दिल्ली हाईकोर्ट में मंगलवार को एक दिलचस्प घटनाक्रम देखने को मिला, जिसने हालिया न्यायिक फैसलों को लेकर नई बहस छेड़ दी है. एक तरफ जहां पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की ओर से उठाई गई आपत्तियों को जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने पहले खारिज कर दिया था, वहीं अब कांग्रेस सांसद कार्ति चिंदबरम के मामले में उन्होंने […]
By UB India News • Patna, Bihar बुधवार, 29 अप्रैल 2026, 05:48 AM • 6 मिनट read
दिल्ली हाईकोर्ट में मंगलवार को एक दिलचस्प घटनाक्रम देखने को मिला, जिसने हालिया न्यायिक फैसलों को लेकर नई बहस छेड़ दी है. एक तरफ जहां पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की ओर से उठाई गई आपत्तियों को जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने पहले खारिज कर दिया था, वहीं अब कांग्रेस सांसद कार्ति चिंदबरम के मामले में उन्होंने बिना किसी आग्रह के खुद को सुनवाई से अलग कर लिया. कार्ति ने इस याचिका में अपने खिलाफ दर्ज सीबीआई की एफआईआर को रद्द करने की मांग की है.
जज ने बिना कारण बताए सिर्फ इतना कहा कि इस मामले को किसी दूसरी बेंच के सामने सूचीबद्ध किया जाए. अब इस केस की अगली सुनवाई 21 जुलाई को होगी. जस्टिस स्वर्णकांता ने मामले की शुरुआत में ही कहा, ‘इसे किसी नई बेंच के सामने लिस्ट किया जाए.’
क्या है पूरा मामला?
यह मामला ब्रिटेन की शराब कंपनी डियाजियो से जुड़ा है. आरोप है कि व्हिस्की की ड्यूटी-फ्री बिक्री पर लगे प्रतिबंध में ढील दिलाने के लिए कथित तौर पर मदद की गई थी. इसी मामले में सीबीआई ने कार्ति चिदंबरम के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी.
कार्ति ने अपनी याचिका में इस एफआईआर को ‘अवैध’ बताया है. उनका कहना है कि यह केस राजनीतिक बदले की भावना से दर्ज किया गया है. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि एफआईआर दर्ज करने में बहुत ज्यादा देरी की गई है.
20 साल बाद दर्ज हुई एफआईआर!
याचिका के मुताबिक, जिन आरोपों की बात की जा रही है, वे 2004 से 2010 के बीच के हैं. लेकिन एफआईआर 1 जनवरी 2025 को दर्ज की गई, यानी करीब 20 साल बाद. कार्ति का कहना है कि इतनी देरी अपने आप में इस केस को कमजोर बनाती है.
FIPB क्लीयरेंस से जुड़ा है मामला
यह केस 2018 में शुरू हुई CBI की शुरुआती जांच से जुड़ा है. उस समय पी चिदंबरम देश के वित्त मंत्री थे. जांच में विदेशी निवेश संवर्द्धन बोर्ड (FIPB) की मंजूरी देने में कथित गड़बड़ियों की बात सामने आई थी. इस मामले में कटरा होल्डिंग्स और एडवांटेज स्ट्रैटेजिक कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड (ASCPL) समेत कई नाम शामिल हैं.
कार्ति चिदंबरम ने यह भी कहा है कि अज्ञात सरकारी अधिकारियों के खिलाफ बिना उचित मंजूरी के एफआईआर दर्ज की गई, जो कानून के खिलाफ है. इसलिए इस मामले में की जा रही जांच भी सही नहीं है.
वही आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के बाद एक और आप नेता ने भी जस्टिस स्वर्णकांता को चिट्ठी लिखी है। एक्साइज पॉलिसी मामले को लेकर पूर्व विधायक दुर्गेश पाठक ने चिट्ठी में लिखा कि मैं अरविंद केजरीवाल के साथ खड़ा हूं। इस केस में मैं पेश होने में असमर्थ हूं। मेरी तरफ से कोई वकील भी पेश नहीं होगा।
इससे पहले आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया ने मंगलवार को दिल्ली हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा को पत्र लिखकर एक्साइज पॉलिसी मामले में उनकी अदालत में मुकदमा आगे नहीं चलाने का फैसला बताया था। वहीं, सोमवार को आप सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने भी इसी जज की अदालत में व्यक्तिगत रूप से या किसी वकील के माध्यम से पेश नहीं होने का एलान किया था।
अरविंद केजरीवाल ने अपने पत्र में क्या कहा था?
