ममता बनर्जी को क्यों मिल रहे है झटके पर झटके …………….

पश्चिम बंगाल की राजनीति में 4 मई की मतगणना की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए चुनौतियों का पहाड़ खड़ा होता जा रहा है. पिछले 96 घंटों के भीतर तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो को एक के बाद एक चार ऐसे झटके लगे हैं, जिन्होंने न केवल उनकी चुनावी रणनीति को […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शनिवार, 2 मई 2026, 07:02 AM 8 मिनट read
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ममता बनर्जी को क्यों मिल रहे है झटके पर झटके …………….
Photo: UB India News Archive
पश्चिम बंगाल की राजनीति में 4 मई की मतगणना की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए चुनौतियों का पहाड़ खड़ा होता जा रहा है. पिछले 96 घंटों के भीतर तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो को एक के बाद एक चार ऐसे झटके लगे हैं, जिन्होंने न केवल उनकी चुनावी रणनीति को बैकफुट पर धकेल दिया है, बल्कि पार्टी के भीतर भी हड़कंप मचा दिया है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘दीदी’ के लिए यह चार दिन किसी बुरे सपने से कम नहीं रहे हैं, जहां कानूनी मोर्चे से लेकर जनमत के अनुमानों तक हर तरफ से निराशा हाथ लगी है.

सुप्रीम कोर्ट ने आज शनिवार को पश्चिम बंगाल में काउंटिंग सेंटर्स पर केंद्रीय और पीएसयू (PSU) कर्मचारियों की तैनाती के खिलाफ TMC की आपत्ति को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘चुनाव आयोग को कोई आदेश नहीं दे सकते है। यह चुनाव आयोग का अधिकार है उन पर भरोसा करें।’ TMC की ओर से सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने कहा है कि हमें उनसे (चुनाव आयोग) से न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है। TMC ने इससे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट में अपील की थी। हाईकोर्ट ने आपत्ति खारिज करते हुए कहा था कि काउंटिंग स्टाफ की नियुक्ति चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आती है, इसमें कोई अवैधता नहीं है। बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को दो फेज में चुनाव हुए हैं। रिजल्ट 4 मई को आएगा।

पहला झटका: एग्जिट पोल में बीजेपी की ‘प्रचंड’ जीत
ममता बनर्जी को सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका मतदान खत्म होते ही मिला. देश की तमाम बड़ी सर्वे एजेंसियों के एग्जिट पोल ने टीएमसी की सत्ता से विदाई और बीजेपी की ऐतिहासिक जीत की भविष्यवाणी की है. अधिकांश एग्जिट पोल में बीजेपी को 150 से 170 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत मिलता दिखाया गया है, जबकि टीएमसी को 120 सीटों के आसपास सिमटता बताया गया है. इन आंकड़ों ने टीएमसी कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ दिया है और पार्टी के भीतर हार की आशंका गहरा गई है.
दूसरा झटका: कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला
मतगणना की निष्पक्षता को लेकर ममता सरकार को दूसरा झटका राज्य की उच्च न्यायालय से लगा. कलकत्ता हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग के उस फैसले पर मुहर लगा दी, जिसमें कहा गया था कि वोटों की गिनती (Counting) के लिए राज्यकर्मियों के बजाय केंद्रीय कर्मचारियों (Central Government Employees) की तैनाती की जाएगी. टीएमसी को उम्मीद थी कि स्थानीय कर्मचारियों की मौजूदगी से उन्हें कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन कोर्ट के इस फैसले ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया.
तीसरा झटका: चुनाव आयोग ने खारिज की टीएमसी की दलील
अदालती कार्यवाही के बीच चुनाव आयोग ने भी टीएमसी को करारा झटका दिया. ममता बनर्जी की पार्टी ने आयोग से अपील की थी कि मतगणना और चुनाव ड्यूटी में राज्य के कर्मचारियों को शामिल किया जाए, क्योंकि वे स्थानीय परिस्थितियों से वाकिफ होते हैं. हालांकि, चुनाव आयोग ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय कर्मचारियों का पैनल ही मतगणना का जिम्मा संभालेगा. आयोग के इस रुख ने टीएमसी के ‘बूथ मैनेजमेंट’ और ‘काउंटिंग मैनेजमेंट’ के दावों की हवा निकाल दी.
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चौथा झटका: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को रखा बरकरार
ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी कानूनी हार सुप्रीम कोर्ट में हुई. टीएमसी ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया और साफ कर दिया कि मतगणना केवल केंद्रीय कर्मचारियों की निगरानी में ही होगी. अदालत ने चुनाव आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्ष चुनाव कराने के अधिकार को सर्वोपरि माना. यह ‘दीदी’ के लिए चार दिनों में चौथा और सबसे निर्णायक झटका साबित हुआ.

