदु मात्र बनी हुई है।

8 मार्च को ही क्यों मनाया जाता है अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस?

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की जड़ें बीसवीं सदी की शुरुआत में उत्तरी अमेरिका और यूरोप के श्रमिक आंदोलनों से जुड़ी हैं। इसे 1977 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा आधिकारिक मान्यता प्रदान की गई।

8 मार्च की यह तारीख विशेष रूप से वर्ष 1917 से संबंधित है, जब रूस की महिलाओं ने ‘रोटी और शांति’ की मांग को लेकर ऐतिहासिक हड़ताल शुरू की थी। यह आंदोलन तत्कालीन जूलियन कैलेंडर के अनुसार 23 फरवरी को शुरू हुआ था, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित ग्रेगोरियन कैलेंडर के हिसाब से 8 मार्च बैठता है।

यह दिन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में महिलाओं की उपलब्धियों को सम्मान देने का अवसर है। साथ ही, यह एक ऐसे वैश्विक मंच के रूप में कार्य करता है, जहाँ से महिला अधिकारों और उनकी समान भागीदारी के लिए दुनिया भर के समर्थन को और अधिक सशक्त बनाया जाता है।

विविधता में समाहित पीड़ा

असंगठित क्षेत्र की महिला कामगारों का संसार अत्यंत व्यापक और जटिल है। ग्रामीण अंचलों में ये महिलाएं खेतिहर मजदूर के रूप में सूर्योदय से पूर्व ही मिट्टी से जुड़ जाती हैं, जहाँ न तो उनके पास भूमि का स्वामित्व है और न ही किसान के रूप में कोई औपचारिक पहचान।

शहरों की ओर रुख करें, तो निर्माण स्थलों पर ईंटें ढोती महिलाएं और घरों में झाड़ू-पोछा करती घरेलू सहायिकाएं एक ऐसे श्रम चक्र का हिस्सा हैं, जहाँ काम के घंटों की कोई सीमा नहीं है। इसके अतिरिक्त, घरों के भीतर बैठकर सूक्ष्म स्तर पर पैकेजिंग, सिलाई या बीड़ी बनाने का कार्य करने वाली गृह-आधारित श्रमिक महिलाएं भी हैं, जो आर्थिक गणनाओं में अक्सर ‘बेरोजगार’ या ‘गृहिणी’ मान ली जाती हैं।

रेहड़ी-पटरी पर सब्जी बेचने वाली या शहरों की गंदगी साफ करने वाली कचरा बीनने वाली महिलाएं इस श्रेणी का वह हिस्सा हैं, जो हर दिन प्रशासन की सख्ती और सामाजिक उपेक्षा के बीच अपनी आजीविका सुरक्षित करती हैं।

दहलीज के भीतर का दोहरा मापदंड

महिला दिवस की सार्थकता पर सबसे गंभीर प्रश्न तब खड़ा होता है, जब सशक्तीकरण की बात करने वाली शिक्षित और जागरूक महिलाओं के अपने घरों में ही काम करने वाली ‘दूसरी महिला’ के अधिकारों का गला घोंटा जाता है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि जो महिलाएं दफ्तरों में अपने हक और वेतन वृद्धि के लिए संघर्ष करती हैं, वे अक्सर अपने घर की सहायिका को एक साप्ताहिक अवकाश देने या सम्मानजनक पारिश्रमिक देने में संकोच करती हैं।

यहां जेंडर (लिंग) से ऊपर ‘वर्ग’ हावी हो जाता है, जहां एक महिला दूसरी महिला की शारीरिक व्याधि और घरेलू विवशताओं को समझकर भी उसे अनदेखा कर देती है। पुराने कपड़ों या बचे हुए भोजन को ‘मदद’ का नाम देना न्याय नहीं है; न्याय तो उसे एक श्रमिक के रूप में गरिमा, निश्चित कार्य घंटे और सामाजिक सुरक्षा देना है।

जब तक घर की दहलीज के भीतर काम करने वाली महिला को समानता का अनुभव नहीं होता, तब तक बाहर मनाए जाने वाले तमाम जश्न केवल एक खोखला पाखंड मात्र रहेंगे, क्योंकि न्याय की पहली सीढ़ी घर की चौखट से ही शुरू होती है।

