ईरान युद्ध से भारतीय अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहे हैं 5 खतरे! , रेपो रेट 5.25% पर बरकरार

नीतिगत ब्याज दरों यानी रेपो रेट तय करने वाली आरबीआई की मॉनीटरी पॉलिसी कमेटी की तीन दिन की बैठक आज खत्म हो गई। समिति के अध्यक्ष और आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इसमें लिए गए फैसलों की जानकारी दी। इस दौरान उन्होंने आगाह किया कि पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई से भारतीय इकॉनमी के […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
बुधवार, 8 अप्रैल 2026, 08:17 AM 6 मिनट read
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ईरान युद्ध से भारतीय अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहे हैं 5 खतरे! , रेपो रेट 5.25% पर बरकरार
Photo: UB India News Archive

नीतिगत ब्याज दरों यानी रेपो रेट तय करने वाली आरबीआई की मॉनीटरी पॉलिसी कमेटी की तीन दिन की बैठक आज खत्म हो गई। समिति के अध्यक्ष और आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इसमें लिए गए फैसलों की जानकारी दी। इस दौरान उन्होंने आगाह किया कि पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई से भारतीय इकॉनमी के लिए पांच बड़े जोखिम पैदा हो सकते हैं। इससे महंगाई, ग्रोथ और देश की वित्तीय स्थिति पर असर पड़ सकता है। भारत अपना करीब 85 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है।

केंद्रीय बैंक ने कहा कि लगातार बढ़ रहीं वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण कई सेक्टरों पर जोखिम दिखना शुरू हो गया है। अगर सप्लाई में बाधा आगे भी बनी रहती है तो इसका व्यापक असर देखने को मिल सकता है। आरबीआई ने कहा कि अगर सप्लाई चेन की सामान्य स्थिति बहाल नहीं हुई तो सप्लाई का शुरुआती झटका आने वाले दिनों में व्यापक डिमांड शॉक में बदल सकता है।

महंगाई बढ़ने का खतरा

आरबीआई का कहना है कि पहला जोखिम यह है कि कच्चे तेल की कीमत में तेजी से मंहगाई बढ़ सकती है और चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है। दूसरा जोखिम यह है कि एनर्जी मार्केट्स, फर्टिलाइजर्स और दूसरी कमोडिटीज में बाधा से इंडस्ट्री, एग्रीकल्चर और सर्विसेज पर असर पड़ सकता है। इससे देश में उत्पादन घट सकता है।

केंद्रीय बैंक के मुताबिक भारतीय इकॉनमी के लिए तीसरा जोखिम यह है कि बढ़ती अनिश्चितता, जोखिम से बचने की बढ़ती प्रवृत्ति और सुरक्षित एसेट्स की मांग से घरेलू लिक्विडिटी की स्थिति टाइट हो सकती है। इससे उपभोग और निवेश प्रभावित हो सकते हैं। ईरान युद्ध से चौथा जोखिम यह है कि ग्लोबल ग्रोथ की कमजोर संभावनाओं के कारण बाहरी मांग में कमी आ सकती है और रेमिटेंस का इनफ्लो घट सकता है।

रेपो रेट 5.25% पर बरकरार

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने एक बार फिर ब्याज दरों को लेकर बड़ा फैसला लिया है। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने ऐलान किया कि पॉलिसी रेपो रेट को 5.25% पर ही स्थिर रखा जाएगा। ऐसे समय में जब महंगाई, कच्चे तेल की कीमतें और वैश्विक अनिश्चितताएं बढ़ी हुई हैं, RBI का यह फैसला संतुलन बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता में 6 अप्रैल से शुरू हुई तीन दिवसीय बैठक के बाद, समिति ने सर्वसम्मति से रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखने का निर्णय लिया है। इसके साथ ही, स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (SDF) रेट 5% और मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) एवं बैंक रेट 5.5% पर बरकरार रहेंगे। गवर्नर ने स्पष्ट किया कि आरबीआई ने अपना रुख ‘न्यूट्रल’ (तटस्थ) रखा है, ताकि जरूरत पड़ने पर भविष्य में लचीला रुख अपनाया जा सके।