पहले पूरा मामला समझें

चुनाव आयोग ने 13 अप्रैल को एक सर्कुलर जारी किया था जिसके अनुसार मतगणना की हर टेबल पर सुपरवाइजर या असिस्टेंट में से कम से कम एक कर्मचारी केंद्र सरकार या पब्लिक सेक्टर (PSU) का होना अनिवार्य है।

टीएमसी का आरोप है कि केंद्र सरकार के कर्मचारी बीजेपी के प्रभाव में काम कर सकते हैं। इसलिए राज्य सरकार के कर्मचारियों की भी नियुक्ति की जाए। टीएमसी ने यह शिकायत चुनाव आयोग से भी की थी।

कोर्ट रूम LIVE

कपिल सिब्बल: इससे जुड़े 4 मुद्दे हैं-

पहला: 13 अप्रैल को जिला चुनाव अधिकारियों (DEO) को नोटिस जारी किया गया लेकिन हमें इसकी जानकारी 29 तारीख को मिली।

दूसरा: उन्हें पहले से ही आशंका है कि हर बूथ पर गड़बड़ी होगी। सवाल यह है कि उन्हें यह अंदाजा या जानकारी कहां से मिली? यह बेहद चौंकाने वाली बात है।

तीसरा: मुद्दा यह है कि पहले से ही हर टेबल पर केंद्र सरकार का एक अधिकारी (माइक्रो ऑब्जर्वर) मौजूद है। ऐसे में सवाल है कि फिर एक और केंद्रीय अधिकारी की जरूरत क्यों पड़ रही है?

चौथा: मुद्दा यह है कि सर्कुलर में यह भी लिखा है कि एक राज्य सरकार का अधिकारी भी होना चाहिए। लेकिन इसके बावजूद राज्य सरकार के प्रतिनिधि को नियुक्त नहीं किया जा रहा है।

कपिल सिब्बल: हर टेबल पर एक केंद्रीय कर्मचारी की अनिवार्यता से चुनाव आयोग की मंशा समझ नहीं आती।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा

आइए, हम इस प्रावधान को दोबारा पढ़ते हैं। यदि हम यह मान लें कि काउंटिंग सुपरवाइजर और सहायक केंद्र सरकार के कर्मचारी होंगे, तो इसे गलत नहीं कहा जा सकता, क्योंकि प्रावधान में स्पष्ट है कि इनकी नियुक्ति राज्य या केंद्र, किसी भी पूल से की जा सकती है।

कपिल सिब्बल : मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) के पत्र में कहा गया है कि मतगणना में गड़बड़ी की आशंका जताई गई है। यह सीधे तौर पर राज्य सरकार पर उंगली उठाने जैसा है। अगर ऐसी आशंका है, तो उसका कोई ठोस डेटा होना चाहिए। हर बूथ के लिए यह आशंका कहां से आई? यह जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? अगर केंद्र सरकार के अधिकारियों को लगाया जा रहा है, तो हमें पहले से बताया क्यों नहीं गया?

