कांग्रेस खोल सकती है खाता और बिगाड़ भी सकती है खेल!……………….

49 साल पहले 1977 में बंगाल की सत्ता से कांग्रेस बेदखल हुई थी। इसके बाद हुए प्रत्येक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का आंकड़ा कभी भी तीन अंकों वाली संख्या को छू नही पाया। सत्ता से जब बेदखल हुई थी तो 20 सीटें आई थीं। जबकि सत्ता में 200 से अधिक सीटों पर जीत कर आई […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
रविवार, 5 अप्रैल 2026, 07:50 AM 5 मिनट read
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कांग्रेस खोल सकती है खाता और बिगाड़ भी सकती है खेल!……………….
Photo: UB India News Archive

49 साल पहले 1977 में बंगाल की सत्ता से कांग्रेस बेदखल हुई थी। इसके बाद हुए प्रत्येक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का आंकड़ा कभी भी तीन अंकों वाली संख्या को छू नही पाया। सत्ता से जब बेदखल हुई थी तो 20 सीटें आई थीं। जबकि सत्ता में 200 से अधिक सीटों पर जीत कर आई थी।

विधानसभा चुनाव 1982 में इसके बाद 49 सीटें, 1987 में 40 सीटें, 1991 में 43 सीटें, 1996 में 82 सीटें, 2001 में 26 सीटें, 2006 में 21 सीटें, 2011 में 42 सीटें, 2016 में 44 सीटें और 2021 में खाता तक नहीं खुला था। गौरतलब है कि सिर्फ एक बार 1996 में 50 का आंकड़ा पार हुआ था।

2026 विधानसभा चुनाव, कांग्रेस अपने बलबूते अकेले 294 सीटों पर लड़ रही है। कांग्रेस उम्मीदवारों की सूची में लोकसभा के पूर्व नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन चौधरी, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार और संसद के दोनों सदनों की पूर्व सदस्य मौसम नूर के चुनावी मैदान में उतरने से कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और समर्थकों में उत्साह व ऊर्जा आ गई है।

कांग्रेस ने उम्मीदवार भी बहुत सोच समझकर उतारा है। अधीर रंजन चौधरी को उनके परंपरागत गढ़ बहरमपुर से टिकट दिया गया है, जो करीब 30 साल के बाद विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाएंगे। आखिरी बार 1996 में नवग्राम सीट से विधानसभा चुनाव लड़े व जीते थे। दूसरा प्रमुख नाम मौसम नूर का है, जिन्होंने हाल ही में तृणमूल कांग्रेस से वापसी की हैं। मालदा क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए मौसम नूर को मालतीपुर सीट से चुनावी मैदान में उतारा गया है।

कांग्रेस ने किसी भी गैर राजनीतिक सेलेब्रिटी को अपना उम्मीदवार नहीं बनाया है। इस बार राज्य में अपनी खोई सियासी जमीन वापस पाने के लिए अपने पुराने वफादारों पर ही भरोसा कायम रखा है। कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों में 68 दलित तो 64 मुस्लिम उतारे हैं। इसके अलावा 16 अनुसूचित जनजाति से हैं तो 42 महिला उम्मीदवार हैं।

कांग्रेस ने दलित और मुस्लिम पर सबसे ज्यादा भरोसा जताया है, जो ममता बनर्जी और बीजेपी दोनों के लिए सियासी टेंशन बन सकता है। कांग्रेस ने अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए आरक्षित सीटों पर विशेष ध्यान दिया है तो मुस्लिम बहुल जिलों मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर में पार्टी ने अपने मजबूत संगठनात्मक ढांचे के आधार पर उम्मीदवारों का चयन किया है, जिससे त्रिकोणीय मुकाबले की संभावना है।

आज कांग्रेस अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन तलाश रही है। आखिर यह स्थिति क्यों आई? यह जानने के लिए थोड़ा पीछे चलना होगा। दरअसल, 1977 से 1998 तक 21 वर्षों की लगातार हार के बाद सब्र का बांध टूटना ही था। वैसे भी कांग्रेस की राजनीति में सबसे अधिक असहज ममता बनर्जी महसूस कर रही थीं।

लिहाज़ा इसी साल ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बना लीं। कांग्रेस के लिए यह बेहद बड़ा झटका था और तृणमूल कांग्रेस ने धीरे-धीरे कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक पर कब्जा करना शुरू कर दिया। ममता बनर्जी ने पहले कांग्रेस से विपक्ष की भूमिका छीनी और इसके बाद 2011 में  सत्ता में आ गईं।

तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आते ही बंगाल में कांग्रेस अपने निचले स्तर पर पहुंचना शुरू हो गई। उसके बाद रही सही कसर बीजेपी ने पूरी कर दी। बीजेपी 3 सीट से 77 तक पहुंच गई और टीएमसी के खिलाफ मुख्य विपक्षी पार्टी बन गई। इसका नतीजा ये हुआ कि कांग्रेस सत्ता और प्रतिपक्ष की कुर्सी गंवाते हुए शून्य पर आ गई।

1972 के बाद से ही कांग्रेस के प्रदर्शन में लगातार गिरावट जारी है। 1972 में कांग्रेस ने 200 से अधिक सीटों पर जीत हासिल की थी। हालांकि, 1977 में इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में हार के बाद कांग्रेस कभी बंगाल में नहीं उभर पाई। सच तो यह है कि कांग्रेस और वामपंथियों का अंदरूनी संबंध हमेशा एक पहेली रहा।

इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पीवी नरसिम्हा राव, सीताराम केसरी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, डॉ मनमोहन सिंह या मल्लिकार्जुन खड़गे किसी ने भी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष या प्रधानमंत्री की हैसियत से इस रहस्यमय भरी संबंध वाली पहेली को सुलझाने का प्रयास नहीं किया। सच तो यह है कि बंगाल से राहुल गांधी समेत सभी राष्ट्रीय नेताओं ने दूरी रखी है।

राहुल गांधी आखिरी बार भारत जोड़ो यात्रा के तहत फरवरी 2024 में बंगाल के दौरे पर पहुंचे थे। लोकसभा चुनाव 2024 में भी उन्होंने एक भी रैली नहीं की थी और अभी तक विधानसभा चुनाव 2026 में उनके प्रचार को लेकर प्रदेश कांग्रेस कार्यालय को कोई जानकारी नहीं है।

बहरहाल, मार्के की बात तो यह है कि कांग्रेस ने इस दफे सबसे बड़ा दांव मुस्लिमों पर खेला है, उसके बाद दलित और महिलाओं पर भरोसा जताया है. ऐसे में सवाल उठता है कि कांग्रेस की रणनीति से ममता बनर्जी का खेल बिगड़ेगा या फिर बीजेपी का गेम खराब होगा? क्या होगा, यह जानने के लिए 4 मई तक इंतजार करना होगा।

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