क्या नाटो को छोड़ सकता है अमेरिका?

एक महीने पहले जब अमेरिका और इस्राइल ने ईरान पर हमले शुरू किए तो यह आशंका जताई जा रही थी कि इस युद्ध के विश्व युद्ध बनने में देर नहीं लगेगी। माना जा रहा था कि अमेरिका और इस्राइल पर अगर ईरान का पलटवार होता है तो अमेरिका के सहयोगी देश, खासकर नाटो और यूरोपीय […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 2 अप्रैल 2026, 10:58 AM 8 मिनट read
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क्या नाटो को छोड़ सकता है अमेरिका?
Photo: UB India News Archive
एक महीने पहले जब अमेरिका और इस्राइल ने ईरान पर हमले शुरू किए तो यह आशंका जताई जा रही थी कि इस युद्ध के विश्व युद्ध बनने में देर नहीं लगेगी। माना जा रहा था कि अमेरिका और इस्राइल पर अगर ईरान का पलटवार होता है तो अमेरिका के सहयोगी देश, खासकर नाटो और यूरोपीय संघ के देश उसकी मदद के लिए जरूर आगे आएंगे। हालांकि, जहां पहला अनुमान कि ईरान पलटवार करेगा वाली बात सही साबित हुई, तो वहीं दूसरा अनुमान कि अमेरिका के सहयोगी मदद के लिए आगे आएंगे अब तक सही नहीं हो पाया। उल्टा अधिकतर सहयोगियों ने यह कहकर युद्ध में उतरने से इनकार कर दिया कि यह संघर्ष अमेरिका ने खुद शुरू किया है और वह इसमें नहीं कूदेंगे।

इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी सहयोगियों के रवैये से खासे नाराज रहे हैं। बीते एक महीने में उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म- ट्रूथ सोशल पर नाटो को कागज के शेर तक बताया। साथ ही उन्होंने अपने सहयोगियों पर भी लगातार संघर्ष में शामिल होने का न सिर्फ दबाव बनाया, बल्कि ब्रिटेन और यूरोप के कई देशों पर उनकी मदद न करने के आरोप भी लगाए। अब ट्रंप ने एक ब्रिटिश अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा है कि वह अमेरिका को नाटो से बाहर निकालने पर विचार कर रहे हैं।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर यह नाटो क्या है? ट्रंप आखिर कब से और क्यों अमेरिका को इस गठबंधन से बाहर निकालना चाहते हैं? अमेरिका के नाटो से निकलने की पूरी प्रक्रिया क्या होगी? अगर अमेरिका इस गठबंधन को छोड़ देता है तो इसका असर क्या होगा?
क्या है नाटो?
नाटो यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन है। यह पश्चिमी देशों- यूरोप के कुछ देश और उत्तरी अमेरिका के देशों का एक प्रमुख सैन्य और राजनीतिक गठबंधन है। नाटो की स्थापना दूसरे विश्व युद्ध के बाद सन 1949 में हुई थी। अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में शुरुआत में 12 देशों ने एक साथ जुटकर इस गठबंधन की स्थापना की थी।

क्यों हुई नाटो की स्थापना?

दूसरे विश्व युद्ध के बाद नाटो का गठन मुख्य रूप से यूरोप में सोवियत संघ (रूस) के विस्तार को रोकने के लिए बनाया गया था। नाटो के पहले महासचिव लॉर्ड इस्मेय के मुताबिक, इस गठबंधन का मकसद रूस को बाहर रखना, अमेरिकियों को गठबंधन में रखना और युद्ध के बाद जर्मनी की बढ़ती ताकत को दबा कर रखना था।

अभी कौन हैं नाटो के सदस्य?

वर्तमान में नाटो में 32 सदस्य देश हैं। 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद पूर्वी यूरोप के कई देश इसमें शामिल हुए। इसके बाद 2023 में जब रूस की तरफ से यूक्रेन पर हमला किया गया तो दशकों तक तटस्थ रहे फिनलैंड (अप्रैल 2023) और स्वीडन (मार्च 2024) भी इसके सदस्य बन गए।

क्या है इस संगठन के काम करने का तरीका?

नाटो का सबसे अहम सिद्धांत आर्टिकल 5 है, जो सामूहिक रक्षा की गारंटी देता है। इसका अर्थ है कि अगर किसी एक नाटो सदस्य पर सशस्त्र हमला होता है, तो उसे गठबंधन के सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा। इसके जवाब में बाकी सदस्य देश सुरक्षा बहाल करने के लिए सैन्य बल के इस्तेमाल समेत वह हर कदम उठा सकते हैं, जिसे वे जरूरी  समझते हैं।

नाटो की अपनी कोई स्थायी सेना नहीं है, लेकिन सदस्य देश अंतरराष्ट्रीय संकटों के दौरान सामूहिक सैन्य कार्रवाई करते हैं और संयुक्त सैन्य अभ्यास करते हैं। सदस्य देशों के लिए यह अलिखित नियम भी हैं कि वे अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का कम से कम 2% हिस्सा रक्षा पर खर्च करें, हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल के सम्मेलनों में इस लक्ष्य को बढ़ाकर 3.5% से 5% तक बढ़ाने को लेकर दबाव बनाया, जिसके बाद अधिकतर देशों ने अपने योगदान को बढ़ाने पर सहमति भी जताई।

इस बीच ट्रंप ने एक बार फिर नाटो के औचित्य पर सवाल उठा दिए हैं। पहले रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान और अब ईरान से युद्ध के समय में ट्रंप ने अमेरिका के इस रक्षा समझौते से बाहर निकलने की सख्त चेतावनी दी है। उनका तर्क है कि यूरोपीय सहयोगी देश अपनी रक्षा पर पर्याप्त खर्च नहीं कर रहे हैं और अमेरिका इसके खर्चों का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 15.8%) उठाता है।

ट्रंप कब से और क्यों इस गठबंधन से बाहर निकलना चाह रहे? 

