ऐसा नहीं कि शीर्ष अदालत की ओर से निर्धारित उद्योग की परिभाषा ही आज तक चल रही है. इसमें पहले भी बदलाव किए गए हैं. साल 991 की उदारीकरण नीति के बाद भारत की आर्थिक तस्वीर बदलने लगी, तो इस व्याख्या की व्यापकता पर सवाल उठने लगे. लिहाजा साल 2002 में Bangalore Water Supply के फैसले को State of UP बनाम जय बीर सिंह मामले में चुनौती दी गई. मई 2005 में फिर शीर्ष अदालत की 5 जजों की संविधान पीठ ने इस याचिका को बड़ी बेंच के पास भेज दिया. इसके बाद जनवरी 2017 में इस संदर्भ को उठाया गया, जहां 7 जजों की बेंच ने इसे 9 जजों की बेंच के पास भेजने का निर्देश दिया.
उद्योग की परिभाषा को लेकर सवालों का हल अभी तक नहीं निकला और फरवरी 2026 में, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस मामले को अंतिम बहस के लिए सूचीबद्ध किया. 17 मार्च से मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, पी.एस. नरसिम्हा, दीपांकर दत्ता, उज्जल भुइयां, एस.सी. शर्मा, जॉयमल्या बागची, आलोक अराधे और विपुल एम. पंचोली की 9 जजों की बेंच दो दिन तक इस मामले की सुनवाई कर रही है. आज यानी 18 मार्च को इस सुनवाई का आखिरी दिन था. हालांकि, अभी तक परिभाषा को लेकर कोई स्पष्टता सामने नहीं आई है.
इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट (IDA) का मकसद कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करना है. साथ ही उत्पादन और उत्पादकता में बाधा न आए, इसका भी ध्यान रखना है. यह कानून वेतन, काम के घंटे, विवादों के निपटारे, यूनियन बनाने या हड़ताल करने के परिणाम और नौकरी से निकाले जाने या उत्पीड़न से सुरक्षा जैसे मुद्दों को नियंत्रित करता है. सीधे शब्दों में कहें तो उद्योग की परिभाषा तय करती है कि IDA की सुरक्षा, पाबंदियां और नियम किसी संस्था पर लागू होंगे या नहीं. पहले के फैसलों में अलग-अलग राय थी. कुछ ने चैरिटी या कल्याणकारी गतिविधियों को एक्ट से बाहर रखा, तो कुछ ने संगठित श्रम और नियोक्ता के नियंत्रण को अहम माना.








