सरकारी नौकरी की आस में वर्षों वक्त बर्बाद …………………

अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की हालिया प्रकाशित ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया रिपोर्ट- 2026’ में एक चौंकाने वाला पहलू सामने आया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2011 में देश का एक युवा स्नातक हर महीने लगभग 21,800 रुपये कमाता था, वहीं एक गैर-स्नातक की कमाई लगभग 9,000 रुपये थी, जबकि वर्ष 2023 तक आते-आते एक स्नातक […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शनिवार, 28 मार्च 2026, 07:14 AM 6 मिनट read
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सरकारी नौकरी की आस में वर्षों वक्त बर्बाद …………………
Photo: UB India News Archive

अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की हालिया प्रकाशित ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया रिपोर्ट- 2026’ में एक चौंकाने वाला पहलू सामने आया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2011 में देश का एक युवा स्नातक हर महीने लगभग 21,800 रुपये कमाता था, वहीं एक गैर-स्नातक की कमाई लगभग 9,000 रुपये थी, जबकि वर्ष 2023 तक आते-आते एक स्नातक की कमाई घटकर 19,573 रुपये रह गई, वहीं गैर-स्नातक की कमाई बढ़कर 10,507 रुपये हो गई। पिछले 12 वर्षों में स्नातक पास लोगों की कमाई आमतौर पर गिरी है। बढ़ी हुई महंगाई को इसमें समायोजित करें, तो उनकी कमाई खत्म हो गई है।

इस रिपोर्ट की सबसे खास बात यह है कि भारत के 20 से 29 वर्ष के 67 प्रतिशत युवा स्नातक बेरोजगार हैं। साल 2004 में यह आंकड़ा सिर्फ 32 प्रतिशत था। दूसरी ओर, युवा स्नातकों की तादाद 2004 के 10 प्रतिशत से बढ़कर 2023 में करीब 28 प्रतिशत हो गई है। ‘आईएलओ-आईएचडी इंडिया एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट 2024’ ने भी खुलासा किया था कि युवा स्नातकों में बेरोजगारी की दर 29 प्रतिशत है, जबकि अनपढ़ नौजवानों में यह दर सिर्फ तीन प्रतिशत पाई गई। स्नातक युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी की यह प्रवृत्ति पिछले एक दशक से पता चलने लगी है।

इसके कारण श्रम बाजार की मांग और आपूर्ति में निहित हैं। आपूर्ति पक्ष को देखें, तो पढ़े-लिखे युवा अब अपनी योग्यता के अनुरूप नौकरी का इंतजार करते हैं। दरअसल, पिछले दो दशकों में सभी आय-वर्ग के परिवारों की आमदनी बढ़ी है। कमाई बढ़ने से अब कम आय वाले परिवार भी अपनी संतानों के नौकरी पाने के इंतजार को बर्दाश्त कर सकते हैं। इससे तो यही साबित होता है कि लोग जितने ज्यादा शिक्षित होंगे, बेरोजगारी दर उतनी ही अधिक होगी!

हालांकि, यह इंतजार एक अलग रूप ले लेता है। बहुत सारे स्नातक सरकारी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने लग जाते हैं। कई राज्य सरकारें तो लोक सेवा आयोग की प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के लिए रियायत भी देती हैं। साल 2013 से 2019 तक के तमिलनाडु लोक सेवा आयोग के आंकड़ों का विस्तृत अध्ययन दर्शाता है कि साल 2018-2019 में, तमिलनाडु लोक सेवा आयोग के समूह-4 की एक ही भर्ती के लिए 1.37 करोड़ आवेदन आए। उस समय तमिलनाडु के लगभग 80 प्रतिशत बेरोजगार युवा इस परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। इन परीक्षाओं की तैयारी के लिए युवा निजी रोजगार को छोड़ दे रहे हैं। यह प्रवृत्ति सभी राज्यों में है।

सवाल है कि सरकारी नौकरियों के प्रति इतनी दीवानगी आखिर क्यों है? इसके कारण हमारे रोजगार ढांचे में निहित हैं। एक सरकारी पद पा जाने पर पक्की नौकरी, निजी क्षेत्र की तुलना में ज्यादा वेतन (उदाहरण के लिए, एक सरकारी ड्राइवर निजी ड्राइवर से चार गुना ज्यादा वेतन पाता है), स्वास्थ्य बीमा और पेंशन लाभ के साथ निचले स्तर की सरकारी नौकरी से भी सामाजिक रुतबा बन जाता है। लड़कियों के मामले में तो सरकारी नौकरीशुदा के लिए भावी ससुराल पक्ष से तत्काल सहमति मिलने की संभावना बढ़ जाती है। इन्हीं कारणों से युवा सरकारी नौकरी के लिए बार-बार कोशिश करते हैं, मगर निजी नौकरी की ओर नहीं जाते।

