माइन्स एंड मिनरल एक्ट पर बवाल क्यों …………….

झारखंड में खनिज संपदा से जुड़े राजस्व को लेकर केंद्र और राज्य के बीच नया विवाद खड़ा हो गया है. लोकसभा से माइन्स एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट यानी एमएमडीआर एक्ट में संशोधन पास होने के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस ने इसका विरोध शुरू कर दिया है. राज्य की सत्तारूढ़ इन दोनों […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शुक्रवार, 14 अगस्त 2026, 10:21 AM 4 मिनट read
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माइन्स एंड मिनरल एक्ट पर बवाल क्यों …………….
Photo: UB India News Archive
झारखंड में खनिज संपदा से जुड़े राजस्व को लेकर केंद्र और राज्य के बीच नया विवाद खड़ा हो गया है. लोकसभा से माइन्स एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट यानी एमएमडीआर एक्ट में संशोधन पास होने के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस ने इसका विरोध शुरू कर दिया है. राज्य की सत्तारूढ़ इन दोनों पार्टियों का आरोप है कि इस संशोधन से राज्यों को बड़ा नुकसान होगा. दोनों दलों का कहना है कि यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले को पलटना है. इससे राज्य सरकार का राजस्व वसूली प्रभावित होगा.

क्या है माइन्स एंड मिनरल एक्ट?

माइन्स एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट यानी एमएमडीआर एक्ट देश में खनिज संसाधनों के खनन और उनके नियमन से जुड़ा प्रमुख केंद्रीय कानून है. इसमें मिनरल्स की खोज, खनन के लिए पट्टा, रॉयल्टी और खनिज संसाधनों के नियमन से जुड़े प्रावधान हैं. यहां विवाद सिर्फ खनन को नियंत्रित करने का नहीं है. असली सवाल खनिज वाली जमीन पर कर लगाने के अधिकार का है. भारत के संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच कर लगाने की शक्तियां बांटी गई हैं. लंबे समय से यह बहस चलती आ रही है कि खनिजों से मिलने वाली रॉयल्टी को क्या टैक्स माना जाए और क्या राज्य खनिज वाली जमीन पर अलग से कर या सेस लगा सकते हैं. यही विवाद आखिरकार सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा.
2024 में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने इस सवाल पर बड़ा फैसला सुनाया. बहुमत से अदालत ने कहा कि राज्यों के पास खनिज वाली जमीन पर कर या सेस लगाने की शक्ति है. यानी राज्य सिर्फ केंद्र की ओर से तय रॉयल्टी पर निर्भर नहीं हैं. वे अपने अधिकार क्षेत्र में खनिज वाली जमीन पर कानून बनाकर कर लगा सकते हैं. इसी फैसले के बाद झारखंड ने अपना खनिज आधारित उपकर कानून बनाया.
25 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने 8:1 के बहुमत से एक महत्वपूर्ण फैसला दिया था. अदालत ने कहा था कि खनिजों पर रॉयल्टी को टैक्स नहीं माना जा सकता और राज्यों की विधायी शक्ति सिर्फ इस वजह से खत्म नहीं हो जाती कि केंद्र खनिजों के नियमन के लिए कानून बनाता है. फैसले का सीधा असर खनिज संपदा वाले राज्यों पर पड़ा. इनमें मुख्य रूप से झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य हैं. यहां प्रचुर मात्रा में खनिजों के भंडार हैं.
झारखंड ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को फायदे के रूप में देखा. राज्य विधानसभा ने 2 अगस्त 2024 को झारखंड मिनरल-बियरिंग लैंड सेस बिल पारित किया. इसके तहत अलग-अलग खनिजों पर प्रति मीट्रिक टन के हिसाब से सेस लगाने का प्रावधान किया गया. बाद में 2025 के बजट सत्र में इसमें बदलाव करके कुछ खनिजों पर सेस को चार गुना तक बढ़ा दिया गया. यानी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद झारखंड ने अपना खजाना भरने का काम किया.

झारखंड को कितना बड़ा झटका

यह पूरा विवाद इसलिए भी गंभीर है क्योंकि झारखंड की अर्थव्यवस्था में खनिजों की बड़ी भूमिका है. राज्य में कोयला, लौह अयस्क, यूरेनियम समेत कई महत्वपूर्ण खनिज पाए जाते हैं. राज्य सरकार ने 2026-27 के बजट में मिनरल-बियरिंग लैंड सेस से 14,656 करोड़ रुपये के राजस्व का अनुमान लगाया है. यह राशि राज्य के लिए काफी बड़ी है. इसमें से करीब 9,000 करोड़ रुपये मुख्यमंत्री मंइयां सम्मान योजना के लिए रखे गए थे. इस योजना के तहत करीब 51 लाख महिलाओं को सालाना 2,500 रुपये की सहायता दी जाती है. यही वजह है कि राज्य सरकार और सत्तारूढ़ दल इसे सिर्फ टैक्स का मुद्दा नहीं मान रहे. उनका कहना है कि इसका असर राज्य के विकास और सामाजिक योजनाओं पर भी पड़ सकता है.
विवाद की जड़ लोकसभा से पारित एमएमडीआर संशोधन बिल है. झारखंड सरकार और जेएमएम-कांग्रेस का आरोप है कि संशोधन राज्यों के उस अधिकार को सीमित करता है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में मान्यता दी थी. राज्य सरकार का कहना है कि नए प्रावधान के जरिए राज्यों के खनिजों पर अतिरिक्त सेस या दूसरे कर लगाने के अधिकार को केंद्र के कानून के जरिए सीमित किया जा रहा है. जेएमएम का कहना है कि राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर कानून बनाया था. यहीं से मामला राज्यों के अधिकार बनाम केंद्र की शक्ति का बन गया है.
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