ऐसा नहीं है कि डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो गठबंधन से अमेरिका को बाहर निकलने की बात रूस-यूक्रेन संघर्ष या ईरान युद्ध के शुरू होने के बाद कही है। वे अपने पहले कार्यकाल (2017-2021) के समय से ही नाटो को छोड़ने की बात करते आ रहे हैं।

शुरुआती दौर: जब डोनाल्ड ट्रंप 2016 में पहली बार राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहे थे, तब उन्होंने नाटो को अप्रचलित करार दिया था।

2018 में भी चेतावनी: 2018 के नाटो शिखर सम्मेलन में ट्रंप ने सदस्य देशों को कड़ी चेतावनी दी थी कि अगर उन्होंने रक्षा पर अपना खर्च (जीडीपी का कम से कम 2%) नहीं बढ़ाया, तो अमेरिका इस गठबंधन से खुद को अलग कर लेगा।

2019-2020 के बयान: पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन के मुताबिक, अगस्त 2019 में ट्रंप ने नाटो को लेकर कड़ी नाराजगी जाहिर की थी। इसके अलावा, 2020 में उन्होंने यूरोपीय आयोग (ईसी) की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन से साफ तौर पर कहा था कि नाटो मर चुका है, और हम इससे बाहर निकल जाएंगे।

2024 का चुनाव अभियान: अपने 2024 के चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने खुले तौर पर कहा कि जो नाटो देश रक्षा पर पर्याप्त खर्च (अपने बिलों का भुगतान) नहीं करेंगे, अमेरिका उनकी रक्षा नहीं करेगा और वह रूस को उनके साथ मनमानी करने के लिए बढ़ावा देंगे।

मौजूदा स्थिति (दूसरा कार्यकाल): अपने दूसरे कार्यकाल में भी ट्रंप नाटो के सख्त आलोचक बने हुए हैं। ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में सहयोगी देशों द्वारा समर्थन न देने के बाद, ट्रंप ने नाटो को कागज का शेर कहा है। उन्होंने यह भी घोषणा की है कि अमेरिका का इस रक्षा समझौते से बाहर निकलना अब पुनर्विचार के दायरे में ही नहीं है।

क्या ट्रंप वाकई में अमेरिका को नाटो से निकाल सकते हैं?

अमेरिका का नाटो से बाहर निकलना एक जटिल कानूनी और राजनीतिक प्रक्रिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति अपनी मर्जी से एकतरफा फैसला लेकर इस गठबंधन से बाहर नहीं निकल सकते हैं। दरअसल, इसके लिए प्रशासन को संसद में विशेष बहुमत हासिल करना होगा। अगर यह संभव हो भी जाता है तो नाटो के ही एक कानून के तहत इसे अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है और यह संवैधानिक मामला बन जाएगा।

1. संसदीय मंजूरी की जरूरत 

2023 में सीनेटर (उच्च सदन के सांसद) टिम केन और मार्को रुबियो (अब विदेश मंत्री) ने एक कानून पेश किया था, जिसे वित्तीय वर्ष 2024 के नेशनल डिफेंस ऑथराइजेशन एक्ट के हिस्से के रूप में पारित किया गया। इसे तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडन के हस्ताक्षर के बाद कानून के रूप में मान्यता मिल गई थी। इस कानून के स्पष्ट प्रावधानों के तहत, नाटो से बाहर निकलने के किसी भी राष्ट्रपति के फैसले के लिए सीनेट में कम से कम दो-तिहाई बहुमत की स्वीकृति या कांग्रेस (संसद के दोनों सदनों) के एक विशेष अधिनियम की मंजूरी होना अनिवार्य है।

2. सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई

चूंकि, नाटो की स्थापना एक औपचारिक और बाध्यकारी संधि के जरिए की गई थी, इसलिए राष्ट्रपति अपनी कार्यकारी शक्तियों का इस्तेमाल करके सीधे तौर पर अमेरिका को इससे अलग नहीं कर सकते। नाटो संधि के अनुच्छेद 13 के अनुसार, कोई भी देश एक साल के नोटिस के बाद सदस्यता छोड़ सकता है। ऐसे में अगर राष्ट्रपति कांग्रेस के फैसले को नजरअंदाज करके बाहर निकलने की कोशिश करते हैं, तो कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह मामला देश की सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाएगा और एक बड़ी संवैधानिक और कानूनी लड़ाई शुरू हो जाएगी।

3. चुपचाप दूर होने का विकल्प

कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि भले ही कोई राष्ट्रपति कानूनी बाधाओं के कारण औपचारिक रूप से नाटो न छोड़ पाएं, लेकिन वे बिना निकले ही इस गठबंधन को कमजोर कर सकते हैं। वे क्वाइट क्विटिंग यानी चुपचाप गठबंधन से दूरी बना लेने का रास्ता अपना सकते हैं। इसका मतलब है कि आधिकारिक तौर पर गठबंधन में रहते हुए भी अमेरिका अपनी सैन्य और आर्थिक जिम्मेदारियों को निभाने से पीछे हट सकता है।

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