यूसीसी के पक्ष में, समान नागरिक संहिता की जरूरत पर अदालत का जोर………

सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम महिलाओं के उत्तराधिकार संबंधी अधिकारों से जुड़े एक मामले में सुनवाई के दौरान एक बार फिर समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की आवश्यकता पर जोरदार तरीके से बल दिया है। दरअसल, शीर्ष न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 की कुछ […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 12 मार्च 2026, 06:49 AM 3 मिनट read
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यूसीसी के पक्ष में, समान नागरिक संहिता की जरूरत पर अदालत का जोर………
Photo: UB India News Archive

सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम महिलाओं के उत्तराधिकार संबंधी अधिकारों से जुड़े एक मामले में सुनवाई के दौरान एक बार फिर समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की आवश्यकता पर जोरदार तरीके से बल दिया है। दरअसल, शीर्ष न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 की कुछ धाराओं को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान कहा कि पर्सनल लॉ में व्याप्त विषमताओं और भेदभाव का सबसे प्रभावी समाधान यूसीसी ही है।

उल्लेखनीय है कि देश में यूसीसी का प्रश्न लंबे समय से राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी बहस का विषय रहा है। ऐसे में, शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी, कि शायद अब वह समय आ गया है, जब देश में समान नागरिक संहिता पर गंभीरता से विचार किया जाए, महज एक कानूनी अवलोकन नहीं, बल्कि उस लंबे विमर्श का नया अध्याय है, जो दशकों से चला आ रहा है। गौरतलब है कि संविधान के अनुच्छेद-44 में राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों के तहत स्पष्ट कहा गया है कि राज्य पूरे देश में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करेगा। यह प्रावधान संविधान निर्माताओं की दूरदर्शिता का परिणाम है, जिन्होंने महसूस किया कि धार्मिक आधार पर अलग-अलग कानून राष्ट्रीय एकता और लैंगिक समानता के मार्ग में बाधा बन सकते हैं।

पिछले कई दशकों में सर्वोच्च न्यायालय ने शाहबानो मामले (1985), सरला मुद्गल (1995) और 2017 के तीन तलाक मामले (शायरा बानो) में यूसीसी की वकालत की है, लेकिन अब उसके रुख से यूसीसी के समर्थन वाला पक्ष और मजबूत ही हुआ है। दरअसल, यूसीसी के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क महिलाओं के अधिकार का ही है। शरिया कानून में उत्तराधिकार, बहुविवाह इत्यादि मुद्दे लैंगिक असमानता को बढ़ावा देते हैं, जबकि यूसीसी इन आधारों पर होने वाली सभी किस्म की असमानताओं को खत्म कर एकसमान, निष्पक्ष और सांविधानिक मूल्यों पर आधारित ढांचा प्रदान कर सकता है। कुछ समुदाय इसे संविधान के अनुच्छेद-25 द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर हमला मानते हैं, जिस पर शीर्ष अदालत पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि यूसीसी का उद्देश्य धार्मिक प्रथाओं को खत्म करना नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों में समानता लाना है।

अदालत का यह कहना भी तर्कपूर्ण है कि शरिया कानून को एकदम से खत्म करने से एक अनावश्यक शून्य पैदा हो सकता है, इसलिए बेहतर है कि विधायिका ही इस दिशा में धीरे-धीरे कदम बढ़ाए, जैसा उत्तराखंड में किया गया, जो यूसीसी लागू करने वाला देश का पहला राज्य है। लिहाजा, अदालत का रुख संसद के लिए स्पष्ट संदेश है, जिस पर गंभीरतापूर्वक विचार होना ही चाहिए।

 

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