पश्चिम एशिया संघर्ष से दुनिया पर मंडराता आर्थिक संकट……………

एक कहावत है कि तितली के नन्हें पंखों की फड़फड़ाहट से भी दुनिया के दूसरे छोर पर तूफान आ सकता है। वाकई, पश्चिम एशिया में युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट, प्रचार के महारथी बेशक कुछ भी कहें, एक वैश्विक वित्तीय आपदा में तब्दील होता दिख रहा है, जिससे बचना भी असंभव है। हालांकि, नेतृत्व […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शुक्रवार, 20 मार्च 2026, 08:23 AM 6 मिनट read
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पश्चिम एशिया संघर्ष से दुनिया पर मंडराता आर्थिक संकट……………
Photo: UB India News Archive

एक कहावत है कि तितली के नन्हें पंखों की फड़फड़ाहट से भी दुनिया के दूसरे छोर पर तूफान आ सकता है। वाकई, पश्चिम एशिया में युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट, प्रचार के महारथी बेशक कुछ भी कहें, एक वैश्विक वित्तीय आपदा में तब्दील होता दिख रहा है, जिससे बचना भी असंभव है। हालांकि, नेतृत्व में शख्सियत के महत्व को समझने के लिए यह संदर्भ अत्यंत महत्वपूर्ण है। जूलियस सीजर ने कहा था-कुछ लोग बेहद साधारण ढंग से एक वास्तविकता गढ़ सकते हैं और साथ ही उस पर विश्वास भी कर सकते हैं। इसे ही फ्रांसिस बेकन ने कल्पना और विश्वास का घनिष्ठ संबंध बताया था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप निस्संदेह एक वैकल्पिक वास्तविकता की कल्पना कर सकते हैं और साथ ही, उस पर विश्वास भी कर सकते हैं। पर पश्चिम एशिया में जो परिकल्पना की गई थी, जो दावा किया जा रहा है और जो हो रहा है, उसके बीच की गहरी खाई इस तूफान को और तीव्र बना रही है।

युद्ध का उद्देश्य ईरानियों को मुक्त कराना था। लेकिन ईरान ने ट्रंप की अवहेलना करते हुए एक खामनेई को हटाकर दूसरे खामनेई को सत्ता के सिंहासन पर बैठा दिया, जो संभवत: अपने पिता से भी अधिक कट्टरपंथी है। ट्रंप सैन्य कामयाबी के लिए अपनी पीठ ठोंकते रहते हैं, इसके बावजूद ईरानी मिसाइलें सऊदी अरब में अमेरिकी विमानों और इस्राइल में अपने लक्ष्यों को निशाना बना रही हैं।

1936 में रॉबर्ट के मर्टन ने उद्देश्यपूर्ण सामाजिक कार्रवाई के अप्रत्याशित नतीजों को परिभाषित किया था। मर्टन ने निरंकुश हितों की खोज में समझदारी भरी सलाह को नजरअंदाज करने के जोखिम को भी रेखांकित किया था। ट्रंप की भू-राजनीति इसकी ही पुष्टि करती है।

भारत में 33 करोड़ से अधिक एलपीजी उपभोक्ता हैं, जिनमें से आधे उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और हरियाणा जैसे घनी आबादी वाले राज्यों में हैं। भारत अपनी 88 फीसदी पेट्रोलियम जरूरतों का आयात करता है और इसकी आपूर्ति शृंखला में जरा भी अड़चन आने पर हृदय वॉल्व से लेकर उर्वरक, बोतलें और पैकेजिंग से लेकर निर्माण सामग्री, परिधान से लेकर डिटर्जेंट तक 5,000 से अधिक उत्पादों के आयात में मुश्किलें आने की आशंका पैदा होना स्वाभाविक है।

ट्रंप अमेरिकियों के लिए किफायती जीवन सुनिश्चित करने के वायदे के साथ सत्ता में आए थे। लेकिन आंकड़ों पर गौर करें, तो दस कारोबारी दिनों से भी कम समय में दस खरब डॉलर से अधिक की अमेरिकी बचत खत्म हो गई है। एक ऐसे देश में, जहां आवागमन सर्वप्रमुख है, पेट्रोल पंपों पर ईंधन की कीमतें एक महीने से भी कम समय में 22 फीसदी बढ़ चुकी हैं।  वैश्विक तेल आपूर्ति का पांचवां हिस्सा अवरुद्ध होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है।

