पश्चिम एशियाई संघर्ष और प्रवासी भारतीय……………….

पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध, जो 28 फरवरी, 2026 को ईरान पर अमेरिकी व इस्राइली हमलों से शुरू हुआ, जिसका नतीजा ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामनेई की हत्या और खाड़ी में ईरान की मिसाइल तथा ड्रोन हमलों के रूप में सामने आया, ने अचानक लगभग एक करोड़ भारतीय प्रवासियों के लिए संकट पैदा […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
मंगलवार, 10 मार्च 2026, 09:13 AM 6 मिनट read
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पश्चिम एशियाई संघर्ष और प्रवासी भारतीय……………….
Photo: UB India News Archive

पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध, जो 28 फरवरी, 2026 को ईरान पर अमेरिकी व इस्राइली हमलों से शुरू हुआ, जिसका नतीजा ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामनेई की हत्या और खाड़ी में ईरान की मिसाइल तथा ड्रोन हमलों के रूप में सामने आया, ने अचानक लगभग एक करोड़ भारतीय प्रवासियों के लिए संकट पैदा कर दिया है। पीढ़ियों से, खाड़ी देश प्रवासी भारतीयों के लिए बेरोजगारी से बचने और परिवार की खुशहाली का एक मजबूत सहारा रहे हैं। लेकिन इस युद्ध से खाड़ी देशों की सुरक्षा, स्थिरता और स्थायित्व का वह भ्रम टूट गया है।

इस अनिश्चितता के बीच भी भारतीय प्रवासियों का हौसला और इरादा मजबूत दिखता है। जैसा कि उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के शिपिंग व्यवसाय के मालिक और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में दो दशक से रह रहे जाने-माने सामुदायिक नेता महेश सिंह ने मुझे अजमान से व्हाट्सएप पर बताया, ‘हम सब सुरक्षित और ठीक हैं। यूएई सरकार और भारतीय वाणिज्य दूतावास हरेक भारतीय का ध्यान रख रहे हैं।’ चूंकि, उनका परिवार वहीं रहता है, इसलिए वह यूएई को अपना घर मानते हैं और कहते हैं कि यह मेरा घर है। मेरा वापस आने का कोई इरादा नहीं है। डरने की कोई बात नहीं है। हमें भारत व यूएई सरकारों पर भरोसा रखने की जरूरत है। आपूर्ति स्थिर है, और ताजा खाना आसानी से मिल जाता है। उनका नजरिया खाड़ी देशों में भारतीयों की जिंदगी को बारीकी से देखने का मौका देता है और यह भारतीय मीडिया के दुबई तथा अबू धाबी पर केंद्रित खबरों से अलग है।

पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के दौरान, भारतीय मीडिया का ध्यान मुख्य रूप से यूएई के चमकदार शहरों में अपने प्रवासियों पर रहा है। ये शहर ईरान के कुछ सबसे तीव्र हमलों का सामना कर चुके हैं। संघर्ष के शुरुआती चरण में सैकड़ों मिसाइलों व ड्रोन से हमले किए गए, जिनमें कई बार आवासीय और व्यावसायिक इलाकों जैसे प्रमुख नागरिक इलाकों या उनके आसपास के क्षेत्रों को निशाना बनाया गया। भारतीय प्रवासी यूएई के सभी सात अमीरातों (अबू धाबी, दुबई, शारजाह, अजमान, उम अल कुवैन, रास अल खैमाह और फुजैराह) में फैले हुए हैं, न कि केवल बड़े शहरों में। खाड़ी के अन्य देशों, जैसे सऊदी अरब, कतर, बहरीन और कुवैत में सैन्य ठिकानों को भी बड़े पैमाने पर निशाना बनाया गया। सऊदी रक्षा व्यवस्था ने कई जगहों पर हमलों को रोका, जिससे बड़े खतरे के बावजूद उन पर कम ध्यान गया।

शुरुआती ‘ऑयल बूम’ (तेल से आई समृद्धि) के दौरान केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिणी राज्यों के लोग वहां जाते थे, पर अब उत्तर भारत से अधिक लोग जाते हैं। करीब 2011-2012 से, उत्तर प्रदेश खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के देशों में कामगारों को भेजने वाला एक बड़ा राज्य बन गया है, जिसके ठीक बाद बिहार का नंबर आता है। प्रवासन के आंकड़ों और अध्ययनों के अनुसार, बिहार के साथ-साथ गोरखपुर, आजमगढ़, गाजीपुर, देवरिया, कुशीनगर जैसे पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिलों से भी लोगों का आना-जाना लगा हुआ है।