संवैधानिक वादे और ज़मीनी फासले

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है और अनुच्छेद 21 गरिमापूर्ण जीवन का आश्वासन, लेकिन असंगठित क्षेत्र में ये मौलिक अधिकार अक्सर कागजी औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। लैंगिक आधार पर मजदूरी का भेदभाव यहाँ की सबसे कड़वी सच्चाई है। समान कार्य के बावजूद महिला श्रमिकों को पुरुष सहयोगियों की तुलना में कम पारिश्रमिक दिया जाना उनके मौलिक अधिकारों का सीधा हनन है।

कार्यस्थल पर सुरक्षा और यौन उत्पीड़न से बचाव के कानून (POSH Act) बड़े संस्थानों में तो प्रभावी दिखते हैं, लेकिन एक दिहाड़ी मजदूर या घरेलू सहायिका के लिए न्याय की यह प्रक्रिया अत्यंत दुर्गम और अपरिचित है। उनके लिए गरिमापूर्ण जीवन का अर्थ केवल रोटी का जुगाड़ करना बनकर रह गया है, जिसमें स्वास्थ्य और विश्राम जैसे मानवाधिकार कहीं पीछे छूट गए हैं।

दोहरी मार: पितृसत्ता और आर्थिक वंचना

असंगठित क्षेत्र की महिलाओं के संघर्ष को केवल आर्थिक दृष्टिकोण से नहीं समझा जा सकता। वे ‘दोहरे बोझ’ की शिकार हैं, जहाँ बाहर का कठोर शारीरिक श्रम खत्म होते ही घर के भीतर का अनपेड केयर वर्क (बिना वेतन का घरेलू काम) शुरू हो जाता है।

पितृसत्तात्मक समाज में उनके श्रम को ‘प्रेम और समर्पण’ की चादर ओढ़ाकर उसे आर्थिक मूल्य से वंचित कर दिया जाता है। वंचित वर्ग की महिलाओं के लिए यह चुनौती और भी विकराल है, जहाँ जाति, वर्ग और लिंग की परतें मिलकर उनके शोषण का एक अभेद्य चक्रव्यूह तैयार करती हैं।

मातृत्व के दौरान मिलने वाली सुरक्षा या अवकाश इनके लिए एक विलासिता है, जिसके कारण प्रसव के कुछ दिनों बाद ही इन्हें पुनः कार्य पर लौटना पड़ता है, जो उनके और उनके शिशुओं के स्वास्थ्य के साथ एक बड़ा मानवाधिकार समझौता है।

परिवर्तन की दिशा: न्याय की नई परिभाषा

सच्चा सशक्तीकरण केवल प्रतीकात्मक उत्सवों से नहीं, बल्कि नीतिगत बदलावों से आएगा। असंगठित क्षेत्र की इन करोड़ों महिलाओं को ‘अदृश्य’ से ‘दृश्य’ बनाने की आवश्यकता है।

ई-श्रम पोर्टल जैसे डिजिटल प्रयास सराहनीय हैं, परंतु डिजिटल साक्षरता के अभाव में इनका लाभ अंतिम पायदान तक नहीं पहुँच पा रहा है। हमें एक ऐसी समावेशी व्यवस्था की आवश्यकता है, जहाँ घरेलू कामगारों को औपचारिक श्रमिक का दर्जा मिले, खेतिहर महिलाओं को किसान के रूप में पहचान मिले और हर निर्माण स्थल पर शिशुगृह व स्वास्थ्य सुविधाएं अनिवार्य हों।

न्यूनतम मजदूरी का कड़ाई से पालन और सामाजिक सुरक्षा जाल का विस्तार ही वह मार्ग है, जो इन महिलाओं को उनके मौलिक अधिकारों का वास्तविक उपभोग करने का अवसर देगा।

एक साझा भविष्य का संकल्प

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस केवल सफलताओं के जश्न का दिन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर है। समाज की प्रगति का पैमाना उन महिलाओं की स्थिति से तय होना चाहिए जो सबसे कठिन परिस्थितियों में देश के निर्माण में जुटी हैं।

जब तक समाज के अंतिम छोर पर खड़ी महिला को अपने श्रम का उचित सम्मान, सुरक्षा और समान अवसर नहीं मिलता, तब तक समानता के हमारे दावे खोखले रहेंगे। इस वर्ष का संकल्प केवल ‘बधाइयों’ तक सीमित न रहे, बल्कि उन खामोश आवाजों को सुनने और उनके अधिकारों की रक्षा करने की दिशा में एक ठोस कदम साबित हो।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

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