नेतन्याहू का बयान क्या संकेत दे रहा ……………..

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दावा किया है कि ईरान अब परमाणु हथियार और मिसाइलें नहीं बना पाएगा. उनका दावा है कि अमेरिका और इजरायल के हमलों ने ईरान की ये क्षमताएं खत्म कर दी हैं. इस बयान के दो मायने हो सकते हैं. पहला-ईरान को इस युद्ध में अमेरिका-इजरायल ने काफी नुकसान पहुंचाया है. […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शनिवार, 21 मार्च 2026, 07:26 AM 8 मिनट read
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नेतन्याहू का बयान क्या संकेत दे रहा ……………..
Photo: UB India News Archive

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दावा किया है कि ईरान अब परमाणु हथियार और मिसाइलें नहीं बना पाएगा. उनका दावा है कि अमेरिका और इजरायल के हमलों ने ईरान की ये क्षमताएं खत्म कर दी हैं. इस बयान के दो मायने हो सकते हैं. पहला-ईरान को इस युद्ध में अमेरिका-इजरायल ने काफी नुकसान पहुंचाया है. दूसरा-अमेरिका-इजरायल ने अपना मिशन पूरा कर लिया है और अब युद्ध खत्म करने का वक्त करीब आ रहा है.

चलिए सबसे पहले, पहले मतलब का आकलन करते हैं-

ईरान को बहुत नुकसान

वाकई ये सच बात है. ईरान को बहुत नुकसान हुआ है. 

1.युद्ध में मारे गए लोगों के नाम देखिएगा तो पता चलेगा कि अमेरिका, इजरायल ने ईरान के सियासी और सैन्य लीडरशिप को खत्म कर दिया है. मारे जाने वाले लीडर्स की लिस्ट बड़ी लंबी लेकिन इसकी गंभीरता का अंदाजा आपको नीचे दिए कुछ नामों से पता चल जाएगा.

  • सुप्रीम लीडर खामेनेई
  • सुरक्षा प्रमुख अली लारिजानी
  • IRGC के कमांडर-इन-चीफ मोहम्मद पाकपुर
  • रक्षा मंत्री अजीज नसीरजादेह
  • खामेनेई के करीबी सुरक्षा सलाहकार अली शमखानी
  • खुफिया विभाग के चीफ सलाह असादी
  • नए हथियारों के प्रोग्राम के चीफ हसन जबाल अमेलियन
  • बसिज पैरा मिलिट्री फोर्स के कमांडर घोलामरेजा सोलैमानी
  • मिलिट्री ब्यूरो के चीफ मोहम्मद शिराजी
  • सशस्त्र बलों के चीफ ऑफ स्टाफ सय्यद अब्दोलरहीम मुसावी

2. ईरान के मिसाइल अड्डों और ड्रोन कैपिसिटी को निशाना बनाया गया है. हिंद महासागर में ईरान का एक युद्धपोत भी डुबाया गया. हर दूसरे दिन इजरायल और अमेरिका दावा करते हैं कि ईरान को सैन्य लिहाज से अपाहिज बना चुके हैं.

3. ईरान के कई तेल इंफ्रा को उड़ा दिया गया है. यहां तक कि बेहद अहम गैस फील्ड साउथ पार्स पर हमला हुआ है.

4. सैनिकों और आम लोगों की मौत-अमेरिका के ह्म्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज एजेंसी के आकलन के मुताबिक ईरान में करीब 3 हजार लोग मारे जा चुके हैं.

अब चलिए दूसरे निष्कर्ष का विश्लेषण करते हैं-

युद्ध खत्म करने का वक्त करीब?