वर्ष 2024 में प्रकाशित राजेश कुमार और अजयियु नियामाई का एक शोध पत्र द ईस्टर्न एंथ्रोपोलॉजिस्ट इस बदलाव पर रोशनी डालता है- ‘ऑयल बूम’ की शुरुआत में, केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिण भारतीय राज्य सबसे ज्यादा प्रवासी भेजने वाले राज्य थे, पर बाद में, उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे उत्तर भारतीय राज्यों से प्रवासन तेजी से बढ़ा। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से आने वाले नए लोग अक्सर निम्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आते हैं, और ज्यादा देर तक काम करने की इच्छा दिखाते हैं और उनकी अनुपस्थिति भी कम होती है। वे निर्माण, राजमिस्त्री और कठिन श्रम के क्षेत्र में वर्चस्व बनाए हुए हैं, विशेष रूप से उत्तरी अमीरात में, जहां जीवनयापन की लागत कम होने से मामूली वेतन में भी गुजारा चल जाता है। भारत ने हाल ही में 135 अरब डॉलर से अधिक व्यक्तिगत रेमिटेंस दर्ज किया है, जिससे दुनिया में सबसे ज्यादा पैसे पाने वाले देश के तौर पर उसकी स्थिति और मजबूत हुई है। जीसीसी के देश (बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और यूएई) इस कुल रकम का लगभग 35-40 फीसदी, या हर साल लगभग 50 अरब डॉलर भेजते हैं। इसमें अकेले यूएई का हिस्सा लगभग 19 प्रतिशत (25 अरब डॉलर से अधिक) है। यह पैसा उत्तर प्रदेश, बिहार, केरल और अन्य राज्यों के परिवारों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करके शिक्षा, आवासीय ऋण, कर्ज चुकाने और रोजमर्रा के खर्चों की जरूरतों को पूरा करता है।

यदि यह संघर्ष लंबे समय तक चला, तो रोजगार पर असर पड़ सकता है, जिससे बड़े पैमाने पर लोग लौट सकते हैं, तेल पर निर्भर अर्थव्यवस्थाएं कमजोर पड़ सकती हैं, जिससे खाड़ी देशों से भेजे जाने वाले पैसे में कमी आ सकती है और तेल की कीमतों में वृद्धि से भारत पर राजकोषीय दबाव बढ़ सकता है। यूएई, जो विदेश में भारतीय समुदाय का सबसे बड़ा (लगभग 40 लाख) घर है, पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। ऐसे में, कामगारों को कौशल विकास, बचत और स्थानीय आय के स्रोत के जरिये दूसरे विकल्प खोजने होंगे, ताकि प्रवासन अब एकमात्र जीवनरेखा न रहे। यूएई और सऊदी अरब जैसे देशों ने चेतावनी, बुनियादी ढांचे की सक्रियता और लोगों की मदद से तेजी से काम किया है। फिर भी, सुरक्षित जगहों पर रह रहे पेशेवरों या जमे-जमाए व्यवसायियों की तुलना में, खुले क्षेत्र (कंस्ट्रक्शन, पोर्ट लॉजिस्टिक्स) में काम करने वाले मजदूरों को ज्यादा खतरा होता है। कम्युनिटी नेटवर्क जरूरी है। केरल और तेलंगाना जैसे राज्य प्रवासियों के लिए समर्पित हेल्पडेस्क चलाते हैं। केरल तथा आंध्र प्रदेश में भी विदेश में रहने वाले प्रवासियों के लिए समर्पित एजेंसियां हैं। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिला प्रशासन ने भी पश्चिम एशिया में फंसे प्रवासियों के परिवारों के लिए एहतियाती हेल्पलाइन जारी की है।

विदेश मंत्रालय का नियंत्रण कक्ष चौबीसों घंटे काम करता है। सामुदायिक समूहों के माध्यम से मजबूत संबंध बनाकर नियोक्ता या दूतावास पंजीकरण के जरिये संकट के समय तेजी से मदद करते हैं। कई भारतीयों के लिए खाड़ी के देश परिवार का सहारा, कर्ज से राहत और दीर्घकालीन सुरक्षा के लिए उपयुक्त विकल्प हंै। शायद इसी कारण महेश सिंह जैसे व्यवसायी समेत ज्यादातर भारतीय प्रवासी वहीं रहना पसंद करते हैं। वहां से लोगों को बाहर निकालना आखिरी रास्ता है, समाधान नहीं। भारत को उन जगहों पर सुरक्षा की मजबूती को प्राथमिकता देनी चाहिए, जहां भारतीय प्रवासी रहते और काम करते हैं।

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