मांग के पहलू पर स्थिति ज्यादा गंभीर है। साल 2012 से 2019 के बीच देश की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) सालाना 6.7 प्रतिशत की दर से बढ़ी, लेकिन रोजगार-सृजन में केवल 0.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई। बड़े पैमाने पर रोजगार-सृजन करने वाले विनिर्माण क्षेत्र की कार्यबल में हिस्सेदारी दो दशकों से 12-14 प्रतिशत पर अटकी हुई है, जबकि उत्पादन में सालाना 7.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। साल 2004 से 2023 के बीच भारत में सालाना 50 लाख स्नातक शिक्षण संस्थानों से निकले, जिनमें से हर साल केवल 28 लाख को रोजगार मिल पाया। इनमें से केवल 17 लाख को ही सरकारी नौकरियां मिलीं। भारत बड़े पैमाने पर उस ‘निर्यात-आधारित और श्रम-प्रधान’ विकास के रास्ते से चूक गया, जिसने कभी पूर्वी एशिया का कायाकल्प किया था।

साल 2021-22 से 2023-24 के बीच सृजित हुए 8.3 करोड़ काम के अवसरों में से लगभग आधे कृषि क्षेत्र में पैदा हुए थे, जिनमें आय कम थी, जिनकी उत्पादकता सीमित थी और करियर के लिहाज से आगे बढ़ने के खास अवसर न थे। आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 में यह बताया गया है कि केवल 8.25 प्रतिशत स्नातक ही ऐसे पद पर कार्यरत हैं, जो उनकी योग्यता के अनुरूप है। लगभग आधे स्नातक प्राथमिक या अर्द्ध-कुशल श्रेणी के कार्यों में लगे हुए हैं। ये ऐसी नौकरियां नहीं हैं, जो ‘करके सीखने’, उत्पादकता या कौशल विकास के अवसर देती हों। ये ऐसी बंद गलियां हैं, जिनके लिए केवल डिग्री की आवश्यकता होती है।

हमारे श्रम कानून इस समस्या को और जटिल बना देते हैं। नियोक्ता स्थायी कर्मचारियों को नियुक्त करने से हिचकिचाते हैं, क्योंकि उन्हें वे आसानी से निकाल नहीं सकते। इसलिए उन्होंने संविदा के जरिये नौकरी सुरक्षा के कठोर कानूनों को दरकिनार कर दिया है। ऑटोमोबाइल क्षेत्र ने इसकी शुरुआत की, जिसका अनुसरण अन्य क्षेत्रों ने किया। इसके विपरीत, अमेरिका में चार प्रतिशत बेरोजगारी दर के साथ-साथ नौकरियों में जबरदस्त गतिशीलता भी है। यहां करीब 20 प्रतिशत कर्मचारी लाभ और अनुभव के साथ साल में कई नौकरियां बदलते हैं।

इस समस्या से पार पाने के लिए नौकरी खोजने में कठिनाई और योग्यता के अनुकूल काम न मिलने की समस्या को कम करने की नीति अपनानी होगी। छोटे-छोटे स्तर के प्रशिक्षण कार्यक्रम मांग व आपूर्ति बाजार को राहत दे सकते हैं। साथ ही रोजगार के लिए डिग्री के बजाय नियोक्ता के अनुकूल कौशल विकास अधिक सहायक होगा। श्रम बाजार की बेहतर जानकारी और आसानी से जॉब खोजने वाले पोर्टल आ जाएं, तो इस समस्या को सुलझाने में मददगार बन सकते हैं।

एक अन्य प्राथमिकता यह हो सकती है कि सरकारी नौकरियों में अत्यधिक सुविधाएं कम कर दी जाएं। इसके लिए कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि, संविदा नियुक्ति की शुरुआत और आउटसोर्सिंग में वृद्धि करनी होगी। स्थिति यह है कि हमारे स्नातक सरकारी नौकरी की आस में वर्षों का वक्त बर्बाद कर देते हैं, जबकि निजी क्षेत्र में रोजगार-सृजन कछुआ चाल से हो रहा है और कल्याणकारी नीतियों के लिए धन की कमी पड़ रही है। ऐसे में, हमें इस जटिल समस्या का कुछ न कुछ समाधान निकालना होगा।

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