नेतन्याहू के बयान का एक मतलब ये भी हो सकता है कि वो अब युद्ध से निकलना चाहते हैं. यही हाल अमेरिका का भी हो सकता है. और इसके लिए वो बहाना ढूंढ रहे हैं. क्योंकि ये सच है कि इजरायल और अमेरिका ने सोचा नहीं था कि ईरान इतने दिन युद्ध में टिक पाएगा. उम्मीद करते भी तो कैसे? एक तरफ दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताकत अमेरिका. साथ में  इजरायल जिसे मॉर्डन वॉर फेयर  मास्टर माना जाता है और दूसरी तरफ ईरान जो दशकों से पाबंदियां झेल रहा है. ईरान को नुकसान तो हुआ है लेकिन उसने भी अमेरिका और इजरायल की नाक में दम कर रखा है. ट्रंप और नेतन्याहू क्यों इस युद्ध से इज्जत बचाकर निकलना चाहते हैं, इसकी ये वजहें हो सकती हैं-

1. ईरान ने युद्ध को ग्लोबल बना दिया- ईरान ने मिडिल ईस्ट के देशों पर ताबड़तोड़ हमले किए हैं. UAE, सऊदी, ओमान आदि देशों में बड़े पैमाने पर तबाही हुई है. दुबई जैसे आलिशान शहर भी निशाने पर हैं. कभी एयरपोर्ट पर किसी ड्रोन का मलबा गिर रहा है कभी कुछ. मिडिल ईस्ट का आसमान सुरक्षित है ना ही जमीन.

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2. वैश्विक आर्थिक संकट-  ईरान ने मिडिल ईस्ट के तेल इंफ्रा को भी निशाना बनाया है. कतर में दुनिया के सबसे बड़े गैस प्लांट रास लफान को निशाना बनाया. वहां उत्पादन रोकना पड़ा. फिर ईरान ने होमुर्ज के रास्ते मालवाहक जहाजों की आवाजाही रोक दी. इसका असर दुनिया के हर हिस्से में हुआ है. युद्ध की आंच अब लोगों की रसोई तक पहुंच चुका है, और चूल्हे नहीं जल रहे.  कई देशों में रसोई गैस की भारी किल्लत हो गई है. पाकिस्तान में हफ्ते में चार दिन ही काम हो रहा है. श्रीलंका में भी यही हाल है. तो इस लिहाज से अब ये क्षेत्रिय युद्ध ‘वर्ल्ड वॉर’ बन चुका है. जाहिर है इसका ठीकरा अमेरिका और इजरायल पर ही फूटेगा. दुनिया भर के देश इन दो देशों पर अलग-अलग चैनलों से युद्ध रोकने के लिए दबाव डाल रहे होंगे. खासकर अरब के देश कह रहे हैं कि इजरायल-ईरान के बीच लड़ाई हो रही है और पिस वो रहे हैं.

3. ट्रंप की कूटनीतिक फजीहत- तेल का ऐसा संकट है कि जो ट्रंप रूसी तेल खरीदने वालों को सजा दे रहे थे, वही अब कह रहे हैं कि रूस का तेल ले लो. यूक्रेन इससे नाराज है. पुतिन नोट गिन रहे हैं. चीन की चांदी है क्योंकि वो ईरान के साथ खड़ा है. यानी अमेरिका के दो दुश्मन रूस और चीन, इस युद्ध से दूर हैं लेकिन युद्ध की मलाई काट रहे हैं. और इससे ट्रंप पर सवाल उठ रहा है कि इस युद्ध से अमेरिका अपने बड़े दुश्मनों को फायदा पहुंचा रहे हैं और अमेरिका का नुकसान.

दूसरी तरफ अमेरिका और इजरायल में मतभेद अब सतह पर आ गया है. जब इजरायल ने तेहरान के तेल डिपो पर हमला किया तो अमेरिका ने पल्ला झाड़ लिया. अमेरिका ने इजरायल को चेतावनी भी दी. लेकिन इजरायल ने अपनी मनमानी जारी रखी. अमेरिकी चेतावनी के बावजूद साउथ पार्स पर हमला किया. युद्ध में किसने, किसको झोंका, इस पर भी विवाद खड़ा हो गया है. नेतन्याहू ने अपने ताजा बयान में कहा है कि ट्रंप अपने फैसले खुद लेते हैं, किसी दबाव में नहीं. कुल मिलाकर युद्ध के दो साथी ही युद्ध के बीच उलझ गए हैं. ये भी कूटनीतिक नाकामी का ही नमूना है.

