साउथ की राजनीति में परिसीमन पर क्यों छलक रहा दर्द ?

देश अभी मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन ( SIR ) जैसे मुद्दे से जूझ ही रहा था कि केंद्र सरकार परिसीमन का प्रस्ताव ले आई। अब यह मुद्दा दक्षिण बनाम उत्तर भारत की लड़ाई बन गया है। सरकार के विरोधी कह रहे हैं कि नोटबंदी ने जो अर्थव्यवस्था का हश्र किया था, परिसीमन वही […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
मंगलवार, 21 अप्रैल 2026, 06:23 AM 5 मिनट read
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साउथ की राजनीति में परिसीमन पर क्यों छलक रहा दर्द ?
Photo: UB India News Archive

देश अभी मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन ( SIR ) जैसे मुद्दे से जूझ ही रहा था कि केंद्र सरकार परिसीमन का प्रस्ताव ले आई। अब यह मुद्दा दक्षिण बनाम उत्तर भारत की लड़ाई बन गया है। सरकार के विरोधी कह रहे हैं कि नोटबंदी ने जो अर्थव्यवस्था का हश्र किया था, परिसीमन वही हाल राजनीति का करेगा।

हड़बड़ी पर सवाल
विपक्ष एक बार फिर हमलावर है। इस बार कह रहा है कि दक्षिण में लोकसभा की सीटें उत्तर भारत के अनुपात में कम बढ़ेंगी। इसका खामियाजा होगा कि अब उनकी आवाज का महत्व कम हो जाएगा। यही संकट पूर्वोत्तर के राज्यों के समक्ष रहेगा। अब सवाल यह है कि क्या इससे लोकतंत्र और भारत की एकता मजबूत होगी? विपक्ष का कहना है कि अभी तमिलनाडु में चुनाव होने हैं। ऐसे में परिसीमन के वास्ते संविधान संशोधन विधेयक के लिए विशेष सत्र बुलाने की क्या जल्दबाजी थी। विपक्ष का सवाल है कि विधायिका में महिला आरक्षण कानून पारित हुए 30 महीने से ज्यादा हो गए हैं और परिसीमन भी 2029 के चुनाव के लिए होना है, तो विशेष सत्र अगले महीने भी बुलाया जा सकता था।

प्रताड़ना का आरोप
परिसीमन पर दक्षिण भारत में जो हो रहा, वह चिंताजनक है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने विधेयक की प्रति जलाई। वह आरोप लगा रहे हैं कि सरकार केंद्र की सत्ता पर उत्तर का वर्चस्व मजबूत करना चाहती है। उनका कहना है कि जनसंख्या काबू करने में दक्षिण भारत की मेहनत को दरकिनार किया जा रहा है और उन्हें पुरस्कृत करने के बजाय प्रताड़ित किया जा रहा है। परिसीमन के बाद लोकसभा की सीटें मौजूदा 543 से बढ़कर 850 हो जाएंगी। आशंका है कि दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व पहले के मुकाबले घट जाएगा।

सीटों का गणित
उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और दिल्ली में अभी कुल मिलाकर 207 सीटें हैं। ये 77% बढ़कर 336 हो जाएंगी। मगर, दक्षिण भारत की सीटों में सिर्फ 33% इजाफा होगा और यह मौजूदा 132 से बढ़कर 176 होंगी। लोकसभा में अनुपात के लिहाज से हिंदी पट्टी की भागीदारी 38.1% से बढ़कर 43.1% और दक्षिण की भागीदारी 24.3% से कम होकर 20.7% रहने का अनुमान है। पूर्वोत्तर की भागीदारी भी 4.4% से घटकर 3.8% हो जाएगी। पूर्वी राज्यों की हिस्सेदारी 14.4% से कम होकर 13.7% हो जाएगी। पश्चिम भारत की हिस्सेदारी बढ़ेगी, पर नगण्य।

खास प्रावधान नहीं
सरकार भले कह रही है कि दक्षिण को सीटों का नुकसान नहीं होगा, पर विधेयक के प्रावधानों में ऐसी कोई राहत नहीं दिखती। विधेयक में कहा गया है कि परिसीमन आयोग का यह कर्तव्य होगा कि वह जनगणना के नए आंकड़ों के आधार पर हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के लिए लोकसभा व विधानसभा सीटों का निर्धारण करे। इसमें सीट आवंटन के लिए आबादी के अलावा और कोई दूसरा फॉर्म्युला नहीं बताया गया है। अब ऐसे में सरकार के आश्वासन पर विपक्ष भरोसा करेगा, यह कहा नहीं जा सकता।

महिला आरक्षण
सरकार की यह दलील विपक्ष नहीं मान रहा है कि विधायिका में महिला आरक्षण के लिए परिसीमन जरूरी है। विपक्षी दल लगातार कह रहे हैं कि नारी शक्ति वंदन विधेयक सर्वसम्मति से पारित हुआ था। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने महिला आरक्षण 2024 के लोकसभा चुनाव में ही लागू करने की मांग की थी। बगैर सीटें बढ़ाए महिला आरक्षण लागू हो सकता था। विपक्ष अब कह रहा है कि सरकार ने इसी बहाने परिसीमन को जनगणना से अलग कर दिया है।

जनगणना आधार
संविधान के मुताबिक, हालिया जनगणना के आधार पर ही परिसीमन होता है। 131वें संशोधन विधेयक से संसद को अधिकार है कि आबादी के आंकड़ों के लिए प्रकाशित जनगणना को आधार बनाया जा सकता है। इसलिए, 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन का रास्ता खुलता है यानी अभी होने वाली जनगणना के आधार पर परिसीमन नहीं होगा।

बढ़ेगी नाराजगी
तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी ने भी सीटें बढ़ाने का फैसला 25-25 साल के लिए रोक दिया था। यह फैसला इसलिए लिया गया था ताकि दक्षिण के राज्यों को अपनी तरक्की का नुकसान न उठाना पड़े। आबादी, शिक्षा और स्वास्थ्य का अंतर तो 1970 के दशक से ही दिखने लगा था, अब आर्थिक अंतर भी बढ़ गया है। दक्षिण भारत के नेताओं का आरोप है कि वे टैक्स और GST ज्यादा देते हैं, लेकिन वित्त आयोग से उत्तर भारत को अधिक रकम मिलती है। ऐसे में लोकसभा में सीटों का यह भारी अंतर और नाराजगी बढ़ाएगा।

दक्षिण के राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण पर काम किया
आर्थिक तरक्की में उत्तर के मुकाबले ज्यादा योगदान
लोकसभा में प्रतिनिधित्व पहले से कम होने का अंदेशा

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