राज्य चुनावों से जुड़े कल्याणकारी खर्च में बढ़ोतरी के कारण लोग आर्थिक दबाव का सामना कर रहे हैं, जबकि पूंजीगत खर्च पीछे छूट रहा है। यह चुनावी रेवड़ियां राज्यों की आर्थिक रीढ़ तोड़ रही हैं। इसका खामियाजा भारतीय भुगत रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल, असम, केरल और तमिलनाडु में कल्याणकारी वादों से राजस्व घाटे में वृद्धि हो रही है। नीति आयोग और हालिया आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, केवल महिलाओं के लिए बिना शर्त नकद हस्तांतरण पर राज्यों का कुल खर्च 1.7 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। बता दें, चार राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में पार्टियों ने वोटरों को लुभाने के लिए तरह-तरह की घोषणाएं की हैं।
नीति आयोग की रिपोर्ट फिस्कल हेल्थ इंडेक्स 2026 के अनुसार, पश्चिम बंगाल और केरल में बकाया कर्ज उनके सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के 35 से 45 फीसदी के बीच पहुंच गया है। वहीं वेतन, पेंशन और ब्याज चुकाने में ही राजस्व का लगभग 50-60 फीसदी हिस्से पर असर पड़ा है। इससे राजस्व घाटा साल दर साल बढ़ रहा है।
चुनावी राज्यों में वित्तीय स्थिति
(स्रोत- एफएचआई, 2026 नीति आयोग)
राज्य कर्ज-जीएसडीपी अनुपात राजस्व का हिस्सा राजकोषीय स्थिति
प. बंगाल 37.5-41% 60-65% गंभीर तनाव
केरल 38.3- 43% 75% अत्यधिक वित्तीय दबाव
तमिलनाडु 33% 77% स्थिति में गिरावट
- आर्थिक बोझ: लाड़ली बहना जैसी योजनाओं से मध्य प्रदेश जैसे राज्यों का कर्ज 27% से बढ़कर 32% तक पहुँच गया है, जो ‘रेवड़ी कल्चर’ का एक बड़ा उदाहरण है।
- विकास बनाम मुफ्तखोरी: विशेषज्ञों के अनुसार, ये योजनाएं स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे में निवेश को कम कर सकती हैं।
- सुप्रीम कोर्ट की चिंता: सर्वोच्च न्यायालय ने इसे एक ‘गंभीर मुद्दा’ माना है और अर्थव्यवस्था पर इसके असर को लेकर चिंता व्यक्त की है।
- लोक कल्याण या खैरात: शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे जनकल्याण के कार्य आवश्यक हैं या नकदी और मुफ्त वस्तुएं देना केवल एक राजनीतिक खैरात है।
संकट क्यों: घोषणाएं ज्यादा, कमाई कम
- मप्र: लाड़ली बहना, मुफ्त सिलेंडर और बिजली सब्सिडी पर ही सालान करीब 50 हजार करोड़ खर्च हो रहे।
- तेलंगाना: नौ चुनावी वादों में 6 लागू। इन पर 50,713 करोड़ सालाना खर्च। बाकी के लिए 40 हजार करोड़ चाहिए।
- पंजाब: राजस्व प्राप्त 1.26 लाख करोड़। योजनाएं 2.6 लाख करोड़। वेतन -पेंशन, ब्याज पर 90 हजार करोड़।
- राजस्थान: सड़क, पानी पर होने वाला खर्च का बजट 28% तक कम किया। मुफ्त सेनेटरी पैड मिलना बंद।
असम 28.5% 55% ब्याज बोझ बढ़ा