4. सत्ता परिवर्तन में नाकाम– अमेरिका और इजरायल का इस युद्ध के पीछे एक घोषित उद्देश्य है ईरान में सत्ता परिवर्तन. खामेनेई और लारिजानी के मारे जाने के बावजूद ईरान युद्ध में टिका है. हमले जारी रखे हुए है. इससे फिलहाल तो ये उद्देश्य पूरा होता नहीं दिख रहा. खुद अमेरिका की नेशनल इंजेलिजेंस की चीफ तुलसी गबार्ड ने कह दिया कि ईरानी शासन कमजोर हुआ है खत्म नहीं. ट्रंप की इससे देश-विदेश में किरकिरी हुई है.

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5. ट्रंप को दुनिया का सपोर्ट नहीं– ट्रंप को उम्मीद होगी कि नाटो के देश उसका सहयोग करेंगे लेकिन ये नहीं हो पाया है. दरअसल नाटो पहले से ही यूक्रेन-रूस के बीच उलझा हुआ है. वो अपने लिए नया मोर्चा नहीं खोल सकता. खासकर ऐसी स्थिति में जब ट्रंप यदा-कदा नाटो की फजीहत करते रहते हैं. अमेरिका ब्रिटिश बेस ग्लोस्टरशायर और डिएगा गार्सिया का इस्तेमाल  करना चाहता था, लेकिन ब्रिटेन ने इसकी इजाजत भी बड़ी हिचक के साथ दी है. साथ में ये भी कहा है कि वो इराक युद्ध से सबक सीख चुके हैं और इस युद्ध में सीधे तौर पर नहीं उतरेंगे. अब ब्रिटेन और फ्रांस ने कहा है कि वो होर्मुज से जहाजों को निकालने में अमेरिका की मदद करेंगे लेकिन यहां मकसद अमेरिका को सहायता देना नहीं, अपनी मदद करना है क्योंकि होर्मुज का बंद होना न सिर्फ तेल संकट पैदा कर रहा है बल्कि इसका असर मुद्दा, मेटल और मार्केट हर जगह पड़ रहा है. ये मसला अब वैश्विक आर्थिक संकट का रूप ले चुका है.

6. ट्रंप का अपने घर की टेंशन– अमेरिका इस युद्ध में रोज करीब 1 बिलियन डॉलर खर्च कर रहा है. खबर है कि पेंटागन ने युद्ध के लिए 200 अरब डॉलर का अतिरिक्त बजट मांगा है. ये बहुत बड़ी रकम है, अमेरिका जैसे अमीर देश के लिए भी. ट्रंप प्रशासन में ईरान युद्ध को लेकर मतभेद पहले भी थे लेकिन अब ये बाहर आने लगा है. आतंकनिरोधी दस्ते के चीफ जो केंट ने इस्तीफा दे दिया है. केंट ने ट्रंप के इस दावे को गलत बताया कि ईरान एटमी हथियार बनाने से महज दो हफ्ते दूर था. उन्होंने अमेरिका को युद्ध में झोंकने के लिए इजरायल की आलोचना की. तुलसी गर्बाड खुद ऐसा नहीं मानती है कि ईरान पर हमला करना इसलिए जरूरी था क्योंकि अमेरिका पर हमला होने वाला था. उन्होंने इसे ट्रंप का निष्कर्ष करार दिया.

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आम तौर पर ऐसा माना जाता है कि अमेरिका इस युद्ध से ईरान का तेल हासिल करना चाहता था. अगर उसका ये मकसद था तो अभी ये भी दूर की कौड़ी नजर आ रही है. क्षेत्र में इजरायल की सैन्य धमक को कोई चुनौती देता है तो वो है ईरान. फिलिस्तीन के साथ उसकी लड़ाई को ईरान जब तब कमजोर करता रहता है. इस लिहाज से ईरान में सहयोग करने वाली सत्ता उसे चाहिए. अगर ईरान में सत्ता परिवर्तन के बिना युद्ध खत्म हुआ तो इजरायल का मकसद भी पूरा नहीं होने वाला. ईरान कमजोर हुआ है लेकिन वो फिर उठ खड़ा होगा. यही है समस्या. अमेरिका और इजरायल यहां से जाएं तो किधर जाएं?

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