पश्चिम एशिया पर भारत की चुप्पी ‘नैतिक सरेंडर नहीं, जिम्मेदार कूटनीति’ है………………

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका-इजरायल युद्ध की वजह से पैदा हुए संकट पर भारत सरकार के स्टैंड का खुलकर समर्थन किया है। थरूर पहले इसपर मीडिया में छिटपुट बोलते रहे हैं, लेकिन अब एक लेख लिखकर उन्होंने मोदी सरकार पर सवाल उठाने वालों को जमीनी हालात और राष्ट्रहित में […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 19 मार्च 2026, 07:22 AM 4 मिनट read
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पश्चिम एशिया पर भारत की चुप्पी ‘नैतिक सरेंडर नहीं, जिम्मेदार कूटनीति’ है………………
Photo: UB India News Archive

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका-इजरायल युद्ध की वजह से पैदा हुए संकट पर भारत सरकार के स्टैंड का खुलकर समर्थन किया है। थरूर पहले इसपर मीडिया में छिटपुट बोलते रहे हैं, लेकिन अब एक लेख लिखकर उन्होंने मोदी सरकार पर सवाल उठाने वालों को जमीनी हालात और राष्ट्रहित में अपनी गई रणनीति के बारे में समझाने की कोशिश की है।

केरल के तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस सांसद और संयुक्त राष्ट्र के पूर्व राजनियक शशि थरूर ईरान युद्ध में भारत की ओर से अपनाई गई कूटनीति पर सवाल खड़े करने की भारतीय लिबरल्स की कोशिशों को आईना दिखा दिया है। उनका यह लेख इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ है।

पश्चिम एशिया संघर्ष में सरकार की चुप्पी का समर्थन

थरूर के मुताबिक उनके जैसे जिन लोगों ने पश्चिम एशिया युद्ध पर सरकार की चुप्पी की निंदा नहीं की, लिबरल्स उन्हीं पर निशाना साधने लगे हैं। वे इसे नैतिक कायरता कह रहे हैं। वे हमसे चाहते हैं कि हम यह मांग करें कि भारत नैतिक श्रेष्ठता दिखाते हुए युद्ध को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन घोषित करे। लेकिन, मैं इस संघर्ष पर सरकार की चुप्पी की निंदा नहीं करूंगा।

भारतीय कूटनीति में राष्ट्रहित हमेशा रहा सर्वोपरि

भारत की कूटनीति हमेशा ही सिद्धांत और व्यवहार के संतुलन पर आधारित रही है। जवाहरलाल नेहरू की गुटनिरपेक्षता वाली नीति शीत युद्ध के समय शत्रुता में उलझने की जगह भारत की संप्रभुता और अस्तित्व पर आधारित थी। इस तरह से आज बहुध्रुवीय विश्व में भारत अलग-अलग ताकतों के साथ संबंध बनाकर चल रहा है,चाहे वे एक-दूसरे के दुश्मन क्यों न हों, क्योंकि राष्ट्रहित सर्वोपरि है।

आत्म-संतोषी निंदाओं से राष्ट्रहित खतरे में पड़ेगा’

शशि थरूर के मुताबिक भारत की इस कूटनीति का उद्देश्य तय है, वैश्विक न्याय की बात करते हुए भारत की संप्रभुता को सुरक्षित रखना। गांधी और नेहरू की विरासत को सच्ची श्रद्धांजलि उनके मूल्यों को समय के हिसाब से बुद्धिमानी से अपनाने की है, न कि ऐसे आत्म-संतोषी निंदाओं में जो राष्ट्रहित को खतरे में डाल सकती है।

सोवियत संघ के समय अपनाए गए रणनीति का उदाहरण

शशि थरूर ने साफ शब्दों में बताया है कि जब भी राष्ट्रहित का टकराव सिद्धांतों से हुआ है, भारत ने चुप्पी को ही अपना हथियार बनाया है। इसके लिए उन्होंने सोवियत संघ के द्वारा हंगरी (1956), चेकोस्लोवाकिया (1968) और अफगानिस्तान (1979) में किए गए अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघनों का उदाहरण दिया है, जिसकी निंदा करने में हमने बचने की कोशिश की। क्योंकि, मास्को के साथ अपने रिश्तों को हम खतरे में डालने का जोखिम नहीं ले सकते थे।

थरूर का कहना है न तो तब सोवियत आक्रमण पर हमारी चुप्पी का यह मतलब था कि हमने उसका समर्थन किया और न ही यूक्रेन में रूस के हमले और ईरान पर इजरायल और अमेरिका के अटैक का ही यह अर्थ हो सकता है।

अमेरिका और खाड़ी के देशों में भारत का बहुत कुछ दांव पर

भारत का न सिर्फ अमेरिका के साथ बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है, बल्कि खाड़ी देशों में हमारा बहुत बड़ा हित दांव पर है, जहां ईरान अभी ताबड़तोड़ हमले किए जा रहा है। करीब 200 बिलियन डॉलर का सालाना व्यापार इसी क्षेत्र से होता है। हमारी ऊर्जी सुरक्षा खाड़ी के तेल और गैस पर निर्भर है। वहीं इस क्षेत्र में 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा की भी चिंता है।

ऐसे में अमेरिका और इजरायल को नैतिकता की पाठ पढ़ाने से हमारे अपने हितों को भारी नुकसान हो सकता है। इसलिए, ऐसे समय में चुप्पी कायरता नहीं है, यह क्षेत्र की वास्तविकता और हमारे राष्ट्रहितों की रक्षा के बीच संतुलन बिठाने की कोशिशों की एक गंभीर हकीकत है। उन्होंने अमेरिका की मौजूदा डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के मायने को भी समझने को कहा है, जिसके लिए अंतरराष्ट्रीय नियमों के ज्यादा मायने नहीं रह गए हैं।

उनके अनुसार सच्चाई को स्वीकार करने का मतलब किसी के सामने झुकना नहीं है। भारत ने हमेशा ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वैश्विक न्याय की आवाज बुलंद की है और हमें पता है कि संवेदनशील मुद्दों पर कब चुप रहना ही उचित है। जियोपॉलिटिक्स की इसी सच्चाई को समझना जरूरी है। इसलिए यह ‘नैतिक सरेंडर नहीं, बल्कि यह एक जिम्मेदार कूटनीति’ है।

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