जस्टिस बागची : इसमें राजनीतिक दलों की सहमति लेने का सवाल ही कहां आता है? नियमों के अनुसार, काउंटिंग सुपरवाइजर और असिस्टेंट या तो केंद्र सरकार के हो सकते हैं या राज्य सरकार के। जब यह विकल्प खुला है तो नोटिफिकेशन को नियमों के खिलाफ नहीं कहा जा सकता। यह भी संभव है कि दोनों अधिकारी केंद्र सरकार के ही हों।

सिब्बल: सर्कुलर में ऐसा स्पष्ट नहीं लिखा है।

चुनाव आयोग के सीनियर एडवोकेट डीएस नायडू: रिटर्निंग ऑफिसर राज्य सरकार के कैडर का अधिकारी हैं। रिटर्निंग ऑफिसर के पास पूरी जिम्मेदारी और अधिकार होता है। हर उम्मीदवार के पास अपना-अपना काउंटिंग एजेंट भी होता है, जो पूरी प्रक्रिया पर नजर रखता है। इसलिए किसी भी गड़बड़ी की जो आशंका जताई जा रही है, वह पूरी तरह गलत और बेबुनियाद है।

सुप्रीम कोर्ट: यहां एक गलतफहमी है। यह मानना सही नहीं है कि राज्य सरकार और केंद्र सरकार के कर्मचारी अलग-अलग तरह के होते हैं। दरअसल, दोनों ही सरकारी कर्मचारी हैं।

जस्टिस बागची: दोनों (काउंटिंग सुपरवाइजर और असिस्टेंट) केंद्र सरकार के अधिकारी भी हो सकते हैं। अगर ऐसा सर्कुलर में साफ लिखा भी होता, तब भी इसमें कोई गलती नहीं होती, क्योंकि नियम कहते हैं कि केंद्र या राज्य, किसी भी सरकार के अधिकारी नियुक्त किए जा सकते हैं। सिर्फ एक ही समूह (जैसे केवल केंद्र सरकार) से अधिकारियों का चयन करना भी गलत नहीं है। यहां अनुपात वाली बात कहां से आ रही है।

ऑर्डर: 13 अप्रैल 2026 का चुनाव आयोग की तरफ से जारी सर्कुलर ही लागू रहेगा। अलग से कोई आदेश जारी करने की जरूरत नहीं है।

बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी बोले- नियुक्ति का अधिकार EC को

कोलकाता हाईकोर्ट के फैसले पर पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल ने कहा है कि सी राजनीतिक दल को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि काउंटिंग में किसे शामिल किया जाए। यह पूरी प्रक्रिया रिटर्निंग ऑफिसर के अधिकार में आती है।

क्या 4 मई को लगेगा पांचवा झटका?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या 4 मई को मतगणना के दिन ममता बनर्जी को पांचवां और सबसे बड़ा झटका लगेगा? यदि एग्जिट पोल के आंकड़े हकीकत में तब्दील होते हैं और केंद्रीय कर्मचारियों की सख्त निगरानी में होने वाली गिनती में टीएमसी पिछड़ती है, तो यह बंगाल की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत होगी. भवानीपुर से लेकर नंदीग्राम तक, हर सीट पर अब कांटे की टक्कर है और ‘दीदी’ के लिए इन झटकों से उबरना आसान नहीं होगा.
4 मई के नतीजे यह तय करेंगे कि ममता बनर्जी की ‘लंका’ को इन झटकों ने कितना नुकसान पहुंचाया है. फिलहाल, पूरी टीएमसी लीडरशिप रक्षात्मक मुद्रा में है और बीजेपी खेमे में उत्साह का माहौल है. क्या बंगाल में ‘कमल’ खिलेगा या ‘दीदी’ कोई आखिरी करिश्मा दिखाएंगी? इसका फैसला अब बस कुछ ही घंटों की दूरी पर है.
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