बीते शुक्रवार को, सऊदी अरब ने संकट के बीच अपने उत्पादन में 20 फीसदी की कटौती की। ट्रंप ने यूक्रेन में शांति लाने के लिए रूस पर प्रतिबंध लगाए थे। इस सप्ताह, उन्होंने कीमतों को नियंत्रित करने के लिए रूसी कच्चे तेल पर लगे प्रतिबंध हटा दिए। युद्ध ने कच्चे तेल की कीमतों को 70 डॉलर से बढ़ाकर 100 डॉलर प्रति बैरल से अधिक कर दिया है और आपूर्ति को भी कम कर दिया है।

यह स्वाभाविक ही था कि बैंकों ने तेल की कीमतों के पूर्वानुमानों को संशोधित किया। गोल्डमैन सैश ने मार्च तक तेल की कीमत 100 डॉलर से ऊपर रहने का, जबकि अन्य बैंकों ने कीमतों के 150 डॉलर तक पहुंचने का अनुमान लगाया। ईरान ने तो कीमतों के 200 डॉलर तक पहुंचने की चेतावनी भी दी है। इतिहास खुद को नहीं दोहराता, लेकिन अक्सर मिलता-जुलता है। पिछली बार कच्चे तेल की कीमतें 150 डॉलर के आसपास 2008 में थीं, तब भी अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के कारण कीमतें बढ़ी थीं, जब ईरान ने मिसाइलों का परीक्षण किया था।

आम धारणा यह है कि निजी ऋण बाजार, जो अब 21 खरब डॉलर से अधिक का है, एक ऐसा बंद गणराज्य है, जहां अमीर लोग और भी अमीर लोगों के पैसे से खेलते हैं। लेकिन, हकीकत यह है कि निजी ऋण भी परिसंपत्ति निर्माण के लिए सार्वजनिक रूप से जुटाए गए ऋण पर निर्भर करता है।

उच्च ब्याज दरों का साया बाजार में हलचल पैदा कर रहा है। आप देख सकते हैं कि निजी ऋण कंपनियां अस्थिर दरों पर उधार ले रही हैं। इसका अर्थ है कि वे कम उधार लेंगी, अधिक भुगतान करेंगी और कम इकाइयों को वित्तपोषित करेंगी, जो कम रिटर्न्स में तब्दील होगा। एआई के आगमन और सॉफ्टवेयर दिग्गजों पर इसके असर से भी डर पैदा होता है। गौरतलब है कि निजी ऋण का करीब 25 फीसदी पैसा सॉफ्टवेयर कंपनियों में फंसा हुआ है।

ब्याज दरों में उछाल और निवेशकों की होड़ 2000 के डॉट-कॉम बबल और 2008 के आर्थिक संकटों की याद दिलाती है। 1999 में अनुमान लगाया गया था कि डॉट-कॉम निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बुनियादी ढांचा तैयार होते ही निवेश के लिए पैसा आएगा। ढांचा तो बन गया, लेकिन निवेशक वहीं अटके रहे। 2008 में वित्तीय विशेषज्ञों ने रियल एस्टेट में तेजी लाने के लिए जोखिमों का एक जाल बिछाया। लेकिन, उस दौरान कच्चे तेल की कीमत 147 डॉलर तक पहुंचने से महंगाई व ब्याज दरें बढ़ गईं और सभी योजनाएं ध्वस्त हो गईं।
ऋण चुकाने में चूक और डिफॉल्ट का जोखिम सिर्फ निजी ऋण तक ही सीमित नहीं, बल्कि सार्वजनिक बाजारों में भी फैल सकता है। भारत और दुनिया भर में लागतों में वृद्धि व मुद्राओं के गिरते मूल्य ऋण चुकाने और नवीनीकरण को चुनौती दे रहे हैं। अपारदर्शी निजी ऋण बाजार में कोई भी दरार पीड़ा को ही बढ़ाएगी।

2026 की कहानी, 2000 और 2008 की तरह उम्मीदों व वास्तविकता के बीच की खाई को दर्शाती है। 2008 में बढ़ती महंगाई के कारण ब्याज दरों में कटौती को टालने से वैश्विक वित्तीय संकट उत्पन्न हुआ था और आज होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावट से आपूर्ति शृंखलाएं प्रभावित हो रही हैं, जिससे महंगाई बढ़ रही है। क्रेडिट बाजार भय से उबल रहे हैं। जाहिर है, युद्ध की कीमत युद्धों पर चल रही बयानबाजी से कहीं अधिक दर्दनाक होगी। साहिर का यह कहना मौजू है कि जंग तो खुद एक मसला है, जंग क्या, मसलों का हल देगी, खून और आग, आज बरसेगी, भूख और एहतियाज कल देगी।

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