वहीं, सीबीआई की अपील याचिका पर न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा द्वारा सुनवाई किए जाने पर आपत्ति जताने के बाद केजरीवाल ने फैसला किया कि वह आगे इस मामले में न तो खुद पेश होंगे और न ही उनके कोई वकील जिरह करेंगे। केजरीवाल ने न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा को चार पन्नों का पत्र लिखकर यह जानकारी दी। पत्र में उन्होंने कहा कि मैं अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनकर यह निर्णय ले रहा हूं। मैं इसके नतीजों का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार हूं। हो सकता है कि इससे मेरे कानूनी हितों को नुकसान पहुंचे, लेकिन मैं इसके लिए तैयार हूं। केजरीवाल ने स्पष्ट किया कि वे न्यायमूर्ति शर्मा के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने का अपना अधिकार सुरक्षित रखते हैं। उन्होंने लिखा अपने पत्र में अदालत में बहस के दौरान दी गई दलील दोहराते हुए कहा कि न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए।
पत्र में केजरीवाल ने महात्मा गांधी के सत्याग्रह के सिद्धांत का हवाला दिया और कहा कि यह फैसला केवल इसी मामले तक सीमित है। उन्होंने न्यायमूर्ति सुजॉय पॉल और न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन के उदाहरण दिए, जिन्होंने अपने परिवार के सदस्यों के वकालत करने के कारण हाईकोर्ट से स्थानांतरण की मांग की थी। केजरीवाल ने लिखा कि न्यायमूर्ति शर्मा की टिप्पणियों से उनकी अर्जी को न्यायिक और संस्थागत अपमान के रूप में लिया गया, जिसके बाद निष्पक्ष सुनवाई की उम्मीद नहीं रह गई है।
सिसोदिया ने अपने पत्र में क्या कहा था?
सिसोदिया ने पत्र में साफ लिखा है कि उनकी तरफ से भी कोई वकील नहीं पेश होगा। आपके बच्चों का भविष्य तुषार मेहता के हाथों में है। उन्होंने कहा कि उन्हें न्याय मिलने की कोई उम्मीद नहीं बची है, इसलिए वे महात्मा गांधी के सत्याग्रह के रास्ते पर चलने का फैसला कर चुके हैं। यह घटनाक्रम तब सामने आया है जब जस्टिस शर्मा ने हाल ही में सिसोदिया और केजरीवाल समेत अन्य आरोपियों की रिक्यूजल याचिका खारिज कर दी थी। आरोपियों का कहना है कि जज के परिवार के सदस्य केंद्रीय सरकार की पैनल पर वकील के रूप में जुड़े हुए हैं और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की ओर उन्हें केस मिलते हैं, जिससे निष्पक्ष सुनवाई पर सवाल उठता है। केजरीवाल ने भी सोमवार को लिखे पत्र में कहा था कि उनकी न्याय मिलने की उम्मीद टूट चुकी है और वे अदालत में आगे भाग नहीं लेंगे। हालांकि दोनों नेताओं ने अपने पत्रों में कहा कि वह इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकते हैं।
यह है मामला
दिल्ली हाईकोर्ट में सीबीआई ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ अपील दायर की है, जिसमें आबकारी घोटाले में केजरीवाल समेत सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया गया था। इस अपील याचिका पर न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा सुनवाई कर रही हैं। केजरीवाल ने 13 अप्रैल को व्यक्तिगत रूप से पेश होकर न्यायमूर्ति शर्मा से खुद को मामले से अलग करने की मांग की थी। 20 अप्रैल को अदालत ने उनकी इस अर्जी को खारिज कर दिया और टिप्पणी की कि किसी राजनेता को न्यायपालिका पर अविश्वास फैलाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। इस फैसले के बाद केजरीवाल ने पत्र लिखकर कहा कि अब उन्हें विश्वास नहीं रहा कि न्यायमूर्ति शर्मा निष्पक्ष तरीके से सुनवाई कर पाएंगी।