सबरीमाला रेफरेंस केस में सुप्रीम कोर्ट में पूरी हुई सुनवाई, फैसला रखा सुरक्षित

सबरीमाला रेफरेंस केस पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर ली है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की ⁠9 जजों वाली संविधान पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. इस केस में 16 दिनों की मैराथन सुनवाई हुई थी. यह मामला केवल सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि देश […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 14 मई 2026, 12:17 PM 3 मिनट read
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सबरीमाला रेफरेंस केस में सुप्रीम कोर्ट में पूरी हुई सुनवाई, फैसला रखा सुरक्षित
Photo: UB India News Archive

सबरीमाला रेफरेंस केस पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर ली है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की ⁠9 जजों वाली संविधान पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. इस केस में 16 दिनों की मैराथन सुनवाई हुई थी. यह मामला केवल सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि देश में धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और संवैधानिक अधिकारों की सीमा तय करने वाला बड़ा संवैधानिक विवाद बन चुका है.

9 जजों वाली बेंच ने की सुनवाई

इस मामले की सुनाई सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की बेंच ने की. 2018 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक बताया था. इसके खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर हुईं. बाद में मामला बड़ी संविधान बेंच को भेजा गया ताकि धार्मिक अधिकारों और मौलिक अधिकारों से जुड़े बड़े सवाल तय किए जा सकें.

सबरीमला रेफरेंस के 7 प्रमुख सवाल

सबरीमला रेफरेंस केस की सुनवाई के दौरान अदालत ने सात बड़े संवैधानिक प्रश्नों पर विचार किया. ये सवाल थे:-

  1. क्या अदालत अनिवार्य धार्मिक प्रथा तय कर सकती है? यानी कौन-सी धार्मिक परंपरा किसी धर्म का अनिवार्य हिस्सा है, यह तय करने का अधिकार कोर्ट के पास है या नहीं.
  2. क्या किसी धार्मिक समुदाय को अपने धार्मिक मामलों को पूरी तरह स्वयं संचालित करने का अधिकार है? यह सवाल संविधान के अनुच्छेद 26 से जुड़ा है, जो धार्मिक संप्रदायों को स्वायत्तता देता है.
  3. क्या धार्मिक प्रथाएं मौलिक अधिकारों, खासकर समानता के अधिकार, से ऊपर हो सकती हैं? यानी अगर कोई परंपरा महिलाओं या किसी वर्ग को बाहर रखती है, तो क्या वह संविधान के खिलाफ मानी जाएगी.
  4. क्या ‘संवैधानिक नैतिकता’ का इस्तेमाल धार्मिक मामलों में किया जा सकता है? अदालत यह तय करेगी कि संविधान के मूल मूल्य धार्मिक परंपराओं पर कितनी सीमा तक लागू होंगे.
  5. क्या किसी धार्मिक प्रथा को गैर-श्रद्धालु अदालत में चुनौती दे सकता है? यानी क्या केवल प्रभावित भक्त ही याचिका दायर कर सकते हैं या कोई भी नागरिक चुनौती दे सकता है.
  6. क्या अदालत धार्मिक आस्था की तर्कसंगतता या वैधता की जांच कर सकती है?
  7. क्या अलग-अलग मौलिक अधिकारों जैसे धार्मिक स्वतंत्रता, समानता, गरिमा और भेदभाव-विरोध के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए?

यह सातों सवाल केवल सबरीमला तक सीमित नहीं हैं. इनके आधार पर भविष्य में मंदिर, मस्जिद, दरगाह, चर्च और अन्य धार्मिक संस्थाओं से जुड़े कई मामलों का रास्ता तय होगा. सुनवाई के दौरान कई तीखी टिप्पणियां भी सामने आईं.

विविध धार्मिक परंपराएं ही देश की स्थाई पहचान

जस्टिस B. V. नागरत्ना ने कहा कि संविधान के अलग-अलग अनुच्छेदों को मिलाकर देखने से धर्म की स्वतंत्र पहचान खत्म हो सकती है. उन्होंने यह भी कहा कि भारत की विविध धार्मिक परंपराएं देश की स्थायी पहचान हैं. एक अन्य अहम टिप्पणी में अदालत ने कहा कि किसी जाति विशेष को बाहर रखना ‘न तो धर्म है और न धार्मिक प्रथा.’

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