क्या यह सब अचानक हुआ या फिर लंबे समय से इसकी स्क्रिप्ट लिखी जा रही थी?

राजनीति में बगावत कोई नई बात नहीं है. लेकिन जब यह अंदरखाने पनपती है और आखिरी पल तक शीर्ष नेतृत्व को भनक तक नहीं लगती तब यह सिर्फ बगावत नहीं बल्कि रणनीतिक चक्रव्यूह बन जाती है. आम आदमी पार्टी (AAP) में उठे ताजा सियासी तूफान ने यही दिखाया है कि कैसे एक-एक चाल सोच-समझकर चली […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
रविवार, 26 अप्रैल 2026, 07:12 AM 4 मिनट read
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क्या यह सब अचानक हुआ या फिर लंबे समय से इसकी स्क्रिप्ट लिखी जा रही थी?
Photo: UB India News Archive
राजनीति में बगावत कोई नई बात नहीं है. लेकिन जब यह अंदरखाने पनपती है और आखिरी पल तक शीर्ष नेतृत्व को भनक तक नहीं लगती तब यह सिर्फ बगावत नहीं बल्कि रणनीतिक चक्रव्यूह बन जाती है. आम आदमी पार्टी (AAP) में उठे ताजा सियासी तूफान ने यही दिखाया है कि कैसे एक-एक चाल सोच-समझकर चली गई. 2 अप्रैल से शुरू हुआ यह खेल धीरे-धीरे गहराता गया और 24 अप्रैल को खुलकर सामने आया जब राघव चड्ढा सहित 7 राज्यसभा सांसदों ने पार्टी छोड़ दी. यह कहानी सिर्फ पार्टी टूटने की नहीं, बल्कि भरोसे के टूटने की भी है. सवाल यह है कि क्या यह सब अचानक हुआ या फिर लंबे समय से इसकी स्क्रिप्ट लिखी जा रही थी?
सूत्रों के मुताबिक यह पूरा घटनाक्रम किसी फिल्मी प्लॉट से कम नहीं है, जहां हर किरदार की भूमिका पहले से तय थी. एक तरफ नेतृत्व को भरोसे में रखने का खेल चलता रहा तो दूसरी तरफ संपर्क और समर्थन जुटाने का अभियान भी जारी रहा. खास बात यह रही कि जिन लोगों पर सबसे ज्यादा भरोसा था, वही अंत में सबसे बड़ा झटका देकर चले गए. इस बगावत ने न सिर्फ पार्टी के अंदरूनी तंत्र को हिला दिया है बल्कि आने वाले समय में इसकी राजनीतिक दिशा भी बदल सकती है. अब हर कोई यही जानना चाहता है कि इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड कौन था और आखिर किस मोड़ पर पार्टी नेतृत्व को मात मिल गई.

22 अप्रैल की गुप्त रणनीति

यह पूरा मामला 2 अप्रैल से शुरू होता है, जब राघव चड्ढा को राज्यसभा उपनेता पद से हटाया गया. यहीं से नाराजगी और रणनीति का बीज बोया गया. सूत्र बताते हैं कि इसके बाद राघव ने धीरे-धीरे अन्य सांसदों से संपर्क साधना शुरू किया. यह संपर्क सिर्फ बातचीत तक सीमित नहीं था बल्कि उन्हें एक अलग गुट बनाने के लिए तैयार किया जा रहा था.
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इस दौरान कुछ नाम पहले से ही असंतुष्ट माने जा रहे थे जैसे स्वाति मालीवाल. उन्हें इस गुट में शामिल करना आसान रहा. वहीं अशोक मित्तल जैसे नेता शुरुआत में तैयार नहीं थे लेकिन लगातार संपर्क और दबाव के चलते स्थिति बदलती गई.
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22 अप्रैल को इस पूरे खेल में बड़ा मोड़ आया.

14 अप्रैल की रेड और बदला माहौल

14 अप्रैल को अशोक मित्तल के ठिकानों पर हुई रेड ने पूरे समीकरण को बदल दिया. सूत्रों के अनुसार इस कार्रवाई का असर अन्य सांसदों पर भी पड़ा. खासकर कारोबारी पृष्ठभूमि वाले नेताओं पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया गया. इसके बाद बगावत की जमीन और मजबूत होती गई.

22 अप्रैल: निर्णायक दिन

22 अप्रैल को इस पूरे खेल में बड़ा मोड़ आया. इस दिन एक-एक सांसद से व्यक्तिगत स्तर पर बातचीत कर उन्हें साथ लाने की कोशिश की गई. बीजेपी नेताओं की भी सक्रिय भूमिका सामने आई. हरभजन सिंह से संपर्क के लिए विशेष प्रयास किए गए. वहीं विदेश में मौजूद नेताओं तक भी पहुंच बनाई गई.

डबल क्रॉस और अंदर की खबर

इसी दौरान विक्रम साहनी की भूमिका सबसे दिलचस्प रही. वह एक तरफ नेतृत्व के साथ संपर्क में थे तो दूसरी तरफ बागी गुट की जानकारी भी साझा कर रहे थे. उन्होंने केजरीवाल को बताया कि कई सांसद अलग गुट की चिट्ठी पर हस्ताक्षर कर चुके हैं. लेकिन असली खेल यह था कि यह जानकारी भी पूरी तरह साफ नहीं थी.

23-24 अप्रैल: सबसे बड़ा झटका

23 अप्रैल को संदीप पाठक की मुलाकात ने नेतृत्व को भरोसे में रखा. उन्होंने वफादारी का संकेत दिया. लेकिन अगले ही दिन 24 अप्रैल को बगावत खुलकर सामने आ गई. सुबह चिट्ठी दी गई और दोपहर तक प्रेस कॉन्फ्रेंस की खबर आ गई. सबसे बड़ा झटका तब लगा जब संदीप पाठक का नाम भी बागियों में सामने आया.
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