7.6% रही देश की GDP ग्रोथ

गवर्नर ने देश की अर्थव्यवस्था पर खुशी जताते हुए कहा कि पिछले साल भारत की वास्तविक जीडीपी (Real GDP) ग्रोथ 7.6% रहने का अनुमान है। यह आंकड़ा दिखाता है कि मजबूत खपत और निवेश के दम पर भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है। संरचनात्मक सुधारों और अनुकूल वित्तीय स्थितियों ने इस विकास दर को काफी सहारा दिया है।

हॉर्मुज जलडमरूमध्य संकट और महंगाई का डर

भले ही भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत दिख रही हो, लेकिन वैश्विक चुनौतियां अभी कम नहीं हुई हैं। गवर्नर ने सावधान करते हुए कहा कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल और अन्य वस्तुओं की कीमतों में उछाल आया है। सप्लाई चेन में आ रही बाधाएं इस साल की विकास दर को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि, राहत की बात यह है कि सरकार महत्वपूर्ण क्षेत्रों में इनपुट की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय कदम उठा रही है। इसके अलावा, सर्विस सेक्टर में निरंतर तेजी और जीएसटी (GST) के सरलीकरण के सकारात्मक प्रभाव से आर्थिक गतिविधियों को लगातार समर्थन मिल रहा है।

आपकी जेब पर क्या होगा असर?

आरबीआई के इस फैसले का सीधा मतलब यह है कि बैंकों द्वारा ब्याज दरों में कटौती का इंतजार थोड़ा और बढ़ गया है। चूंकि रेपो रेट स्थिर है, इसलिए बैंक भी फिलहाल लोन की दरों में कोई बड़ी राहत नहीं देंगे। हालांकि, कॉर्पोरेट और वित्तीय संस्थानों की मजबूत बैलेंस शीट भारतीय बाजार में स्थिरता बनाए रखने में मदद करेगी।

पिछले साल मिली थी बड़ी राहत

याद दिला दें कि साल 2025 में रिजर्व बैंक ने आम आदमी को बड़ी राहत देते हुए ब्याज दरों में कुल 125 बेसिस पॉइंट की कटौती की थी। लेकिन अब वैश्विक हालात बदल चुके हैं। फरवरी 2026 की बैठक में भी दरों को स्थिर रखा गया था और आज भी उसी रुको और देखो की नीति के जारी रहने की उम्मीद है।

भारतीय इकॉनमी को पांच खतरे

  • कच्चे तेल में उछाल से मंहगाई और चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है
  • सप्लाई चेन की बाधा से इंडस्ट्री, एग्रीकल्चर और सर्विसेज पर असर
  • सुरक्षित एसेट्स की मांग से घरेलू लिक्विडिटी की स्थिति टाइट हो सकती है
  • बाहरी मांग में कमी आ सकती है और रेमिटेंस का इनफ्लो घट सकता है
  • ग्लोबल असर से घरेलू घरेलू वित्तीय स्थितियां भी प्रभावित हो सकती है

तेल का आयात

पांचवां जोखिम यह है कि ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट्स पड़ने वाले असर से घरेलू घरेलू वित्तीय स्थितियां भी प्रभावित हो सकती हैं। इससे उधार लेने की लागत बढ़ सकती है। आरबीआई का कहना है कि इनमें से कुछ असर अभी से ही दिखाई देने लगे हैं। भारत अपना ज्यादातर तेल और गैस खाड़ी देशों से मंगाता है। कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से रुपये पर भी दबाव आया है। पिछले एक साल में यह करीब 7 फीसदी गिरावट है और एशिया में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसीज में शामिल है।

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