सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए भाजपा नेताओं अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा को राहत दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उनके खिलाफ कोई भी संज्ञेय अपराध नहीं बनता। यह फैसला 29 अप्रैल को जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने सुनाया। कांग्रेस […]
By UB India News • Patna, Bihar शुक्रवार, 1 मई 2026, 09:17 AM • 6 मिनट read
सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए भाजपा नेताओं अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा को राहत दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उनके खिलाफ कोई भी संज्ञेय अपराध नहीं बनता। यह फैसला 29 अप्रैल को जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने सुनाया। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली याचिका खारिज हो गई।
सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए भाजपा नेताओं अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा अपने फैसले में कहा कि:-
- प्रस्तुत सामग्री और कथित भाषणों की जांच के बाद कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता।
- भाषण किसी विशेष समुदाय के खिलाफ नहीं थे।
- इनमें हिंसा या सार्वजनिक अशांति भड़काने का स्पष्ट तत्व नहीं पाया गया।
अदालत ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट का अंतिम निष्कर्ष सही था, लेकिन उसकी तर्क प्रक्रिया (सैंक्शन के आधार पर) पूरी तरह उचित नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि एफआईआर दर्ज करने के लिए पहले से सरकारी अनुमति (सैंक्शन) जरूरी नहीं है। ऐसी अनुमति की आवश्यकता केवल उस चरण में होती है, जब अदालत मामले का संज्ञान लेती है। यदि जांच शुरू करने से पहले ही सैंक्शन को अनिवार्य कर दिया जाए, तो इससे जांच प्रक्रिया पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
हेट स्पीच पर कोर्ट की बड़ी टिप्पणी
अदालत ने कहा कि हेट स्पीच संविधान की भाईचारे की भावना के खिलाफ है और समाज की नैतिक संरचना को कमजोर करती है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि मौजूदा कानून इस मुद्दे से निपटने के लिए पर्याप्त हैं और नए कानून बनाने की जरूरत नहीं है।
क्या था मामला?
मामला 2020 में दिल्ली के शाहीन बाग में हुए एंटी-सीएए विरोध प्रदर्शन के दौरान दिए गए कथित भाषणों से जुड़ा था। अनुराग ठाकुर ने जहां ‘देश के गद्दारों को…’ वाली बात कही थी, वहीं प्रवेश वर्मा ने चेतावनी दी थी कि अगर शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को नहीं रोका गया, तो वह आखिरकार घरों में घुसकर बलात्कार और हत्या करेंगे। जिसके बाद सीपीआई(एम) नेताओं बृंदा करात और के एम तिवारी ने आरोप लगाया था कि 27 और 28 जनवरी 2020 को अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा ने भड़काऊ भाषण दिए थे। इसके बाद उन्होंने एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने अगस्त 2020 में इस शिकायत को खारिज कर दिया था। इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने भी 2022 में याचिका को खारिज कर दिया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और रायबरेली से कांग्रेस सांसद राहुल गांधी को एक बड़े कानूनी मामले में बड़ी राहत दी है। जस्टिस विक्रम डी चौहान की एकल पीठ ने राहुल गांधी के खिलाफ ‘इंडियन स्टेट’ से लड़ाई वाले विवादित बयान को लेकर दाखिल याचिका को शुक्रवार को खारिज कर दिया। कोर्ट के इस फैसले के बाद अब इस मामले में न तो मुकदमा दर्ज होगा और न ही कोई कानूनी कार्यवाही चलेगी।
याची सिमरन गुप्ता ने ट्रायल कोर्ट संभल के फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। भारतीय राज्य के संबंध में राहुल गांधी के बयान के आधार पर संभल ट्रायल कोर्ट में उन पर एफआईआर दर्ज करने के लिए सिमरन गुप्ता ने वाद दायर किया था। ट्रायल कोर्ट के वाद खारिज किए जाने के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने संभल ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।
क्या है पूरा मामला?
संभल की चंदौसी कोर्ट ने याचिकाकर्ता की ओर से सांसद राहुल गांधी के खिलाफ दाखिल निगरानी याचिका को कमजोर होने के कारण खारिज कर दिया था। सिमरन गुप्ता ने अपर जिला एवं सत्र न्यायधीश चंदौसी कोर्ट की तरफ से दिए गए फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए याचिका दाखिल की थी। 15 जनवरी 2025 को राहुल गांधी ने कांग्रेस के नए मुख्यालय ‘इंदिरा भवन’ के उद्धाटन के दौरान कहा था, “हमारी लड़ाई आरएसएस, बीजेपी और खुद इंडियन स्टेट से है।”
उन्होंने कहा था, “हमारी विचारधारा, आरएसएस की विचारधारा की तरह हजारों साल पुरानी है और हम हजारों वर्षों से आरएसएस की विचारधारा से लड़ रहे हैं। यह मत सोचिए कि हम निष्पक्ष लड़ाई लड़ रहे हैं। इसमें कोई निष्पक्षता नहीं है। अगर आपको लगता है कि हम भाजपा या आरएसएस नामक किसी राजनीतिक संगठन से लड़ रहे हैं तो आपने स्थिति सही से समझा नहीं है। भाजपा और आरएसएस ने हमारे देश की हर संस्था पर कब्जा कर लिया है। अब हम भाजपा, आरएसएस और खुद इंडियन स्टेट से लड़ रहे हैं।”
अदालत ने की अहम टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद 8 अप्रैल को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। शुक्रवार को ओपन कोर्ट में फैसला सुनाते हुए जस्टिस विक्रम डी चौहान ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता की मांग में कानूनी आधार का अभाव है। अदालत के इस रुख से यह साफ हो गया है कि राजनीतिक बयानों में व्यवस्था के विरोध को सीधे तौर पर आपराधिक कृत्य या देशद्रोह के चश्मे से नहीं देखा जा सकता।